किसी पुराने कागज पर तारीख लिखी हो- 29 जून 1789, कागज करीब ढाई सौ साल पुराना हो और उस पर लिखे शब्द आज की आंखों के लिए आसानी से पढ़े भी न जाएं। यह किसी कवि की पांडुलिपि नहीं, अदालत का एक परवाना है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने अभिलेखों में ऐसे कागज रखे हैं, जिनको देखकर अदालत और कानून की दुनिया का वह समय याद आता है जब फैसले और दूसरे अदालती कागज फारसी में लिखे जाते थे। हाईकोर्ट के संग्रहालय के मुताबिक वहां चार से पांच सौ साल पुराने दस्तावेज भी हैं। इनमें फैसले, डिक्री, आदेश, रुपकार, नोटिस और दूसरे दस्तावेज शामिल हैं। मुगल और दूसरे शासकों के फरमान भी इस संग्रह का हिस्सा हैं।

इन कागजों की कहानी आज के प्रयागराज से काफी पीछे जाती है। तब न इलाहाबाद हाईकोर्ट था और न अदालत की वह व्यवस्था, जिसे आज हम जानते हैं। इसलिए पुराने दस्तावेजों को सीधे आज के हाईकोर्ट से जोड़ना ठीक नहीं होगा। लेकिन आज हाईकोर्ट के पास मौजूद अभिलेख उस पुरानी न्याय व्यवस्था की एक झलक जरूर देते हैं।

1789 का परवाना और पुराने अदालती दस्तावेज

1966 में हाईकोर्ट की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर पुराने न्यायिक रिकॉर्ड की एक प्रदर्शनी लगाई गई थी। उस समय के मुख्य न्यायाधीश नसीरुल्लाह बेग ने अपने उद्घाटन भाषण में इस संग्रह के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि पुराने दस्तावेजों में सबसे शुरुआती कागजों में 29 जून 1789 को जारी एक परवाना भी था। उसी प्रदर्शनी में 18वीं और 19वीं सदी के ऐसे आदेश और डिक्री रखे गए थे, जिनकी भाषा बहुत ज्यादा फारसीकृत थी। पुराने हाथ से लिखे फैसले, कोर्ट फीस के स्टांप पेपर, पुराने राजाओं के अनुदान और मुगल बादशाहों के फरमान भी वहां थे।

उस 1789 के परवाने में क्या लिखा था, यह बात उपलब्ध रिकॉर्ड से साफ नहीं होती। इसलिए उसके बारे में कहानी गढ़ने की जरूरत नहीं है। इतना जरूर पता चलता है कि उस समय के न्यायिक दस्तावेजों की भाषा आज की अदालतों की भाषा से बहुत अलग थी।

पुराने कागजों में आने वाले कुछ शब्द आज भी सुनाई देते हैं, लेकिन उनका मतलब हर पाठक के लिए साफ नहीं होगा। मसलन, ‘फरमान’ शासक की ओर से जारी किया गया आधिकारिक आदेश होता था। ‘परवाना’ भी लिखित आदेश या अधिकार-पत्र के अर्थ में इस्तेमाल होता था। ‘डिक्री’ अदालत का वह औपचारिक फैसला या आदेश था जिसके आधार पर किसी मामले में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ती थी। ‘रुपकार’ अदालती कार्यवाही या मामले से जुड़े लिखित रिकॉर्ड के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द था। इन शब्दों को पुराने दस्तावेजों में पढ़ते हुए उस समय की अदालत की भाषा का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का संग्रहालय और अभिलेखागार

फारसी उस समय केवल साहित्य और दरबार की भाषा नहीं थी। अदालत के कामकाज में भी उसका इस्तेमाल होता था। हाईकोर्ट के संग्रहालय का आधिकारिक विवरण बताता है कि ब्रिटिश काल में हाईकोर्ट बनने से पहले अदालत की भाषा फारसी थी और संग्रहालय में उसी दौर के फारसी में लिखे फैसले और दूसरे रिकॉर्ड मौजूद हैं।

पुराने कागजों में सिर्फ फैसले ही नहीं थे। किसी मामले का आदेश, डिक्री, नोटिस, रुपकार या कोई दूसरा दस्तावेज भी इसी व्यवस्था का हिस्सा था। आज इनमें से कई शब्द सामान्य बातचीत में सुनाई नहीं देते। लेकिन उस समय अदालत के काम में इनकी अपनी जगह थी। फिर अदालत की भाषा को लेकर सवाल उठने लगे।

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन में यह सवाल धीरे-धीरे बड़ा हुआ कि अदालत की भाषा वही रहे जिसे न्यायाधीश और मुंशी जानते हैं या वह भाषा हो जिसे आम लोग समझ सकें। इस पर अधिकारियों और अदालतों में भी अलग-अलग राय थी। कुछ लोग फारसी को बनाए रखने के पक्ष में थे। उनका तर्क था कि फारसी में अदालती काम तेजी से होता है। दूसरी ओर यह बात भी कही जा रही थी कि लोगों को न्याय उनकी समझ की भाषा में मिलना चाहिए।

फारसी हटी, लेकिन उर्दू और शिकस्ता बनी रही

इस बहस का एक बड़ा पड़ाव 1837 में आया। Act XXIX of 1837 के बाद उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की अदालतों में फारसी की जगह हिंदुस्तानी को लाने का रास्ता साफ हुआ। यहां एक दिलचस्प बात है। उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में जिस हिंदुस्तानी को अदालत की भाषा बनाया गया, वह फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू थी। यानी फारसी भाषा हट रही थी, लेकिन उसकी लिपि और बहुत से कानूनी शब्द अदालतों की दुनिया में बने रहे।

इस बदलाव को आज के नजरिये से देखना आसान नहीं है। भाषा बदलना सिर्फ कागज पर एक सरकारी आदेश जारी कर देना नहीं था। अदालत में काम करने वाले मुंशी, वकील और दूसरे लोग भी इसके साथ बदल रहे थे। पुरानी भाषा जानने वालों के लिए नई व्यवस्था सीखना जरूरी हो गया था और नई व्यवस्था में काम करने वालों के सामने पुराने कागजों को समझने की चुनौती भी थी।

पुराने फैसलों को पढ़ना भी था एक हुनर

पुराने अदालती कागजों की एक और मुश्किल थी- उनकी लिखावट। फारसी में लिखने की एक शैली को ‘शिकस्ता’ कहा जाता था। यह तेज, बहती हुई लिखावट थी। अक्षर एक-दूसरे से जुड़ जाते थे और कई जगह बिंदु और दूसरे निशान भी साफ दिखाई नहीं देते थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक पुरानी स्मृति में इसे ऐसे ही मुश्किल ढंग से लिखी जाने वाली फारसी लिपि बताया गया है। उसमें यह भी दर्ज है कि पुराने अदालत के दस्तावेज पढ़ने के लिए शिकस्ता जानना जरूरी था।

यानी पुराने कागज को समझने में केवल भाषा ही मुश्किल नहीं थी। लिखावट भी एक अलग चुनौती थी। किसी मुंशी को फारसी आती हो, तब भी जरूरी नहीं कि वह हर पुराने अदालती कागज को आसानी से पढ़ सके।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का इतिहास भी इस बदलाव के साथ आगे बढ़ा। उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए हाईकोर्ट 1866 में स्थापित हुआ और उसने आगरा में काम शुरू किया। 1869 में इसे इलाहाबाद लाया गया। यानी आज जिस इलाहाबाद हाईकोर्ट को हम प्रयागराज से जोड़कर देखते हैं, उसकी संस्थागत शुरुआत यहां से कुछ साल बाद हुई।

इसीलिए हाईकोर्ट के संग्रहालय में रखे पुराने फारसी कागजों की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि वे बहुत पुराने हैं। वे उस न्याय व्यवस्था की याद दिलाते हैं, जो आज की व्यवस्था से अलग थी।

1966 की प्रदर्शनी के बारे में नसीरुल्लाह बेग ने भी यही बात कही थी। पुराने आदेशों, डिक्रियों और हाथ से लिखे फैसलों को देखकर अदालत की व्यवस्था में हुए बदलावों को समझा जा सकता है। पुराने कागजों में कोर्ट फीस के स्टांप से लेकर राजाओं के अनुदान और मुगल बादशाहों के फरमान तक थे।

पुराने कागजों में बचा न्याय व्यवस्था का एक दौर

इस संग्रह में एक और दिलचस्प दस्तावेज का उल्लेख मिलता है। हाईकोर्ट के संग्रहालय के विवरण में 17वीं सदी में संत तुलसीदास से जुड़ा बताया गया एक समझौता भी दर्ज है। यह बनारस में संपत्ति के बंटवारे के विवाद से संबंधित बताया गया है। दस्तावेज अवधी में लिखा है और उस पर बनारस के काजी की स्वीकृति की मुहर है।

यह दस्तावेज एक दूसरी बात भी बताता है। पुराने न्यायिक रिकॉर्ड केवल एक भाषा में नहीं मिलते। अलग-अलग समय और जगह के हिसाब से भाषाओं और लिखावट का इस्तेमाल भी बदलता रहा। फारसी के साथ अवधी जैसी भाषाओं में लिखे दस्तावेज भी सामने आते हैं।

आज इनमें से कई कागजों को बचाकर रखना अपने आप में एक बड़ा काम है। समय के साथ पुराने कागज कमजोर होते हैं। हाईकोर्ट के विधि संग्रहालय और अभिलेखागार में पुराने और दुर्लभ दस्तावेजों के संरक्षण के लिए अलग प्रयोगशाला भी है। वहां खराब और नाजुक दस्तावेजों का संरक्षण किया जाता है। संग्रहालय का नया भवन 2021 में शुरू हुआ।

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यह संग्रहालय अब सिर्फ अदालत के इतिहास को देखने की जगह नहीं है। यहां रखे दस्तावेजों से उस समय की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के बारे में भी जानकारी मिलती है। पुराने रिकॉर्ड शोध करने वालों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

प्रयागराज में आज अदालत की भाषा और कामकाज बदल चुके हैं। कागज भी बदल गए हैं और उन्हें संभालने का तरीका भी। फैसले कंप्यूटर पर लिखे जाते हैं, उनकी प्रतियां ऑनलाइन मिल जाती हैं और मुकदमों की जानकारी कुछ क्लिक में सामने आ सकती है।

लेकिन इसी शहर में ऐसे कागज भी सुरक्षित हैं, जिन पर किसी मुंशी ने हाथ से फैसला लिखा था। जिन पर तारीख लिखने का तरीका अलग था। जिनमें भाषा फारसी थी और लिखावट ऐसी कि उसे पढ़ने के लिए अलग से अभ्यास करना पड़ता था।

29 जून 1789 का वह परवाना आज भी इस लंबी कहानी का एक सिरा है। उस कागज पर क्या लिखा था, यह जानना शायद अभी बाकी है। लेकिन इतना जरूर पता चलता है कि प्रयाग और उत्तर भारत की न्याय व्यवस्था का एक दौर ऐसा भी था, जब अदालत की आवाज कागज पर फारसी में उतरती थी। वही कागज अब एक संग्रहालय में चुपचाप रखे हैं। अदालतें बदल गईं। भाषा बदल गई। कानून की किताबें बदल गईं। मगर पुराने कागजों में उस दुनिया की लिखावट अभी बची हुई है।

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इस पदनाम (Title) को प्राप्त करने वाले अधिवक्ता सामान्य वकीलों से अलग होते हैं और उन्हें कुछ विशेषाधिकार मिलते हैं, जैसे: अदालत में बहस करने की प्राथमिकता , विशिष्ट पोशाक पहनना तथा जटिल और महत्वपूर्ण मामलों में विशेष भूमिका निभाने होते हैं। वे सीधे मुवक्किल (Client) से प्रत्यक्ष रूप से फीस नहीं ले सकते, बल्कि एक अन्य वकील के माध्यम से ही केस ले सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक