प्रयाग में मुगल सत्ता केवल एक किले के रूप में नहीं आई थी। उसके साथ सैनिक आए, कारोबारी आए, सूफी आए, शिल्पकार आए और फिर संगम किनारे शहर का एक नया दायरा बनना शुरू हुआ। अकबर के दौर में किले के आसपास जो बस्तियां उभरीं, उन्होंने आगे चलकर इलाहाबाद के सामाजिक और सांस्कृतिक भूगोल को बदल दिया। दरियाबाद, रसूलाबाद, कटरा और शाहगंज जैसे इलाकों के विस्तार उसी दौर की कहानी कहते हैं।

16वीं सदी के आखिर में अकबर ने जब प्रयाग को अपने साम्राज्य की नजर से देखना शुरू किया, तब यह शहर मुख्यतः तीर्थ, घाटों और अस्थायी मेलों का केंद्र था। गंगा और यमुना के रास्ते पूर्वी भारत तक पहुंच आसान थी। उत्तर भारत, बंगाल और मध्य भारत को जोड़ने वाले मार्ग यहां से गुजरते थे। यही वजह थी कि मुगल दरबार ने प्रयाग को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामरिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी देखना शुरू किया।

इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1583-84 के आसपास अकबर ने यहां विशाल किले के निर्माण का आदेश दिया। इसके साथ ही प्रयाग का स्वरूप बदलने लगा। जहां पहले साधुओं, स्थानीय बस्तियों और तीर्थ यात्रियों का प्रभाव था, वहां अब फौजी चौकियां, शाही दफ्तर और नई आबादियां बनने लगीं। किले के आसपास सैनिकों, व्यापारियों, घुड़सवारों, कारीगरों और प्रशासनिक कर्मचारियों की मौजूदगी बढ़ी। इन्हीं के साथ मुस्लिम आबादी का दायरा भी फैलने लगा।

इलाहाबास से इलाहाबाद तक

प्रयाग को मुगल काल में मिले नए नाम को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि अकबर ने सबसे पहले इस शहर का नाम “इलाहाबास” रखा था। यह शब्द “इलाहा” या “इलाही” और “बास” से मिलकर बना माना जाता है, जिसका अर्थ “ईश्वर का निवास” या “दैवी नगर” जैसा समझा जाता है। उस दौर में प्रयाग केवल हिंदू तीर्थस्थल भर नहीं था, बल्कि यहां सूफी परंपराओं, खानकाहों, मजहबी मरकजों और विभिन्न धार्मिक धाराओं की भी मौजूदगी थी।

अकबर के किले, पुराने मोहल्लों और मुगलकालीन बसावटों को दिखाता प्रयागराज का ऐतिहासिक दृश्य
पुराने शहर की गलियां, मुगलकालीन बसावटें और अकबर के दौर में विकसित हुए ऐतिहासिक इलाके। (Image Source: Social Media)

कई इतिहासकार मानते हैं कि अकबर ने प्रयाग के इसी बहुधार्मिक और रूहानी स्वरूप को ध्यान में रखकर इसे नया नाम दिया। कुछ विद्वान इस नाम को अकबर की ‘दीन-ए-इलाही’ और ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति से भी जोड़ते हैं, इसलिए उनके अनुसार यह नाम किसी एक धर्म विशेष के बजाय एक व्यापक दैवी अवधारणा को दर्शाता था। बाद के दौर में यही नाम “इलाहाबाद” के रूप में ज्यादा प्रचलित हुआ।

“इलाहाबाद” फारसी-अरबी प्रभाव वाला शब्द माना जाता है, जिसमें “अल्लाह” का अर्थ ईश्वर और “आबाद” का अर्थ बसाया हुआ नगर होता है, यानी “ईश्वर का नगर” या “अल्लाह का बसाया शहर”। मुगल प्रशासनिक दस्तावेजों और बाद में अंग्रेजी अभिलेखों में “Allahabad” नाम अधिक दिखाई देता है। हालांकि इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद हैं कि अकबर के समय मूल नाम “इलाहाबास” था, जो बाद में “इलाहाबाद” बना, या फिर दोनों नाम लगभग एक साथ प्रचलन में रहे। मुगलकालीन ग्रंथों और दस्तावेजों में दोनों रूपों का उल्लेख मिलता है।

मुगलकालीन ग्रंथ अकबरनामा (Akbarnama) और आइने अकबरी (Ain-i-Akbari) में प्रयाग का उल्लेख मिलता है। दरबारी इतिहासकार अबुल फजल (Abu’l-Fazl) ने इस क्षेत्र को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है। यह लगभग तय माना जाता है कि अकबर के दौर में प्रयाग एक नए राजनीतिक और शहरी दौर में प्रवेश कर चुका था।

किले के आसपास जो नई बस्तियां उभरीं, उन्होंने शहर की सामाजिक संरचना बदल दी। दरियाबाद नदी किनारे विकसित हुई बसावट थी। रसूलाबाद में बाद के दौर में मुस्लिम आबादी का प्रभाव बढ़ा। कटरा व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र बनने लगा। शाहगंज और अटाला जैसे इलाके भी धीरे-धीरे पुराने शहर की पहचान का हिस्सा बन गए। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि कई दशकों में आकार लेता गया।

सूफी मरकज और बदलता शहर

प्रयाग का मुस्लिम दायरा केवल फौज या प्रशासन तक सीमित नहीं था। यहां सूफी परंपरा की मौजूदगी भी दिखाई देती है। पुराने इलाकों में फैली छोटी दरगाहें, खानकाहें और मजारें उस दौर की याद दिलाती हैं, जब शहर केवल सत्ता का नहीं, बल्कि रूहानी मेलजोल का भी केंद्र बन रहा था। संगम आने वाले यात्रियों, फकीरों और व्यापारियों के बीच सांस्कृतिक संवाद की एक नई परंपरा विकसित हुई।

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दिलचस्प बात यह है कि अकबर ने प्रयाग के धार्मिक महत्व को खत्म करने की कोशिश नहीं की। उसने इस शहर को अपने साम्राज्य में शामिल किया, लेकिन उसकी आस्था-परंपरा को भी समझा। यही कारण है कि किले के भीतर स्थित अक्षयवट और पातालपुरी मंदिर का उल्लेख भी इतिहास में मिलता है। वे आज भी किले के भीतर मौजूद हैं, हालांकि समय के साथ इन स्थलों तक पहुंच और नियंत्रण को लेकर कई बदलाव हुए।

आज भी अकबर किला उस दौर की सबसे बड़ी निशानी है। संगम किनारे खड़ा यह किला केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि प्रयाग के बदलते इतिहास का दस्तावेज है। इसकी दीवारों ने मुगल सैनिकों की आवाजाही भी देखी और अंग्रेजी हुकूमत की परेड भी। बाद में अंग्रेजों ने इसी शहर को अपने प्रशासनिक ढांचे के हिसाब से ढालना शुरू किया। सिविल लाइंस बसाई गई, चौड़ी सड़कें बनीं, अदालतें और शैक्षणिक संस्थान खड़े हुए। लेकिन पुराने इलाहाबाद के मोहल्ले अपने भीतर मुगल दौर की परतें बचाए रहे।

बहती जमीन पर बसता और मिटता एक जीवित शहर, प्रयागराज | संगम तीरे

पुराने शहर की गलियों में आज भी यह इतिहास सांस लेता दिखाई देता है। अटाला की गलियां, चौक के आसपास की पुरानी दुकानें, नदी किनारे की बस्तियां और पुराने कब्रिस्तानों की खामोशी उस दौर की याद दिलाती है, जब प्रयाग धीरे-धीरे इलाहाबाद में बदल रहा था।

हालांकि प्रयागराज का इतिहास केवल किसी एक सत्ता या समुदाय की कहानी नहीं है। यह शहर हमेशा कई परतों में विकसित हुआ। यहां अखाड़ों की परंपरा भी रही, सूफी फकीरों की महफिलें भी सजीं। यहां कुंभ के मेले भी लगे और शाही फौजों के डेरों ने भी जगह ली। यही वजह है कि इस शहर का इतिहास किसी एक रंग में नहीं दिखता।

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। नई सड़कें बनीं, पुरानी बस्तियां सिकुड़ीं, कई ऐतिहासिक इमारतें गायब हो गईं। लेकिन शहर का भूगोल अब भी अपने भीतर पुराने दौर की परछाइयां लिए हुए है। दरियाबाद से रसूलाबाद तक और किले से चौक तक फैला इलाका आज भी उस कहानी को अपने भीतर छिपाए हुए है, जब अकबर ने संगम किनारे केवल किला नहीं बनवाया था, बल्कि एक नए शहरी दायरे की नींव रखी थी।

शायद यही प्रयागराज की सबसे बड़ी खासियत है। यह शहर हर दौर को अपने भीतर समेट लेता है। यहां इतिहास किसी संग्रहालय में बंद नहीं मिलता, बल्कि गलियों, मोहल्लों, घाटों और पुराने नामों में बिखरा हुआ दिखाई देता है। और उन्हीं बिखरे हुए नामों के बीच आज भी अकबर के दौर का वह मुस्लिम दायरा मौजूद है, जिसने प्रयाग के नक्शे को हमेशा के लिए बदल दिया।

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प्रयागराज की भीड़ में अगर आज अचानक घोड़ों की टाप सुनाई दे, तो लोग रुककर मोबाइल निकाल लेंगे, वीडियो बनाएंगे, रील बनाएंगे, और कुछ सेकंड में वह दृश्य शहर से निकलकर दुनिया तक पहुंच जाएगा। लेकिन एक समय था, जब यही टापें किसी रील का हिस्सा नहीं, बल्कि शहर की धड़कन हुआ करती थीं। और उन्हीं टापों के साथ कभी-कभी एक चेहरा भी गुजरता था – जवाहरलाल नेहरू – जो तब सिर्फ एक राष्ट्रीय नेता नहीं, अपने शहर का जाना-पहचाना आदमी था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक