उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रयागराज तेजी से बदल रहे उत्तर भारत के उन शहरों में था, जहां नए रास्ते बन रहे थे और उनके साथ नई आवाजाही भी। 1859 में यहां से कानपुर के लिए रेल चली तो शहर का रिश्ता सिर्फ यात्रियों और माल के आवागमन से नहीं बदला। रेल के साथ अखबार, किताबें और नए विचार भी आने-जाने लगे। कुछ दशकों बाद रेलवे स्टेशन पर किताबों की दुकान खुली और इसी शहर से रेल यात्रियों के लिए किताबें छपने लगीं।

यानी प्रयागराज की आधुनिक कहानी में रेल सिर्फ परिवहन का साधन नहीं थी। उसने शहर को एक ऐसे नेटवर्क से जोड़ा, जिसमें यात्री ही नहीं, पाठक, लेखक, प्रकाशक और विचार भी सफर कर रहे थे। इसी बदलाव की एक दिलचस्प कहानी ए. एच. व्हीलर के उस बुकस्टॉल से शुरू होती है, जहां ट्रेन का इंतजार करने वाला यात्री किताब भी खरीद सकता था।

3 मार्च 1859 को इलाहाबाद, जिसका नाम अब प्रयागराज हो गया है, से कानपुर के बीच 119 मील लंबी रेल लाइन शुरू हुई। यह उत्तर भारत में रेल के शुरुआती विस्तार का महत्वपूर्ण पड़ाव था। बाद के वर्षों में प्रयागराज तेजी से फैलते रेल नेटवर्क से जुड़ता गया।

लेकिन प्रयागराज का भूगोल रेल के रास्ते में अपनी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ा था – यमुना। यमुना को पार किए बिना रेल आगे नहीं जा सकती थी। आखिरकार यहां रेलवे पुल बना और 15 जुलाई 1865 को इस पुल से पहली ट्रेन गुजरी। यह पुल प्रयागराज को रेल नेटवर्क में और मजबूती से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव था।

नदी के ऊपर पुल बना तो लोहे की पटरी आगे बढ़ी। लेकिन कुछ वर्षों बाद इसी पटरी के किनारे एक और चीज पहुंची, जिसने इस कहानी को साहित्य से जोड़ दिया – किताब।

स्टेशन पर ट्रेन के साथ किताब भी मिलने लगी

1877 में प्रयागराज जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर ए. एच. व्हीलर का पहला बुकस्टॉल शुरू हुआ। उपलब्ध विवरण के अनुसार फ्रांसीसी मूल के एमिली मोरो ने यहां यात्रियों की पढ़ने की जरूरत को देखते हुए किताबें बेचने का काम शुरू किया था। यही छोटा-सा प्रयोग आगे चलकर ए. एच. व्हीलर एंड कंपनी के बड़े कारोबार में बदल गया।

यानी रेलवे स्टेशन पर अब केवल ट्रेन का इंतजार नहीं होता था। वहां किताब भी खरीदी जा सकती थी।

आज यह बात शायद बहुत सामान्य लगे। लेकिन उस समय किताब तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। ऐसे में स्टेशन पर किताब मिलने का अर्थ था कि यात्रा और पढ़ने का रिश्ता एक ही जगह पर बन गया। यात्री जिस ट्रेन से शहर छोड़ रहा था, उसी यात्रा के लिए वह किताब भी साथ ले जा सकता था।

और ए. एच. व्हीलर की कहानी केवल एक बुकस्टॉल की कहानी नहीं थी। प्रयागराज इस कंपनी की शुरुआत की जगह ही नहीं, उसके कारोबार का प्रमुख केंद्र भी बना। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि कंपनी के प्रयागराज और लंदन दोनों जगह कार्यालय थे। बाद के कॉरपोरेट रिकॉर्ड में भी कंपनी का पंजीकृत पता 23, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग, प्रयागराज दर्ज है और कंपनी का स्टेटस सक्रिय है।

यानी कंपनी बंद नहीं हुई है, लेकिन रेलवे प्लेटफॉर्मों पर उसके पुराने दौर की मौजूदगी जरूर काफी सिमट चुकी है।

कभी देश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर दिखाई देने वाला वह नाम आज पहले जैसा आम नहीं है। रेलवे की बदलती बुकस्टॉल नीति और यात्रियों की बदलती पढ़ने की आदतों के बीच पुराने ढंग के व्हीलर स्टॉलों का दौर लगभग बीत चुका है। इसीलिए प्रयागराज जंक्शन का वह पुराना दृश्य – प्लेटफॉर्म और किताबों के बीच खड़ा ए. एच. व्हीलर – अब मुख्यतः स्मृति का हिस्सा है।

लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय अभी बाकी है।

प्रयागराज से निकली ‘रेलवे लाइब्रेरी’

1888 में ए. एच. व्हीलर ने ‘Indian Railway Library’ नाम से छोटी पुस्तिकाओं की एक श्रृंखला शुरू की। इनका उद्देश्य रेलवे यात्रियों के लिए ऐसी सस्ती और आसानी से साथ ले जाई जा सकने वाली पढ़ने की सामग्री उपलब्ध कराना था।

और इस श्रृंखला के शुरुआती लेखकों में एक ऐसा नाम था, जिसे आज दुनिया साहित्य के बड़े नामों में गिनती है – रुडयार्ड किपलिंग।

किपलिंग की Soldiers Three, The Story of the Gadsbys, In Black and White, Under the Deodars, The Phantom ’Rickshaw और Wee Willie Winkie जैसी रचनाएं 1888 में प्रयागराज से ए. एच. व्हीलर की Indian Railway Library में प्रकाशित हुईं। प्रिंसटन विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के पुस्तक-संग्रहों में इन प्रयागराज संस्करणों का रिकॉर्ड मौजूद है।

जरा इस दृश्य को देखिए।

रेलवे का एक स्टेशन। ट्रेन आने वाली है। यात्री अपनी यात्रा के लिए तैयार हैं। और उसी शहर से निकली छोटी-सी किताबें यात्रियों के हाथों में पहुंचने के लिए तैयार हैं।

रेल सिर्फ लोगों को नहीं ले जा रही थी, किताबें भी उसके साथ सफर कर रही थीं।

किपलिंग की ये किताबें बाद में इंग्लैंड और अमेरिका में भी प्रकाशित हुईं और उनकी शुरुआती प्रसिद्धि में इन संस्करणों की भूमिका रही। यानी प्रयागराज में तैयार हुई एक ऐसी पुस्तक-श्रृंखला, जिसका नाम ही ‘रेलवे लाइब्रेरी’ था, आगे चलकर विश्व साहित्य के इतिहास की एक छोटी लेकिन दिलचस्प कड़ी बन गई।

लेकिन उसी समय प्रयागराज में साहित्य की एक दूसरी पटरी भी तैयार हो रही थी।

स्टेशन के साथ शहर में किताबें भी छपने लगीं

1884 में चिंतामणि घोष ने प्रयागराज में इंडियन प्रेस की स्थापना की। आगे चलकर यह प्रेस हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। 1 जनवरी 1900 को इसी प्रेस से ‘सरस्वती’ पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित हुआ।

फिर 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बने। 1920 तक उनके संपादन में ‘सरस्वती’ हिंदी के साहित्यिक संसार की बेहद प्रभावशाली पत्रिका बन गई। शोध में भी इसे आधुनिक हिंदी साहित्य और सार्वजनिक बौद्धिक जीवन को आकार देने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका के रूप में दर्ज किया गया है।

अब प्रयागराज के बदलते हुए नक्शे को देखिए। एक तरफ रेलवे स्टेशन था, जहां किताबें बिक रही थीं। दूसरी तरफ प्रेस था, जहां किताबें और पत्रिकाएं छप रही थीं। बीच में रेल की पटरियां थीं, जो शहर को दूसरे शहरों से जोड़ रही थीं।

और इसी बदलते वातावरण में पाठक, लेखक, पत्रकार और विचार भी शहर की सीमाओं से बाहर जा रहे थे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी की अपनी जीवन-कथा भी इस कहानी में एक रोचक कड़ी जोड़ती है। वे भारतीय मिडलैंड रेलवे में तार बाबू के रूप में काम कर चुके थे। बाद में वही व्यक्ति ‘सरस्वती’ के संपादक बने और हिंदी साहित्य में ‘द्विवेदी युग’ के नाम से पहचाने जाने वाले दौर के केंद्र में आ गए।

यहां यह दावा करना ठीक नहीं होगा कि रेलवे ने प्रयागराज को साहित्यिक शहर बना दिया। ऐसा कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा। प्रयागराज के साहित्यिक विकास के पीछे शिक्षा, विश्वविद्यालय, प्रेस, प्रकाशन, पत्र-पत्रिकाएं, लेखकों का आना-जाना और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन जैसे अनेक कारण थे।

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लेकिन रेलवे ने इस बदलती दुनिया को गति और संपर्क का एक नया माध्यम जरूर दिया। रेल ने साहित्य पैदा नहीं किया, लेकिन साहित्य के सफर को आसान किया।

कभी प्रयागराज तक पहुंचने और यहां से आगे जाने के रास्ते सीमित थे। फिर रेल आई। रेलवे स्टेशन पर किताब मिलने लगी। उसी शहर से किताब छपने लगी। और वह किताब ट्रेन में बैठकर दूसरे शहर चली गई।

प्रयागराज की कहानी में यह बदलाव मामूली नहीं था। क्योंकि रेल के साथ शहर का संपर्क सिर्फ भौगोलिक नहीं रहा। वह विचारों, प्रकाशन और पाठकों के व्यापक नेटवर्क से भी जुड़ता गया।

यही वजह है कि प्रयागराज की साहित्यिक कहानी को केवल उसके लेखकों और कवियों के जरिए पढ़ना अधूरा है। उसे उसकी पटरियों, उसके पुल, उसके स्टेशन और उसके प्रेस से भी पढ़ना चाहिए।

और आज जब रेलवे स्टेशनों से पुराने ए. एच. व्हीलर के बुकस्टॉल लगभग गायब हो चुके हैं, तब इस कहानी का एक दूसरा अर्थ भी सामने आता है।

जिस रेलवे ने कभी किताब को पाठक तक पहुंचने का नया रास्ता दिया था, उसी रेलवे के बदलते दौर में वह पुराना रास्ता अब दिखाई कम देता है। कंपनी खत्म नहीं हुई है; उसका पंजीकृत पता आज भी प्रयागराज में दर्ज है और वह सक्रिय है। लेकिन स्टेशन पर किताब बेचने वाला वह पुराना दृश्य, जो कभी रेलवे यात्रा का हिस्सा हुआ करता था, अब इतिहास की स्मृति बनता जा रहा है।

शायद इतिहास का यही अपना ढंग है।

एक समय रेल आई तो उसने किताबों को रास्ता दिया। आज किताबें डिजिटल होकर रेल के बिना भी कहीं भी पहुंच जाती हैं। लेकिन प्रयागराज के पुराने रेलवे स्टेशन की वह कल्पना अब भी दिलचस्प है—ट्रेन खड़ी है, यात्री इंतजार कर रहे हैं और प्लेटफॉर्म पर किताबों का एक स्टॉल है। रेल ने शहर को रास्ते दिए। उन रास्तों पर लोग आए-जाए, अखबार पहुंचे, पत्रिकाएं पहुंचीं और किताबों ने भी सफर शुरू किया।

प्रयागराज की आधुनिक कहानी का यह अध्याय सिर्फ रेल के आने की कहानी नहीं है। यह उस समय की कहानी है, जब पटरियों के साथ शब्दों ने भी अपनी यात्रा शुरू की।

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