दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ दिन पहले हजारों छात्र जुटे थे। हाथों में तख्तियां थीं, टेंट लगे थे, रातें सड़क पर कटीं और फिर एक दिन पुलिस ने पूरा इलाका खाली करा दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, देशभर में बहस छिड़ी और एक बार फिर सवाल उठा कि क्या भारत में छात्र आंदोलनों की ताकत लौट रही है?
लेकिन यह सवाल नया नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज आंदोलन का चेहरा मोबाइल कैमरे में कैद हो जाता है। कभी ऐसा नहीं था। तब खबरें अगले दिन अखबार में छपती थीं, फिर भी उनकी गूंज दिल्ली तक पहुंच जाती थी। उन दिनों अगर किसी शहर का नाम बार-बार छात्र आंदोलनों के साथ लिया जाता था, तो वह था इलाहाबाद यानी प्रयागराज। यहां विरोध केवल एक घटना नहीं था। यह विश्वविद्यालयों, छात्रावासों, पुस्तकालयों, चाय की दुकानों और शहर की फिजा में घुला हुआ एक स्वभाव था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक पुराने छात्र ने अपने संस्मरण में लिखा है कि यहां पढ़ने वाला हर छात्र दो विश्वविद्यालयों का विद्यार्थी होता था। एक वह, जहां कक्षाएं लगती थीं; दूसरा वह, जिसकी कोई इमारत नहीं थी। उसका कैंपस कटरा की चाय की दुकानों से शुरू होकर कर्नलगंज की गलियों, छात्रावासों के बरामदों और सिविल लाइंस के कॉफी हाउस तक फैला हुआ था। वहीं भाषण तैयार होते थे, वहीं घोषणापत्र लिखे जाते थे और वहीं यह तय होता था कि अगले दिन जुलूस निकलेगा या नहीं। इसीलिए इलाहाबाद के छात्र आंदोलनों को केवल विश्वविद्यालय के इतिहास से नहीं समझा जा सकता। यह शहर खुद उनका हिस्सा था। जब एक हॉस्टल का कमरा पुलिस की नजर में आ गया
पुराने छात्र बताते हैं कि आजादी से पहले विश्वविद्यालय के कुछ छात्रावास ऐसे थे, जहां पुलिस की नजर हमेशा बनी रहती थी। वजह यह नहीं थी कि वहां कोई अपराधी रहता था। वजह यह थी कि वहां रहने वाले कई छात्र अंग्रेजी राज के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते थे। उनके कमरों में किताबें थीं, पर्चे थे, राजनीतिक साहित्य था और सबसे बड़ी बात – बहस करने वाले साथी थे।
रात के खाने के बाद कमरे खुल जाते। कोई गांधी की बात करता, कोई सुभाष चंद्र बोस की, कोई समाजवाद पर बहस छेड़ देता। कई बार एक बहस आधी रात पार कर जाती। यह वही दौर था जब विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्था नहीं, बल्कि विचार गढ़ने वाली प्रयोगशाला बन चुका था। ब्रिटिश प्रशासन की गोपनीय रिपोर्टों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का उल्लेख कई बार मिलता है। शासन को यह चिंता रहती थी कि यहां से निकला कोई विचार अगले ही सप्ताह उत्तर भारत के दूसरे विश्वविद्यालयों तक पहुंच सकता है। इसलिए यहां होने वाली छात्र गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाती थी।
1942… जब तिरंगा लेकर सबसे आगे चलने वाला छात्र लौटकर नहीं आया
9 अगस्त 1942 के बाद पूरे देश में “भारत छोड़ो आंदोलन” फैल चुका था। इलाहाबाद भी उबल रहा था। विश्वविद्यालय के छात्र सड़कों पर उतर आए। उनके हाथों में तिरंगा था। नारे गूंज रहे थे। अंग्रेज प्रशासन ने जुलूस रोकने की कोशिश की। चेतावनी दी गई। भीड़ पीछे नहीं हटी।
समकालीन विवरणों के अनुसार, सबसे आगे चल रहे छात्र लाल पद्मधर गोली लगने से शहीद हो गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में यह घटना केवल एक शहादत नहीं थी। यह उस पीढ़ी का प्रतीक बन गई, जिसने किताब और संघर्ष – दोनों को साथ लेकर चलना सीखा था। आज भी विश्वविद्यालय परिसर में लाल पद्मधर का नाम केवल एक स्मारक की तरह नहीं लिया जाता। कई पुराने शिक्षक कहा करते थे कि “विश्वविद्यालयों का असली अर्थ समझना हो तो उस छात्र को याद करो, जिसने परीक्षा की जगह आजादी को चुना।”
वह कुलपति, जिसने पुलिस से कहा – ‘यहीं रुकिए’
लाल पद्मधर की शहादत के बाद हालात तनावपूर्ण थे। पुलिस विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करना चाहती थी। उस समय विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अमरनाथ झा थे। विश्वविद्यालय की परंपराओं और उपलब्ध विवरणों में यह प्रसंग दर्ज है कि उन्होंने परिसर की स्वायत्तता पर जोर देते हुए पुलिस के प्रवेश को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था। यह एक संदेश भी था कि विश्वविद्यालय केवल इमारतों का समूह नहीं होता; उसकी अपनी गरिमा और स्वायत्तता भी होती है।
आज जब विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस की मौजूदगी को लेकर बहस होती है, तब कई शिक्षाविद उस दौर को याद करते हैं, जब कुलपति अपने छात्रों से असहमत हो सकते थे, लेकिन विश्वविद्यालय की गरिमा पर समझौता नहीं करते थे।
इलाहाबाद में आंदोलन का मतलब सिर्फ नारे नहीं था
शहर के पुराने पत्रकार बताते हैं कि h में किसी बड़े छात्र आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा भीड़ केवल धरना स्थल पर नहीं होती थी। शाम होते-होते पुस्तकालयों, अखबारों के दफ्तरों और चाय की दुकानों पर बहसें शुरू हो जाती थीं।
कटरा की एक दुकान पर कोई संविधान की प्रति लेकर बैठा है। दूसरी मेज पर कोई अखबार की कटिंग पढ़ रहा है। तीसरी तरफ कोई छात्र अपने भाषण का मसौदा साथियों को सुना रहा है। असहमति भी होती थी, ठहाके भी लगते थे और कभी-कभी बहस इतनी लंबी खिंच जाती कि दुकान बंद होने का समय निकल जाता। यही इलाहाबाद की असली ताकत थी। यहां आंदोलन सड़क पर जितना चलता था, उतना ही दिमाग में भी चलता था।
एक पुराने प्रोफेसर ने कभी कहा था, “इलाहाबाद का छात्र अगर किसी बात से सहमत हो जाए, तो वह ताली बजाता है। अगर असहमत हो जाए, तो सवाल पूछता है। और अगर उसे जवाब न मिले, तो फिर सड़क पर उतर आता है।” यही वजह थी कि देश में जब-जब छात्र राजनीति की चर्चा होती, इलाहाबाद का नाम केवल एक विश्वविद्यालय के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में लिया जाता था।
अगर आप प्रयागराज के किसी ऐसे बुज़ुर्ग से मिलें, जिसने 1960 और 1970 के दशक का इलाहाबाद देखा हो, तो वह आपको शायद किसी आंदोलन की तारीख न बता पाए, लेकिन इतना जरूर कहेगा – “उस समय शहर में यह पता करने के लिए अखबार का इंतजार नहीं करना पड़ता था कि कोई आंदोलन हुआ है या नहीं। माहौल ही बता देता था।”
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सुबह विश्वविद्यालय की ओर जाने वाली सड़कों पर पुलिस की अतिरिक्त गाड़ियां दिखाई देतीं, दोपहर तक छात्र समूहों में बहस करते नजर आते और शाम होते-होते कटरा, कर्नलगंज, सिविल लाइंस और विश्वविद्यालय के आसपास की चाय की दुकानों पर वही चर्चा शुरू हो जाती। शहर की हवा बता देती थी कि कुछ घटने वाला है। इलाहाबाद की यही सबसे बड़ी विशेषता थी। यहां आंदोलन केवल नारे लगाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विचारों का सार्वजनिक उत्सव भी था। जब छात्रसंघ का चुनाव पूरे शहर का चुनाव बन जाता था
आज के छात्रसंघ चुनावों को देखकर शायद नई पीढ़ी को अंदाजा भी न हो कि कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की नर्सरी माना जाता था। चुनाव का मौसम शुरू होते ही दीवारें पोस्टरों से भर जाती थीं। उम्मीदवारों के भाषण सुनने के लिए केवल छात्र ही नहीं, शहर के लोग भी पहुंच जाते। सिविल लाइंस के कॉफी हाउस से लेकर लोकनाथ की गलियों तक यह चर्चा होती कि किस उम्मीदवार ने बेहतर भाषण दिया, किसने किस मुद्दे को उठाया और किसके पीछे किस विचारधारा का समर्थन है।
पुराने पत्रकार लिखते हैं कि छात्रसंघ के मंच पर दिया गया एक प्रभावशाली भाषण कई बार अगले दिन अखबारों की सुर्खी बन जाता था। यही कारण था कि राष्ट्रीय दल भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर नजर रखते थे। यहां छात्र नेता बनना केवल एक पद हासिल करना नहीं था। यह सार्वजनिक जीवन की पहली परीक्षा मानी जाती थी।
वह शहर, जहां भाषण भी सुने जाते थे और सवाल भी
इलाहाबाद की छात्र राजनीति की एक खूबी यह थी कि यहां भाषण देने से ज्यादा कठिन काम सवालों का जवाब देना होता था। विश्वविद्यालय परिसर में यदि कोई नेता आता, तो छात्र उससे केवल नारे नहीं लगवाते थे। वे पूछते थे – आपकी नीति क्या है? बेरोजगारी पर आपका विचार क्या है? शिक्षा पर सरकार क्या कर रही है? लोकतंत्र में छात्र की भूमिका क्या होनी चाहिए?
इसी कारण इलाहाबाद के छात्र “राजनीतिक” जरूर कहलाते थे, लेकिन उन्हें केवल भीड़ नहीं माना जाता था। वे बहस करने वाले छात्र थे। कई पुराने शिक्षकों ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि यहां छात्रों को पढ़ाना कभी-कभी कठिन हो जाता था, क्योंकि वे किताब से बाहर के सवाल भी पूछते थे। कक्षा खत्म होने के बाद भी चर्चा चलती रहती। प्रोफेसर अपने कमरे तक पहुंचते-पहुंचते कई बार विद्यार्थियों से घिर जाते। शायद यही वजह थी कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केवल “ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट” कहकर याद करना उसकी पूरी पहचान नहीं बताता। वह विचारों का अखाड़ा भी था।
जेपी आंदोलन और इलाहाबाद की धड़कन
सत्तर का दशक आते-आते देश का राजनीतिक तापमान बदल चुका था। भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन व्यवस्था को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने युवाओं को नई दिशा दी। इलाहाबाद पहले से ही राजनीतिक चेतना का केंद्र था। इसलिए यहां उस दौर की हलचल जल्दी महसूस हुई। विश्वविद्यालय के छात्र राष्ट्रीय घटनाओं को केवल अखबार की खबर की तरह नहीं देखते थे। वे अपने शहर, अपने परिसर और अपने भविष्य से उसका संबंध जोड़कर समझते थे।
आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगी पाबंदियों की चर्चा भी इलाहाबाद में खूब हुई। कई लोगों ने बाद में अपने संस्मरणों में लिखा कि उस समय शहर में बोलने से पहले लोग चारों तरफ देखकर बात करते थे, लेकिन विश्वविद्यालयों के भीतर बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई। स्वर धीमे हुए, सवाल नहीं।
आंदोलन का नया चेहरा: डिग्री नहीं, नौकरी का सवाल
समय आगे बढ़ा। आजादी का संघर्ष इतिहास बन चुका था। लोकतंत्र स्थापित हो चुका था। लेकिन एक नई चिंता सामने आई – रोजगार। प्रयागराज का चेहरा भी बदलने लगा। देशभर से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र यहां आने लगे। छात्रावासों की जगह किराये के कमरे भरने लगे। किताबों की दुकानों पर इतिहास और राजनीति के साथ-साथ सामान्य अध्ययन, संविधान, अर्थव्यवस्था और करंट अफेयर्स की किताबें दिखाई देने लगीं।
लेकिन एक चीज नहीं बदली – अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की परंपरा। परीक्षा में गड़बड़ी हुई तो छात्र सड़क पर आए। परिणाम में देरी हुई तो धरना हुआ। भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठे तो जुलूस निकला। विश्वविद्यालय का छात्र और प्रतियोगी छात्र – दोनों अलग वर्ग थे, लेकिन उनकी बेचैनी एक जैसी थी। दोनों अपने भविष्य की बात कर रहे थे।
लोक सेवा आयोग के बाहर की रातें
प्रयागराज में रहने वाले लोगों ने कई बार ऐसे दृश्य देखे हैं, जब उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के बाहर सैकड़ों छात्र रातभर बैठे रहे। कोई किताब पढ़ रहा है, कोई अखबार की कटिंग संभाल रहा है, कोई साथियों के लिए चाय लेकर लौट रहा है। यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं था। यह उस शहर की नई पहचान थी, जहां पहले स्वतंत्रता की लड़ाई के नारे गूंजते थे और अब पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग सुनाई देती थी।
मुद्दा बदल गया था, लेकिन प्रतिरोध का संस्कार वही था। शहर जैसे अपनी अगली पीढ़ी से कह रहा था – “सवाल पूछो, लेकिन तैयारी के साथ पूछो। विरोध करो, लेकिन तर्क के साथ करो।” इसीलिए प्रयागराज के आंदोलनों को केवल अतीत की कहानी समझना भूल होगी। वे हर दौर में नए रूप में सामने आए हैं।
इतिहास की किताबें अक्सर आंदोलनों को तारीखों में बांध देती हैं। अमुक दिन जुलूस निकला, अमुक दिन गिरफ्तारी हुई, अमुक दिन लाठीचार्ज हुआ। लेकिन शहरों की स्मृति अलग होती है। वह तारीखें नहीं, चेहरे याद रखती है। प्रयागराज भी ऐसा ही शहर है।
यहां किसी बुजुर्ग से पूछिए कि अमुक आंदोलन कब हुआ था, तो हो सकता है वह सटीक तारीख न बता पाए। लेकिन यह जरूर बता देगा कि उस दिन कटरा की दुकानों ने आधा शटर क्यों गिरा दिया था, छात्रावासों में रात भर रोशनी क्यों जलती रही थी और सिविल लाइंस की सड़कों पर पुलिस की गाड़ियों की आवाजाही अचानक क्यों बढ़ गई थी। यही किसी आंदोलन की असली विरासत होती है। यहां आंदोलन केवल छात्रों ने नहीं, शहर ने भी किए
प्रयागराज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां छात्र कभी अकेले नहीं दिखाई दिए। उनके पीछे एक पूरा सामाजिक परिवेश खड़ा दिखता था। पुराने अखबारों की रिपोर्टें पढ़ने पर बार-बार एक बात सामने आती है कि जब भी विश्वविद्यालय में कोई बड़ा विवाद हुआ, उसकी चर्चा केवल कैंपस तक सीमित नहीं रही। वकीलों के चेंबरों में वही विषय होता, पत्रकार उसी पर बहस करते, साहित्यकार अपनी राय लिखते और शहर के प्रतिष्ठित नागरिक भी खुलकर प्रतिक्रिया देते। यानी यहां विश्वविद्यालय शहर से अलग नहीं था। वह शहर की धड़कन का हिस्सा था।
आंदोलन की प्रयोगशाला क्यों बना प्रयागराज?
इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीति में नहीं, भूगोल और समाज में भी छिपा है। एक समय ऐसा था जब उत्तर भारत के सबसे मेधावी छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचना चाहते थे। कोई बिहार से आता था, कोई मध्य प्रदेश से, कोई राजस्थान से, कोई पूर्वांचल से। अलग-अलग भाषाएं, अलग-अलग संस्कृतियां, अलग-अलग विचार – लेकिन एक ही परिसर। जब इतने विविध अनुभव एक जगह मिलते हैं, तो बहसें स्वाभाविक हो जाती हैं। बहसें होती हैं, तो मतभेद पैदा होते हैं। मतभेद होते हैं, तो सवाल उठते हैं। और जब सवालों का समाधान नहीं मिलता, तो आंदोलन जन्म लेते हैं। इस अर्थ में प्रयागराज केवल आंदोलन का शहर नहीं था, वह लोकतंत्र का प्रशिक्षण केंद्र भी था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक पुरानी परंपरा रही कि यहां कक्षा और समाज के बीच दीवार बहुत मोटी नहीं थी। संविधान पढ़ने वाला छात्र जब न्यायालय की खबर पढ़ता था, तो उसे अपने पाठ्यक्रम का विस्तार लगता था। अर्थशास्त्र पढ़ने वाला छात्र महंगाई पर बहस करता था। राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी संसद की कार्यवाही पर टिप्पणी करता था।
शायद यही कारण था कि यहां शिक्षा और सामाजिक चेतना अक्सर साथ-साथ चलती रहीं। इसी परंपरा ने आगे चलकर पत्रकार, न्यायविद, लेखक, प्रशासक और राजनेता दिए। उनमें विचार अलग-अलग थे, लेकिन एक समानता थी – सवाल पूछने से डरते नहीं थे।
समय बदला, सवाल नहीं
आज का प्रयागराज 1942 वाला इलाहाबाद नहीं है। न छात्रावास पहले जैसे हैं, न छात्रसंघ की वैसी चमक है, न कॉफी हाउस की बहसें वैसी लंबी चलती हैं। मोबाइल फोन ने पोस्टरों की जगह ले ली है। पर्चों की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। भाषण अब मंच पर कम और लाइव स्ट्रीम में ज्यादा सुनाई देते हैं। लेकिन एक चीज आज भी वैसी ही है। जब किसी परीक्षा पर सवाल उठता है…, जब किसी भर्ती प्रक्रिया पर संदेह होता है…, जब युवाओं को लगता है कि उनके भविष्य के साथ न्याय नहीं हुआ…, तो प्रयागराज अब भी चुप नहीं रहता।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के बाहर धरने हों, शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों का प्रदर्शन हो, समीक्षा अधिकारी (RO) और सहायक समीक्षा अधिकारी (ARO) परीक्षा को लेकर उठे सवाल हों या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं का विरोध – पिछले वर्षों में प्रयागराज बार-बार इस बेचैनी का केंद्र बना। इन आंदोलनों ने यह दिखाया कि शहर की राजनीतिक चेतना केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, वर्तमान की भी वास्तविकता है।
क्या सचमुच यह भारत की छात्र आंदोलन राजधानी थी?
इस सवाल का जवाब शायद किसी सरकारी दस्तावेज में नहीं मिलेगा। लेकिन यदि किसी शहर ने एक साथ स्वतंत्रता आंदोलन, छात्रसंघ की तेज राजनीति, जेपी आंदोलन की गूंज, आपातकाल के प्रतिरोध और फिर प्रतियोगी छात्रों के लंबे आंदोलनों को लगातार देखा हो, तो उसे छात्र आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगशालाओं में गिनना अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रयागराज की पहचान किसी एक आंदोलन से नहीं बनी। उसकी पहचान उस निरंतरता से बनी, जिसमें हर पीढ़ी ने अपने समय का सवाल उठाया।
प्रयागराज को अक्सर तीन नदियों के संगम से पहचाना जाता है। लेकिन इस शहर का एक और संगम है, जिसकी चर्चा कम होती है। यहां विचारों का संगम है। यहां असहमति और संवाद का संगम है। यहां पुस्तकालय और सड़क का संगम है। यहां कक्षा और लोकतंत्र का संगम है।
शायद इसी कारण यह शहर बार-बार नई पीढ़ी को अपनी ओर खींचता है। यहां आने वाला छात्र केवल डिग्री लेकर नहीं लौटता। वह बहस करना सीखता है। असहमति व्यक्त करना सीखता है। और सबसे बढ़कर, सत्ता से सवाल पूछना सीखता है।
दिल्ली का जंतर-मंतर आज भी देशभर के आंदोलनों का प्रतीक है। लेकिन यदि उसकी आवाज की जड़ें तलाशनी हों, तो उनमें प्रयागराज की मिट्टी की गंध भी महसूस की जा सकती है। क्योंकि इस शहर ने पीढ़ियों को केवल पढ़ाया नहीं – उन्हें नागरिक भी बनाया।
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प्रयागराज में साहित्य लिखा ही नहीं जाता था, वह रोज जीया जाता था।” वरिष्ठ कथाकार रवीन्द्र कालिया ने अपने संस्मरणों में कई बार इस शहर का जिक्र किया है, जहां सुबह की शुरुआत अखबारों के दफ्तरों से होती थी, दोपहर विश्वविद्यालय की कक्षाओं में बीतती थी और शाम इंडियन कॉफी हाउस की मेजों पर उतर आती थी। उन मेजों पर चाय और कॉफी से ज्यादा शब्द उबलते थे। कोई नई कविता पर बहस कर रहा होता, कोई गालिब और निराला की तुलना में उलझा होता, तो किसी को नई कहानी आंदोलन की चिंता सताती थी। वहां बैठे लोगों में कोई प्रोफेसर था, कोई पत्रकार, कोई वकील और कोई सरकारी मुलाजिम। लेकिन रात होते-होते सबकी पहचान एक ही रह जाती थी – लेखक। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
