सुलेमसराय, गढ़ी सराय, खुल्दाबाद सराय… प्रयागराज में रहने वाला शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने इन नामों को न सुना हो। रोज हजारों लोग इन इलाकों और रास्तों से गुजरते हैं। कोई कार से जा रहा होता है तो कोई रिक्शों से निकलता है, कोई बाजार जा रहा होता है और कोई घर लौट रहा होता है। लेकिन शायद ही किसी के मन में यह सवाल आता हो कि इन नामों में बार-बार आने वाला ‘सराय’ आखिर किसकी याद है।

क्या यहां कभी सचमुच सरायें थीं? अगर थीं, तो उनमें कौन ठहरता था? वहां खाने-पीने की व्यवस्था कैसी होती थी? घोड़ों और बैलों का क्या होता था? और क्या इन्हीं सरायों के आसपास बसते-बसते प्रयागराज का शहर फैलता चला गया?

लगभग 1844-45 की बात है। प्रयागराज के पुराने शहर में चौक से आगे नकास कोहना और खुल्दाबाद सराय चौराहे से हिम्मतगंज की ओर बढ़ने पर खुशरोबाग के पुराने प्रवेश द्वार के दक्षिण-पश्चिम में कारोबारी गनेशी लाल केसरवानी का बड़ा मकान था। उनका परिवार प्रयागराज से लगभग 40 किलोमीटर दूर शंकरगढ़ रियासत से जुड़ा था, जहां उनके पूर्वज राजा शंकरगढ़ के यहां दीवान रह चुके थे। गनेशी लाल की कोई संतान नहीं थी।

उन्होंने अपनी संपत्ति का उपयोग समाज के काम और दूर-दूर से आने वाले व्यापारियों तथा यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था के लिए करने का निश्चय किया था। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। उनकी इच्छा पूरी होने से पहले ही उनका निधन हो गया। कुछ समय तक उनका मकान सराय की तरह इस्तेमाल होता रहा, लेकिन बाद में धीरे-धीरे उस पर कब्जे होते चले गए और उसकी मूल पहचान मिट गई।

अब वहां इतने मकान बन चुके हैं कि नए लोग उनको जानते भी नहीं होंगे। यह केवल एक मकान की कहानी नहीं है। यह उस दौर की याद है, जब प्रयागराज में ऐसी अनेक सरायें थीं, जो शहर की धड़कन मानी जाती थीं।

आज किसी होटल की पहचान उसके कमरों, भोजन, पार्किंग और इंटरनेट से होती है। लेकिन चार-पांच सौ वर्ष पहले किसी सराय की प्रतिष्ठा इस बात से तय होती थी कि वहां का पानी कितना साफ और मीठा है, यात्रियों को सुरक्षित ठहरने की जगह मिलती है या नहीं, घोड़ों और बैलों के लिए चारा उपलब्ध है या नहीं और भटियारा समय पर रोटी पका देता है या नहीं। उस समय सरायें केवल रात बिताने की जगह नहीं थीं। वे सफर की थकान मिटाने, खबरें बांटने, सौदे तय करने और नए रिश्ते बनाने का केंद्र थीं।

प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने मध्यकालीन भारत की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक मार्गों पर अपने शोध में लिखा है कि सरायें केवल यात्रियों के आराम की जगह नहीं थीं, बल्कि उस समय की आर्थिक व्यवस्था की धुरी थीं। जहां सड़क होती थी, वहां सराय बनती थी। जहां सराय होती थी, वहां बाजार विकसित होता था। और जहां बाजार बसता था, वहां धीरे-धीरे शहर आकार लेने लगता था।

यानी किसी भी नगर की समृद्धि का अंदाजा उसकी सरायों से भी लगाया जा सकता था। यही बात प्रयागराज पर भी पूरी तरह लागू होती है। यह शहर केवल प्रशासनिक या धार्मिक कारणों से नहीं बढ़ा, बल्कि उन रास्तों की वजह से भी विकसित हुआ, जिन पर लगातार लोग आते-जाते रहे।

17वीं सदी के चिकित्सक फ्रांस्वा बर्नियर ने दिलचस्प जानकारी दी

सत्रहवीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री और चिकित्सक फ्रांस्वा बर्नियर (François Bernier) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Travels in the Mogul Empire में भारतीय सरायों का बड़ा दिलचस्प चित्र खींचा है। उनके अनुसार एक ही सराय के आंगन में सैकड़ों यात्री, घोड़े, ऊंट और खच्चर दिखाई देते थे। अलग-अलग प्रदेशों से आए लोग अपने-अपने किस्से सुनाते, व्यापारी माल की कीमतों पर बातचीत करते और अगली यात्रा की तैयारी करते थे।

बर्नियर को कई भारतीय सरायें यूरोप की तुलना में अव्यवस्थित जरूर लगीं, लेकिन उन्होंने दिल्ली में मुगल शहजादी जहांआरा बेगम द्वारा बनवाई गई एक भव्य सराय की खुलकर प्रशंसा की और लिखा कि उसकी योजना और सुविधाओं से पेरिस भी बहुत कुछ सीख सकता है।

फ्रांसीसी यात्री ज्यां बातीस्त तावेर्निए ने सरायों को चलता फिरता बाजार कहा

एक और फ्रांसीसी यात्री और प्रसिद्ध जौहरी ज्यां बातीस्त तावेर्निए (Jean-Baptiste Tavernier), जिन्होंने उत्तर भारत की लंबी यात्राएं कीं, सरायों को केवल विश्राम स्थल नहीं बल्कि चलते-फिरते बाजार के रूप में देखा। उनके अनुसार कई बड़ी सरायों के भीतर लंबी-लंबी गलियां होती थीं, जिनके दोनों ओर दुकानदार कपड़ा, मसाले, रेशम, धातु के बर्तन और दूसरी जरूरत की चीजें बेचते थे। यानी सराय में ठहरने वाला यात्री बिना बाजार जाए भी अपनी लगभग हर जरूरत पूरी कर सकता था।

अगर उस समय किसी सराय में शाम ढलने के बाद पहुंचते, तो वहां का दृश्य आज के किसी होटल से बिल्कुल अलग दिखाई देता। तैयार भोजन हर जगह नहीं मिलता था। ज्यादातर यात्री वहीं आटा, चावल, दाल, घी, मक्खन, प्याज, मौसमी सब्जियां, दूध और दही खरीदते थे। कई जगह मांस भी उपलब्ध होता था। फिर सराय का भटियारा मामूली मेहनताना लेकर वही सामान पकाकर यात्रियों को परोस देता था। जिन बड़े व्यापारिक कारवां के साथ अपना रसोइया होता, वे अपना भोजन खुद बनवाते थे। दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय की सरायें आज के ढाबे, होटल और सामुदायिक रसोई – तीनों का मिला-जुला रूप थीं।

इंसानों के साथ-साथ उनके पशुओं की देखभाल भी सराय की जिम्मेदारी मानी जाती थी। लगभग हर बड़ी सराय में अस्तबल, घोड़ों के लिए पानी की चरही, बैलों और ऊंटों के बैठने की जगह, चारे का भंडार और बड़ा कुआं होता था। दूर-दूर से आने वाले व्यापारियों के लिए उनके पशु ही सबसे बड़ी पूंजी होते थे। इसलिए उनकी देखभाल उतनी ही जरूरी थी, जितनी यात्रियों की। कुछ सरकारी सरायों में यह सुविधा मुफ्त मिलती थी, जबकि निजी सरायों में इसके लिए अलग भुगतान करना पड़ता था।

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अक्सर यह माना जाता है कि पुराने समय में केवल वस्तु-विनिमय होता था, लेकिन मुगल काल तक आते-आते व्यापार काफी हद तक मुद्रा आधारित हो चुका था। शेरशाह सूरी द्वारा मानकीकृत रुपया, दाम और मोहुर जैसे सिक्के पूरे उत्तर भारत में प्रचलित थे। व्यापारी इन्हीं से भुगतान करते थे। हां, छोटे गांवों और सीमित लेन-देन में वस्तु-विनिमय की परंपरा भी बनी हुई थी। यानी उस दौर का भारत पूरी तरह नकद रहित भी नहीं था और पूरी तरह विनिमय आधारित भी नहीं।

शेरशाह सूरी को भारत में संगठित सड़क और सराय व्यवस्था का सबसे बड़ा निर्माता माना जाता है। उसने ग्रैंड ट्रंक रोड सहित प्रमुख मार्गों पर लगभग हर दो कोस पर सरायें बनवाईं। इन सरायों में यात्रियों के लिए कमरे, कुएं, मस्जिद, घोड़ों के लिए दाना, सरकारी डाक ले जाने वाले घुड़सवारों की व्यवस्था और कई स्थानों पर हिंदू तथा मुसलमान यात्रियों की जरूरतों के अनुरूप अलग-अलग रसोई तक बनाई गई थीं।

हर बड़ी सराय में शहना या शिकदार नाम का अधिकारी होता था, जिसके अधीन चौकीदार, पानी भरने वाले, रसोइये और दूसरे कर्मचारी काम करते थे। आधुनिक भाषा में कहें तो सराय अपने समय का होटल, ढाबा, डाकघर, पुलिस चौकी और सूचना केंद्र – सब कुछ एक साथ थीं।

इतिहासकार अबुल फज्ल और अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी लिखा

इतिहासकार अबुल फज्ल ने आइने-अकबरी में प्रयाग को सामरिक और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण नगर बताया है। वहीं उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने प्रयाग क्षेत्र का अध्ययन करते हुए यह समझने की कोशिश की कि शहर केवल किलों और इमारतों से नहीं बनते, बल्कि रास्तों और पड़ावों से भी विकसित होते हैं। यही वजह है कि किसी पुराने शहर के मोहल्लों के नाम भी उसके इतिहास के दस्तावेज बन जाते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संस्थापक माने जाने वाले अलेक्जेंडर कनिंघम ने उन्नीसवीं शताब्दी में प्रयाग, कौशांबी और आसपास के क्षेत्रों का विस्तृत सर्वेक्षण किया। उनकी कार्यशैली अपने समय से अलग थी। वे केवल प्राचीन ग्रंथों या राजकीय अभिलेखों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालते थे। वे उन ग्रंथों को साथ लेकर स्वयं पुराने मार्गों पर चलते, गांव-गांव पहुंचते, खंडहरों का निरीक्षण करते, स्थानीय लोगों की स्मृतियों और परंपराओं को सुनते और फिर इतिहास की बिखरी कड़ियों को जोड़ते थे।

कनिंघम ने प्रयाग को केवल एक धार्मिक नगर के रूप में नहीं देखा, बल्कि उत्तर भारत के प्राचीन व्यापारिक मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में समझा। उनके सर्वेक्षणों ने यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि किसी शहर का इतिहास केवल उसके मंदिरों, किलों और स्मारकों में नहीं, बल्कि उन रास्तों, पड़ावों और बस्तियों में भी छिपा होता है, जिनसे होकर सदियों तक लोग आते-जाते रहे।

आज सरायें लगभग इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। उनकी जगह होटल, गेस्ट हाउस, लॉज और एक्सप्रेस-वे ने ले ली है। लेकिन शहरों की तरह शब्द भी आसानी से नहीं मरते। वे अपने भीतर बीते समय की परतें संभाले रहते हैं।

शायद इसी कारण प्रयागराज के नक्शे पर दर्ज सुलेमसराय, गढ़ी सराय और खुल्दाबाद सराय जैसे नाम आज भी उस दौर की गवाही देते हैं, जब किसी शहर की पहचान उसके रेलवे स्टेशन या बस अड्डे से नहीं, बल्कि उसकी सरायों से होती थी। उन सरायों से जहां रास्ते मिलते थे, लोग मिलते थे और धीरे-धीरे एक शहर जन्म लेता था।

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1895 में प्रसिद्ध अमेरिकी साहित्यकार और ‘टॉम सॉयर’ तथा ‘हकलबेरी फिन’ के रचयिता मार्क ट्वेन प्रयागराज आए थे। भारत यात्रा के अपने अनुभवों को उन्होंने बाद में पुस्तक Following the Equator में दर्ज किया। प्रयागराज और यहां उमड़े विशाल जनसमूह को देखकर वे हैरान रह गए थे। उन्होंने लिखा कि आस्था की ऐसी शक्ति दुनिया में बहुत कम देखने को मिलती है, जो लाखों लोगों को कठिन यात्राएं तय करके एक जगह खींच लाए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक