क्यों ना ऐसा होता कि…

प्रयागराज की बाल कवयित्री ने अपने मन की उस वेदना को समाज के साथ साझा करने की कोशिश की है, जो वह आम लोगों के मन में दबी हुई देखती है।

Poem, social pain, child words
मन के दबे भावों को शब्दों में पिरोकर बाहर निकालने की कोशिश करती बाल कवयित्री ईशानी भट्टाचार्या।

ईशानी भट्टाचार्या

क्यों ना ऐसा होता कि इस दुनिया में सबको अपनी-अपनी जगह मिलती… ना ही कोई छोटा होता ना ही कोई बड़ा।
क्यों ना ऐसा होता कि इस दुनिया में एक दूसरे को देखते ही परखने ना लगते।
क्यों ना ऐसा होता, कि इस जिंदगी में जितने दुख और आंसू है वे सारे लोगों में एक सामान बंट सकते।
क्यों ना ऐसा होता,
कि किसी को किसी से बात करने में कोई परेशानी ना होती।
क्यों ना ऐसा होता, कि मोहब्बत नाम के शब्द में रोक टोक ना होता, क्यों ना ऐसा होता,
कि जितनी परेशानी हमारी अंदर चल रही है वो लोगों तक खुल के पहुंचा सकते।
क्यों ना ऐसा होता कि लोग थोड़े से समझदार होते, क्यों ना ऐसा होता कि इस जिंदगी में दोस्तों की कीमत उनके दिमाग से नहीं बल्कि दिल से जान पाते।
क्यों ना ऐसा होता,
कि सूरज और चांद एक होता।
जब भी कोई ज्यादा जलता दूसरा उसको शांत कराने के लिए रहता।
जब भी एक की रोशनी खत्म हो जाती दूसरा उसको मदद करने के लिए हाथ बढ़ाकर खड़ा रहता।
एक को आंसू आते तो दूसरा उसको पोंछने के लिए और उसके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान देने को हमेशा तैयार रहता।

काश ऐसा होता कि लोग अलग होकर भी एक साथ होते…
यहां खास लोग एक दूसरे को समझ पाते
हमेशा चाहे कुछ भी हो एक दूसरे के साथ रहते।
एक दूसरे के साथ गिर के एक दूसरे के साथ उड़ना सीखते
एक साथ कैद होकर भी कैसे आजाद हुआ जाए, यह सोचते।
एक साथ अंधेरे को हटाकर उजाला का इंतजार करते, काश ऐसा होता कि लोग अलग होकर
भी एक साथ होते।

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