मैं जा रहा हूं। दरवाजा बंद कर लेना। अब उठोगी भी कि टुकुर-टुकुर देखती रहोगी।’ निर्मला ने उठकर दरवाजा बंद कर लिया। इस तरह के अपमान के घूंट पीने की वह आदी हो गई थी। निर्मला ने खिड़की के परदे को जरा-सा सरकाया और आंखें सामने वाले घर पर गड़ा दीं। कलफ वाली सूती साड़ी, सौम्य मेकअप, अनुभवी मुखमुद्रा वाली तृप्ति को देखा। जो कालोनी में नई आई है। उस दिन परिचय के लिए घर भी आई थी। बड़ी असहज हो गई थी निर्मला। ‘मैं तृप्ति भंडारी।’ उस महिला ने शिष्टता से उसे नमस्कार करते हुए पूछा, ‘आपका नाम?’ ‘जी, मैं निर्मला वर्मा।’ निर्मला ने अचकचाकर जवाब दिया। ‘निर्मला… निर्मू मेरी छोटी बहन। हां, अपनी बहन को मैं इसी नाम से बुलाती हूं। तुम्हें मंजूर है?’ ‘जी…’ निर्मला बुरी तरह हकला गई। इतने स्नेह से उसे किसी ने कभी बुलाया हो, याद नहीं पड़ता।
जब से ब्याहकर इस घर में आई, अपने लिए यही सुनती रही, ‘मुंह में जुबान ही नहीं है। बिल्कुल गऊ है।’ सास की दुलारी बहू पति की आंख की किरकिरी बनी रही। उसकी एक-एक बात उन्हें काट खाने दौड़ती। गुण भी अवगुण नजर आते। बढ़ती उम्र की बेटियों ने भी मां को कभी सम्मान नहीं दिया। उनकी और आशुतोष की खूब घुटती थी। निर्मला स्नातक थी, परंतु इन कृतघ्न लोगों की चाकरी बजाते-बजाते कहीं की नहीं रही। उसकी शादी को अभी तीन-चार दिन ही हुए थे। पति के मित्र ने उन दोनों को खाने पर बुलाया।
कुछ और दंपति भी आमंत्रित थे। ‘बड़े भाग्यशाली हो यार! बड़ी बुद्धिमती पत्नी मिली है।’ एक मित्र ने कहा। आशुतोष की पीठ पर धौल जमाते हुए दूसरे मित्र ने मजाक किया, ‘बंदर के गले में मोतियों की माला।’ ठहाकों के बीच निर्मला ने देखा कि आशुतोष के चेहरे की रेखाएं खिंचने लगी हैं। बगैर एक शब्द बोले वे दोनों घर आए। रात को अकेले में उन्होंने निर्मला को एक थप्पड़ रसीद दिया। ‘बहुत खी-खी कर रही थी वहां, एक से जी नहीं भरता?’ लगा, जैसे कानों में किसी ने पिघला सीसा डाल दिया हो। उस रात का वह अपमान आज भी वह याद करती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
अपना अस्तित्व शनै:-शनै: इसी रूप में उसने स्वीकार कर लिया। आज वह तृप्ती जी के घर की ओर आ रही थी। उन्होंने पूछा, ‘क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती?’ ‘जरूरत ही नहीं पड़ती। सामान ये ला देते हैं, घर में काम भी बहुत हो जाता है।’ ‘काम का तो बहाना होता है हम औरतों का! दरअसल हम घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं। देखो, तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी हो गई। अब घरेलू जिम्मेदारियां खत्म हो गईं, लेकिन समाज के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है या नहीं?’ निर्मला क्या कहती। पति के अनुसार तो वह परले दर्जे की बेवकूफ है। अपने घर की न सही, अपनी रसोई की भी वह रानी होती तो एक बात थी, पर आशुतोष वहां भी चले आते। समाज सेवा कहां से होती। तृप्ति जी के प्रस्ताव पर निर्मला मौन ही रही। अगले दिन सुबह गलती से उसने चाय में शक्कर ज्यादा डाल दी।
आशुतोष ने हमेशा की तरह उसे गाली दी। आज उनकी गाली को वह निर्लिप्त भाव से स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मन में चिंगारी उठती हुई उसने साफ महसूस की। तृप्ति जी ने उसमें यह कैसा परिवर्तन ला दिया है? उस दिन आशुतोष घर लौटे तो बड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे। बोले, ‘मुझे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है। दो महीने की ट्रेनिंग है। अब तुम बिल्कुल अकेली यहां कैसे रहोगी? तुम ठहरी पहले दर्जे की बेवकूफ! लापरवाही तुम्हारी नस-नस में भरी हुई है। लौटूंगा तो पता नहीं मुझे घर दिखेगा या खंडहर।’ निर्मला क्या जवाब देती!
इसका जवाब तो वह खुद भी नहीं जानती थी। आशुतोष के जाने के बाद तृप्ति जी ने उसे हिम्मत बंधाई, फिर उसे डांट कर बोली, ‘तुम इतना अपमान क्यों सहन करती हो? पत्नी पति को सम्मान देती है तो पति का भी फर्ज है कि अपनी पत्नी को सम्मान दे।’ तृप्ति जी हंसकर उसे उलाहना देतीं, ‘बरसों से घर में बंद रहकर तुम्हारा दिमाग जंग खा गया है। तुम भूल गई हो कि तुम पढ़ी-लिखी हो, सिलाई-बुनाई में माहिर हो, ये गुण कोई कम तो नहीं! कल से तुम मेरे साथ आश्रय गृह चलोगी जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं को रखा जाता है। ऐसी महिलाएं, जिन्हें उनके परिजन ठीक होने पर भी स्वीकार नहीं करते।’ ‘लेकिन मैं क्या करूंगी वहां जाकर?’ वह ना-ना करती रही और तृप्ति जी कब खींचकर उसे ले गईं, उसे स्वयं पता नहीं चला।
वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुकाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी। तिरस्कृत, बलात्कार की शिकार, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति-शून्य। उन्हें देखकर निर्मला जैसे अट्ठाईस बरस की नींद से जाग उठी। अब तो वह रोज ही तृप्ति जी के साथ ‘आश्रय गृह’ जाने लगी। तृप्ति जी ने निर्मला का रहन-सहन भी बदल दिया। आजकल वह फोन पर आशुतोष से सधी हुई आवाज में बस इतना ही कहती, ‘व्यर्थ चिंता न करें। अपनी और घर की सुरक्षा खुद करने में सक्षम हूं।’
घबराई हुई, अचकचाई हुई आवाज सुनने के आदी आशुतोष इस सधी हुई आवाज से भौंचक्के रह जाते। उस दिन ‘आश्रय गृह’ से लौटते हुए निर्मला का मन बेहद उदास था। बार-बार आंखों के सामने उस पंद्रह साल की मासूम बच्ची का चेहरा घूम जाता था। वह अपने नजदीकी रिश्तेदार की हवस का शिकार हुई थी। अनचाहे गर्भ को ढोती वह लड़की अपने ही माता-पिता द्वारा ठुकराई गई थी। तृप्ति जी ने कहा, ‘समय कितना भी बदल गया हो, पर आज भी ये औरतें शाप भोग रही हैं। ये अपनों द्वारा छली गई हैं। इनकी अस्मिता को पैरों तले कुचला गया है। अब हमें भी समाज से बहिष्कृत, जड़ हो चुकी इन औरतों में चेतना जगानी है।’ ‘तृप्ति जी! आप सब कुछ कर सकती हैं, आपसे मिलने के पहले मेरी जिंदगी में भी कुछ नहीं था। अपने इर्द-गिर्द छाई धुंध को मैं अपनी जिंदगी का सच समझ बैठी थी। धुंध के पार का उजाला मेरी दृष्टि से दूर था और आज…’। ‘आज भी तुम वही हो। मैंने सिर्फ तुमसे तुम्हारा परिचय कराया है। आशुतोष जी के विशेषणों को ही तुम सच समझ बैठी थी। लेकिन निर्मू, व्यक्ति जब स्वयं प्रयत्न करता है, तभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पाता है।
दो महीने बाद आशुतोष घर लौटे तो अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए। उनके सामने तो एक तेजस्वी नारी खड़ी थी। सलीकेदार पहनावा और चेहरे पर गर्वीली मुस्कुराहट। यह तो उनकी पत्नी नहीं है। ‘आप जल्दी से नहा-धो लें। खाना तैयार है। एक बजे मुझे किसी काम से बाहर जाना है।’ निर्मला की इस अदा पर आशुतोष स्तब्ध होकर उसे देखते ही रह गए। उससे कुछ पूछने का भी साहस उनसे न हुआ। ‘पागल, बेवकूफ, जाहिल, मूर्ख’ आदि उनकी जीभ पर आने के लिए मचलने वाले शब्द आज पता नहीं कहां चले गए थे। आशुतोष को वे खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे।
यह भी पढ़ें: किस्सा कड़कनाथ का | प्रेरक पक्षी कथा और मुनमुन की सफलता की कहानी
कड़कनाथों के मुखिया मालू बाड़े में बड़े मजे से अपने साथियों के साथ रहते। आपस में मीठा बतियाते। पूरे परिवार का जीवन खुशी-खुशी बीत रहा था। परिवार में बड़े और बच्चे मिलाकर थे कुल सौ सदस्य। डॉ. रत्ता जी का फार्म हाउस उन्हें अच्छा लग रहा था। रत्ता जी को पशु-पक्षियों और प्रकृति से अपार प्रेम था। वह सबका बहुत ध्यान रखते। इस बाड़े से सटे दूसरे बाड़े में बत्तखें अठखेलियां करती रहतीं। तीसरे बाड़े में देशी गायें थीं। चौथे बाड़े में उनके बच्चे खूब उछल-कूद मचाते रहते। सुबह-शाम उन्हें अपनी माताओं का दुग्धपान करने को मिलता। उस समय उनकी प्रफुल्लता का ठिकाना न रहता। मुंह और गर्दन ऊपर-नीचे करके जल्दी-जल्दी दुग्धपान करना चाहते, लेकिन उन्हें उतना ही मिलता, जितना कि उनके शरीर के लिए आवश्यक था। अधिक दुग्धपान से दस्त लगने की संभावना बनी रहती। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
