1895 में प्रसिद्ध अमेरिकी साहित्यकार और ‘टॉम सॉयर’ तथा ‘हकलबेरी फिन’ के रचयिता मार्क ट्वेन प्रयागराज आए थे। भारत यात्रा के अपने अनुभवों को उन्होंने बाद में पुस्तक Following the Equator में दर्ज किया। प्रयागराज और यहां उमड़े विशाल जनसमूह को देखकर वे हैरान रह गए थे। उन्होंने लिखा कि आस्था की ऐसी शक्ति दुनिया में बहुत कम देखने को मिलती है, जो लाखों लोगों को कठिन यात्राएं तय करके एक जगह खींच लाए।

लेकिन प्रयागराज की कहानी केवल इतनी नहीं थी। उस दौर में यह शहर अपने धार्मिक महत्व से कहीं आगे बढ़कर भाषाओं, विचारों, पत्रकारिता, शिक्षा और राजनीति का ऐसा साझा मंच बन चुका था, जहां पूरे भारत की आवाजें एक-दूसरे से संवाद करती थीं।

अगर आप उसी दौर के प्रयागराज की किसी सड़क पर कुछ देर खड़े हो जाते, तो आपको लगता कि पूरा भारत आपके आसपास बोल रहा है। चौक और लोकनाथ की गलियों में खड़ी बोली और उर्दू सुनाई देती, कटरा में अवधी और भोजपुरी का रंग बदल जाता, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बरामदों में बंगला बोलते छात्र बहस कर रहे होते, हाईकोर्ट की सीढ़ियों पर अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू साथ-साथ चलतीं, और माघ के दिनों में संगम की ओर जाते रास्तों पर नेपाल, तिब्बत, श्रीलंका और बर्मा से आए यात्रियों की अलग-अलग बोलियां सुनाई देतीं। यह किसी मेले या सम्मेलन का अस्थायी दृश्य नहीं था। यह उस दौर के प्रयागराज की रोजमर्रा की जिंदगी थी।

आज जब “ग्लोबल सिटी” शब्द बड़े गर्व से बोला जाता है, तब शायद बहुत कम लोगों को याद है कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी का प्रयागराज अपने समय का सबसे बड़ा भारतीय कॉस्मोपॉलिटन शहर था – एक ऐसा शहर जहां केवल नदियां नहीं, बल्कि भाषाएं, संस्कृतियां, विचार और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की बौद्धिक धाराएं आकर मिलती थीं।

रेलवे ने शहर को देश से नहीं, दुनिया से जोड़ दिया

1857 के बाद अंग्रेजी सरकार ने प्रयागराज को केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं बनाया। यहां रेलवे का बड़ा जंक्शन विकसित हुआ। उत्तर, पूर्व, मध्य और पश्चिम भारत से आने वाली रेलगाड़ियां यहां मिलती थीं। गंगा का जलमार्ग, ग्रैंड ट्रंक रोड और रेलवे – इन तीनों ने मिलकर प्रयागराज को ऐसा चौराहा बना दिया, जहां किसी भी दिशा से आने वाला यात्री देर-सबेर पहुंच ही जाता था।

स्टेशन पर उतरिए तो लगता था जैसे पूरा भारत एक ही प्लेटफॉर्म पर खड़ा हो। कोई बनारस जा रहा है, कोई लाहौर से आया है, कोई कलकत्ता से और कोई बंबई से। हर चेहरे के साथ एक नई बोली, नया पहनावा और नई संस्कृति उतरती थी।

1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी इमारतें नहीं थीं, बल्कि वहां आने वाले लोग थे। बंगाल के मेधावी छात्र यहां पढ़ने आते थे। पंजाब के नौजवान कानून की पढ़ाई के लिए पहुंचते थे। मध्य भारत, बिहार, उड़ीसा और राजपूताना से भी छात्र यहां दाखिला लेते थे। छात्रावासों में रात-रात भर बहसें चलती थीं – कहीं साहित्य पर, कहीं राजनीति पर, कहीं दर्शन पर। एक कमरे में हिंदी की चर्चा होती थी, दूसरे में अंग्रेजी साहित्य पर बहस, तीसरे में संस्कृत का व्याकरण और चौथे में उर्दू की गजलें पढ़ी जा रही होती थीं। यही कारण था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाला संस्थान नहीं रहा; वह विचारों की प्रयोगशाला बन गया।

उस दौर के छात्र जीवन की झलक बाद में हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा में भी मिलती है। बच्चन ने इलाहाबाद को केवल अपना शहर नहीं, बल्कि अपने बौद्धिक निर्माण की भूमि माना। विश्वविद्यालय की बहसें, साहित्यिक गोष्ठियां और अलग-अलग प्रांतों से आए छात्रों का मेल-जोल उनकी स्मृतियों में बार-बार दिखाई देता है। ऐसा लगता है जैसे उस समय विश्वविद्यालय का हर बरामदा एक खुला मंच था, जहां विचारों का आदान-प्रदान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना पाठ्यक्रम।

इसी वातावरण का एक दूसरा चेहरा सिविल लाइंस में दिखाई देता था। चौड़ी सड़कें, चर्च, क्लब, होटल और सरकारी दफ्तरों के बीच अंग्रेज अधिकारी, स्कॉटिश मिशनरी और आयरिश शिक्षक रहते थे। मिशन स्कूलों में विदेशी शिक्षक पढ़ाते थे और उनके छात्र भारतीय होते थे। कक्षा के भीतर अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी, तो बाहर हिंदी और उर्दू की आवाजें सुनाई देती थीं। यहीं से ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जो भारतीय भी थी और विश्व-दृष्टि से भी परिचित।

किताबों की खुशबू में बोलती थीं कई भाषाएं

इसी दौर में सी.वाई. चिंतामणि जैसे पत्रकारों ने इलाहाबाद को राष्ट्रीय पत्रकारिता का केंद्र बना दिया। द लीडर अखबार का दफ्तर केवल समाचार छापने की जगह नहीं था, बल्कि देशभर के बुद्धिजीवियों और नेताओं का मिलन-स्थल भी था। कहा जाता है कि वहां कभी राजनीति पर बहस चलती थी तो कभी साहित्य पर। संपादकीय कक्ष कई बार किसी विश्वविद्यालय की कक्षा जैसा लगने लगता था।

उस समय बंगाल भारतीय नवजागरण का केंद्र था और उसके प्रभाव की सबसे मजबूत प्रतिध्वनि प्रयागराज में सुनाई देती थी। बंगाली विद्वान यहां आए, अध्यापक बने, संपादक बने और प्रकाशन संस्थानों से जुड़े। वे केवल अपनी भाषा नहीं लाए, बल्कि सोचने का नया तरीका भी साथ लाए।

अगर किसी लेखक को गंभीरता से पढ़ा जाना होता, तो उसकी किताब का प्रयागराज पहुंचना लगभग तय था। इंडियन प्रेस, लीडर प्रेस और हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी संस्थाओं ने शहर को छपाई और प्रकाशन का केंद्र बना दिया। बंगला से अनुवाद हो रहे थे, संस्कृत ग्रंथों का संपादन हो रहा था, अंग्रेजी किताबों पर चर्चा होती थी और उर्दू पत्रिकाएं निकल रही थीं। किताबों की दुकानों में केवल किताबें नहीं बिकती थीं, विचारों का लेन-देन होता था।

कई बार ऐसा भी होता कि एक ही मेज पर बैठा व्यक्ति हिंदी में लेख लिख रहा है, उसके सामने वाला अंग्रेजी का संपादकीय सुधार रहा है और तीसरा उर्दू अखबार के लिए खबर तैयार कर रहा है। यह दृश्य आज किसी साहित्यिक फिल्म का हिस्सा लग सकता है, लेकिन उस समय प्रयागराज में यह रोजमर्रा की बात थी।

अदालत, जहां कानून भी कई भाषाओं में सांस लेता था

इलाहाबाद हाईकोर्ट केवल न्याय का केंद्र नहीं था, भाषाओं का भी संगम था। वकील अंग्रेजी में दलील तैयार करते थे, लेकिन मुवक्किल से हिंदी, उर्दू, अवधी या भोजपुरी में बात करते थे। अदालत के बाहर खड़े टाइपिस्ट अंग्रेजी और हिंदी दोनों में अर्जियां टाइप करते दिखाई देते थे। पुराने दस्तावेजों में फारसी की छाया भी मिल जाती थी। एक ही मुकदमे के दौरान कई भाषाएं साथ-साथ चलती थीं।

यही बहुभाषी संस्कृति शहर के साहित्यिक जीवन में भी दिखाई देती थी। चौक और खुल्दाबाद की गलियों में उर्दू की रवानी थी, दारागंज में संस्कृत की परंपरा जीवित थी और विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का प्रभाव था। हिंदी तेजी से आधुनिक रूप ले रही थी।

इलाहाबाद की इस साझा संस्कृति का सबसे सुंदर प्रतिनिधित्व शायद फिराक गोरखपुरी करते हैं। वे उर्दू के बड़े शायर थे, लेकिन उनकी दृष्टि किसी एक भाषा की सीमाओं में बंधी नहीं थी। विश्वविद्यालय के गलियारों में उन्हें सुनने वाले छात्रों में हिंदी वाले भी होते थे और अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वाले भी। फिराक की मौजूदगी खुद इस बात का प्रमाण थी कि इलाहाबाद में भाषा पहचान की दीवार नहीं, संवाद का पुल थी।

गंगा किनारे दुनियाभर के लोगों का मिलन होता था

प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर ने उत्तर भारत के नगरों और मेलों का वर्णन करते हुए कई बार उस सांस्कृतिक रंगत की ओर ध्यान दिलाया है, जहां अलग-अलग प्रदेशों के लोग एक ही स्थान पर मिलकर एक नई सामाजिक तस्वीर रचते दिखाई देते हैं। प्रयाग का मेला उस अनुभव का सबसे विराट रूप था।

आज कुंभ में विदेशी श्रद्धालुओं को देखकर लोग चकित हो जाते हैं, लेकिन यह परंपरा नई नहीं है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भी भारत आने वाले अनेक विदेशी यात्री प्रयाग का रुख करते थे। कोई भारतीय समाज को समझने आता था, कोई धर्म को, कोई शिक्षा व्यवस्था को और कोई यह देखने कि आखिर लाखों लोग बिना किसी सरकारी निमंत्रण के एक जगह कैसे इकट्ठा हो जाते हैं।

इसी दौरान श्रीलंका और बर्मा से आए बौद्ध भिक्षु बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर की यात्रा के क्रम में प्रयाग भी पहुंचते थे। नेपाल और तिब्बत के साधु-संत भी हिमालय से उतरकर यहां आते थे। उनके वस्त्र अलग थे, उनकी भाषा अलग थी, लेकिन संगम पर पहुंचकर वे भी उसी आकाश के नीचे बैठते थे, जहां देश के कोने-कोने से आए साधु-संत डेरा डाले रहते थे।

कई विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांतों में इलाहाबाद बार-बार दिखाई देता है। कहीं इसे प्रशासनिक राजधानी कहा गया, कहीं शिक्षा का केंद्र, कहीं धार्मिक नगर और कहीं ऐसा शहर, जहां भारत की आत्मा को एक साथ देखा जा सकता है।

राजनीति भी कई भाषाओं में बोलती थी

इलाहाबाद केवल साहित्य का नहीं, राजनीति का भी संगम था। कांग्रेस के अधिवेशन हों, नेताओं की बैठकें हों या स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीतियां—इस शहर में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते थे। महाराष्ट्र से आए नेता अपने अनुभव साझा करते थे। पंजाब के क्रांतिकारी योजनाएं बनाते थे। बंगाल के बुद्धिजीवी राष्ट्रवाद पर बहस करते थे। दक्षिण भारत से आए प्रतिनिधि अपनी चिंताएं रखते थे।

किसी बैठक में मराठी सुनाई देती थी, तो दूसरी में पंजाबी। कहीं अंग्रेजी में प्रस्ताव तैयार हो रहा था, तो कहीं हिंदी और उर्दू में भाषण लिखे जा रहे थे। आज के राजनीतिक सम्मेलन शायद इससे कहीं बड़े हों, लेकिन विचारों की विविधता शायद ही कहीं इतनी स्वाभाविक रही हो।

पंडित मदन मोहन मालवीय जब प्रयाग आते थे, तो उनके आसपास केवल उत्तर प्रदेश के लोग नहीं होते थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्यार्थी, शिक्षक और कार्यकर्ता उनसे मिलने पहुंचते थे। यही वह वातावरण था जिसमें राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा भी बहुभाषी बन रही थी।

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जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में प्रयागराज को केवल अपना गृहनगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की एक प्रयोगशाला के रूप में देखा है। आनंद भवन में होने वाली बैठकों में कभी बंगाल के नेता होते थे, कभी पंजाब के, कभी दक्षिण भारत के प्रतिनिधि। एक शहर के भीतर पूरा देश संवाद करता दिखाई देता था।

यह शहर लोगों को केवल ठिकाना नहीं देता था, पहचान भी देता था। कई लोग नौकरी के लिए आए और यहीं बस गए। कई पढ़ने आए और अध्यापक बन गए। कई मुकदमे लड़ने आए और यहीं वकालत करने लगे। शायद इसी कारण कहा जाता था कि प्रयागराज आदमी को बदल देता है।

फिर धीरे-धीरे बदल गया सब कुछ

शायद यही वजह है कि हरिवंश राय बच्चन से लेकर नेहरू तक, और फिराक से लेकर असंख्य छात्रों, वकीलों, पत्रकारों और लेखकों तक, जिसने भी अपने जीवन का कुछ समय इलाहाबाद में बिताया, उसकी स्मृतियों में यह शहर केवल एक भौगोलिक स्थान बनकर नहीं रहा। वह एक अनुभव बन गया – ऐसा अनुभव जिसमें भारत की विविध आवाजें एक-दूसरे से बात करती थीं।

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। राजधानी लखनऊ चली गई। प्रकाशन संस्थानों का केंद्र दिल्ली बन गया। राजनीति के केंद्र भी बदल गए। रेलवे की वही केंद्रीय भूमिका नहीं रही। देश के बड़े विश्वविद्यालय अनेक शहरों में खुल गए। लोगों का आना-जाना कम नहीं हुआ, लेकिन वह बौद्धिक संगम, जो कभी इस शहर की सबसे बड़ी पहचान था, धीरे-धीरे बिखरने लगा।

फिर भी, अगर आप ध्यान से देखें तो वह इलाहाबाद आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हाईकोर्ट की सीढ़ियों पर आज भी दूर-दराज जिलों से आए लोगों की अलग-अलग बोलियां सुनाई देती हैं। विश्वविद्यालय के परिसर में आज भी देश के कई हिस्सों से छात्र आते हैं। संगम पर आज भी अलग-अलग भाषाओं में प्रार्थनाएं होती हैं। चौक की गलियों में आज भी पुरानी तहजीब सांस लेती है। और सिविल लाइंस की कुछ इमारतें आज भी उस दौर की गवाही देती हैं, जब यह शहर सचमुच दुनिया के लिए खुला हुआ था।

प्रयागराज को लोग तीर्थराज इसलिए कहते हैं क्योंकि यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है। लेकिन इतिहास का एक और संगम भी यहीं था – भाषाओं का, विचारों का, संस्कृतियों का और लोगों का।

यही वह शहर था जहां एक बंगाली संपादक हिंदी का भविष्य लिख रहा था, एक उर्दू शायर भारतीयता की नई परिभाषा गढ़ रहा था, एक अंग्रेज प्रोफेसर भारतीय छात्रों को पढ़ा रहा था, एक मराठी नेता स्वराज की बात कर रहा था और एक पंजाबी क्रांतिकारी आजादी का सपना देख रहा था।

शायद इसी कारण प्रयागराज केवल नक्शे पर बसा एक शहर नहीं था। वह एक विचार था, यह विश्वास कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। और शायद यही वजह है कि जो लोग कभी इस शहर में रहे, वे बाद में कहीं भी चले गए हों, अपने भीतर थोड़ा-सा प्रयागराज हमेशा साथ ले गए।

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प्रयागराज का नदी तट वाला क्षेत्र बाहर से देखने पर एक स्थिर जगह लगता है, लेकिन यहां खड़े होकर थोड़ी देर रुकिए तो समझ आता है कि यह जगह स्थिर बिल्कुल नहीं है। कभी सामने दूर तक फैली रेत दिखती है, तो कभी वही जगह पानी से भर जाती है। जैसे धरती हर साल अपना चेहरा बदल लेती हो। सर्दियों के बाद जब पानी उतरता है तो स्थानीय नाविक बताते हैं कि “इस बार टापू यहां नहीं, थोड़ा आगे बन गया है।” यह बात सुनने में साधारण लगती है, लेकिन यही इस पूरे इलाके की असली कहानी है। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक