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द लास्ट कोच: हम होंगे कामयाब एक दिन

चुनावी शोर में मुद्दे तो बहुत उठते हैं। मगर वक्त के साथ वे बिला जाते हैं। जीते हुए उम्मीदवार की राजनीति वातानुकूलित कमरों में बैठ कर और महंगी गाड़ियों में घूमते हुए बीतती है। इसके बाद समस्याओं से बेहाल जनता की खैर-खबर लेने कोई नहीं आता। द लास्ट कोच शृंखला में राजनीति और सामाजिक सरोकार को टटोलने की कोशिश कर रहे हैं संजय स्वतंत्र।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स- Express Illustration by Suvajit Dey)

आज दफ्तर जाने के लिए घर से निकला तो देखा कि चुनाव जीत चुके नेताजी होर्डिंग पर टंग गए हैं। अब वे तस्वीरों में ही नजर आाएंगे, उन सरमाएदारों के साथ जो चुनाव के दौरान उनके साथ लगे रहे। जमीन-ज्यादाद का कारोबार करने वालों और व्यापारी बंधुओं के बीच करबद्ध नेताजी अब होर्डिंग से उतर कर कभी सड़कों पर नहीं आएंगे। वे लोकतंत्र की बात करेंगे, पर ‘लोक’ से दूर रहेंगे।

राजनीति से आप कितना भी परहेज कर लें। यह आपका पीछा नहीं छोड़ती। आप इससे बच ही नहीं सकते। राजनीति तो आपको घर में भी घेर लेती है। आस-पड़ोस से लेकर दफ्तर तक आप अछूते नहीं हैं। अपने यहां राजनीति में भाई-बहन तक एक दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। मैंने राजनीति पढ़ी है। स्कूल में नंबर भी खूब मिले, मगर राजनीति करनी कभी नहीं आई। यों भी यह अनाड़ी आदमी के बूते की बात नहीं। इसके लिए आपको चिकना घड़ा बनना पड़ता है। कोई कितना कुछ कहे। कितनी भी निंदा करे, आप मुस्कुराते रहिए। आप पता तक चलने नहीं दीजिए। फिर एक दिन अपने दांव से उसे पटक दीजिए। यही राजनीति है।

दरअसल, राजनीति में एक चेहरा आगे होता है, तो दूसरा पीछे। अब तक जिन नेताओं से मिला, सबके दो चेहरे दिखे। हाथी के दांत वाला मुहावरा इन पर खूब चरितार्थ होता है। तो कुल जमा नतीजा यह रहा कि राजनीति से मुझे सदैव अरुचि रही।

दिल्ली में जब भी चुनाव का मौसम आता है, पूरा मीडिया इसकी लहर में डूब जाता है। हालांकि मीडिया अब जिस तरह दो ध्रुव में बंट गया है, वह अब हैरान नहीं करता। यह होना ही था। दुखद यह है कि निष्पक्ष पत्रकारिता का दौर लुप्त हो गया है। या तो आप इधर रहिए या फिर उधर। हालांकि राजनीति और मीडिया की गलबहियां पहले जैसी है। मगर अब यह बेशर्मी से सामने आई है। एक समय था कि असहमति जता देने पर भी मिठास रहती थी। अब जरा सा तीखा सवाल पूछा नहीं कि सामने वाले नेताजी की नजरें टेढ़ी हो जाती हैं। सुर में सुर मिलाने वाले पत्रकार सफल हैं। और नेताजी उनके कायल हैं। मुस्कुरा कर उनके सवालों के जवाब देते हैं। यह एक नई जुगलबंदी है। देश में अब नया लोकतंत्र बन रहा है।

चुनाव कोई भी हो, उम्मीदवारों से ज्यादा उत्साह कार्यकर्ताओं में दिखता है। उससे भी ज्यादा आजकल के पत्रकारों में। ऐसा क्यों होता है? यह आप-हम अच्छी तरह जानते हैं। दिल्ली नगर निकायों के चुनाव के दिनों की बात है। उस दिन मैं दफ्तर के लिए घर से निकला, तो न जाने कहां से पता लगाते हुए एक उम्मीदवार के कार्यकर्ता लोग प्रेस विज्ञप्ति लेकर मेट्रो स्टेशन पर पहुंच गए। मैंने उनसे पूछा- यह भी कोई जगह है मिलने की? दफ्तर चले आते। कार्यकर्ता बोले- सर क्या करते। नेताजी ने आपके पीछे दौड़ा दिया। कहा है कि चार लाइन ही छप जाए तो बड़ी कृपा होगी।

… हैरत की बात है कि सोशल मीडिया और खबरिया तथा वेब चैनलों के दौर में भी लोग अखबार में छपना चाहते हैं। सच में प्रिंट का अपना सुख-संतोष है। प्रचार का दौर जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, नेताओं में जनता के करीब जाने के साथ मीडिया में दिखने की लालसा भी बढ़ती जाती है। रक्तचाप अलग से बढ़ता जाता है। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप और दावे-प्रतिदावे का जो दौर चलता है, उससे समझ में नहीं आता कि कौन सच्चा है और कौन झूठा। मगर जनता ऐसे नेताओं को परखना सीख गई है।

… तो उस दिन नेताजी के चंपुओं से पिंड छुड़ा कर प्लेटफार्म पर पहुंचा। गनीमत है कि मेट्रो में राजनीतिक दलों को प्रचार करने की इजाजत नहीं। नहीं तो परचे-पोस्टर चिपका कर इसकी सूरत भी बिगाड़ देते। चुनावी सीजन में कोई इलाका नहीं बचता, जहां प्रचार के दौरान शोरगुल न होता हो। सड़कें-गलियां वहीं रह जाती हैं और नेता आगे बढ़ जाते हैं। फिर वे पीछे मुड़ कर नहीं देखते। पीछे जनता खाली हाथ खड़ी रह जाती है। ऊबड़-खाबड़ गलियों और सड़कों की किस्मत नहीं बदलती और न ही इन पर चलने वाले लोगों का भाग्य। इस देश की कई सड़कों पर गड्ढे हैं। उन्हें भरने की जरूरत है। हर पांच साल में नेताओं के अनगिनत वादे भी इन्हें नहीं भर पाते। नागरिकों की उम्मीदें इन्हीं गड्ढों में दम तोड़ देती हैं।

मेट्रो के आखिरी डिब्बे में बैठने के बाद सोचने लगा कि राजनीति कितनी बदल गई है। मिशन के नाम पर यहां आने वाले लोगों ने तो इसे प्रोफेशन ही बना डाला है। बेतुकी और बेशर्म बयानबाजियां देश को कई साल पीछे ले जाती हैं। दुनिया में जगहंसाई होती है सो अलग। एक समय था जब दिल्ली के पूर्व मुख्य कार्यकारी पार्षद जगप्रवेश जी विज्ञप्ति लेकर खुद ही अखबार के दफ्तरों में पहुंच जाते। यही नहीं कई दिग्गज नेता भी ऐसा ही करते थे। लगातार विज्ञप्ति लेकर अखबार के दफ्तर के चक्कर काटने वाले दो युवा नेता तो बाद में मंत्री भी बने। …और एक यह नेता है जो चंपुओं के सहारे प्रचार में जुटा है।

चुनावी शोर में मुद्दे तो बहुत उठते हैं। मगर वक्त के साथ वे बिला जाते हैं। जीते हुए उम्मीदवार की राजनीति वातानुकूलित कमरों में बैठ कर और महंगी गाड़ियों में घूमते हुए बीतती है। इसके बाद जनता की खैर-खबर लेने कोई नहीं आता। भीषण गर्मी में यह देखने कोई नहीं आता कि स्टाप पर खड़ी जनता बसों का किस तरह इंतजार करती हैं। बारिश के दिनों में सड़कों पर यातायात जाम होने की खबरें आती हैं, तब भी ये नेता लोगों की सुध लेने अपनी कोठियों से नहीं निकलते। अलबत्ता बयानबाजी खूब होती है। वहीं सर्दियों में मजदूरों-रिक्शेवालों और फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगों की भी कौन चिंता करता है। जिंदगी तो सब की कट जाती है। कई लोग कष्ट में काटते हैं, तो कुछ लोग मजे में। राजनीति का समाज से सरोकार होता तो आज सभी खुशनसीब होते, मगर दुख ये कि हम अपनी बदनसीबी पर रोते हैं।

… तो उस दिन भी मेट्रो अपनी रफ्तार से चल रही थी। इसी के साथ चिंतन यात्रा भी। जैसा कि मैंने कहा कि राजनीति मेरा विषय नहीं है। क्योंकि मैं दिल से सोचता हूं। इसलिए यहां दांवपेच देख कर उस वक्त हैरान हो जाता हूं जब पत्नी ही पति के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर जाती है। या फिर चाचा और भतीजा आमने-सामने आ जाते हैं। पता नहीं यह कौन सी तिकड़म है कि आपके इलाके का या बाहर कोई भी गुमनाम शख्स आपका नुमाइंदा बन कर चुनाव मैदान में ताल ठोकने लगता है। और आप बस मुंह देखते रह जाते हैं, यह सोचते हुए कि इससे काबिल तो हम खुद थे। काश कोई पार्टी हमें ही टिकट दे देती।

राजीव चौक उतरा तो मेरा मोबाइल फोन घनघना उठा। भीड़ से बचते-बचाते जेब से फोन निकाल कर कॉल सुनता हूं। उधर से नेताजी का स्वर था- ‘नमस्कार श्रीमन। एक विज्ञप्ति भिजवाई है। खबर लग जाए तो बड़ी मेहरबानी।’ इस पर मेरा जवाब था- ‘खबर छोड़िए। आपने कोई काम किया हो तो बताइए?’ इस सवाल से मेरा नुमांइदा बनने को बेताब नेताजी अकबका गए। मैंने दूसरा सवाल दागा – ‘आप कभी मिले नहीं। मुझे कैसे ढूंढ़ लिया?’ नेताजी का जवाब था- ‘जीत कर एक साल में आपके इलाके को चमका दूंगा। आप से नहीं मिले तो क्या हुआ साहेब। हमारे लोग तो आपको जानते हैं। मैं तो आपके घर आ रहा था, मगर आप मिले ही नहीं।’

नेताजी की झूठी बातों से मुझे गुस्सा आ गया। मैंने तल्खी से जवाब दिया-अच्छा हुआ जो हम नहीं मिले। क्योंकि आप चुनाव जीतने के बाद भी मेरे लिए अजनबी ही रहेंगे। उस जनता लिए भी जो आपको वोट देगी। वे गलियां और सड़कें भी अजनबी हो जाएंगी, जहां से प्रचार करते हुए आप गुजरेंगे। उन लोगों के चेहरे भी भूल जाएंगे जो आपके स्वागत में अपनी चौखट पर खड़े थे। वे चौराहे भी भूल जाएंगे जहां से आपका काफिला गुजरा और जहां सालों तक गुहार करने के बाद भी ट्रैफिक सिग्नल न लगने से हर साल कई नौजवान सड़क हादसे में मर गए।

… नेता जी दलील दे रहे थे, मगर मैंने मोबाइल को स्विच आॅफ कर दिया। स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ता रहा इस तसल्ली के साथ कि आज मैंने कम से कम एक नेता को तो खरी-खोटी सुना दी है। ऐसे नेताओं से क्या बात करना? जो चुनाव जीतने के बाद सिर्फ होर्डिंग पर नजर आए या फिर महंगी कारों में बैठ कर जनता के सामने से निकल जाए। आमतौर पर मैं किसी भी नेता से आत्मीय नहीं हो पाता। पिछले दिनों एक नेता से हाथ मिलाते हुए ऐसा लगा कि मेरा हाथ गंदगी से बजबाती नाली में सन गया है।
काश कि होर्डिंग पर टंगे ये नेता बरसों से फुटपाथ पर सो रहे बेघर लोगों के लिए एक बार सोचते। या फिर उन नौनिहालों के लिए कुछ करते जो स्कूल जाने के बजाय गलियों में कचरा बीनते नजर आते हैं। और कुछ नहीं तो चौराहों पर भीख मांगते लोगों को स्वरोजगार के लिए ही मदद कर देते। क्या आप ऐसे नेताओं से नया हिंदुस्तान बनने की उम्मीद करेंगे जो पांच साल आरोप-प्रत्यारोप में काट देते हैं? या फिर किसी न किसी बहाने खुद भी होर्डिंग पर टंगे रहते हैं।

पुरानी स्मृतियां कौंध रही हैं। आज फिर निकला हूं दफ्तर के लिए। मेट्रो में भीड़भाड़ आज कम है। लोकप्रिय मुख्यमंत्री कुछ ही देर में शपथ लेने वाले हैं। रविवार का दिन और सभी की निगाहें उन्हीं की तरफ है। मगर मेरी निगाह चैनलों पर है। वे एक भावुक भाषण दे रहे हैं। एकबारगी उन्होंने दिल को छू लिया है।

… उधर नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अपना भाषण दे रहे हैं- मेरे प्यारे दिल्ली वासियों। यह एक-एक मां की जीत है… यह हर दिल्ली वाले की, हर एक परिवार की जीत है। चुनाव खत्म हो गया है। आप सब मेरे परिवार हो। …अपने को दिल्ली के लिए अभी बड़े बड़े काम करने हैं। मैं अकेला नहीं कर सकता। आप दो करोड़ लोगों के साथ मिल कर दिल्ली को अच्छी बनाएंगे। मैं सब के साथ मिल कर काम करना चाहता हूं। हमारे विरोधियों ने हम को जो कुछ बोला, हमने उनको माफ कर दिया आज। … दिल्ली वालों आप सब ने देश के अंदर एक नई राजनीति को जन्म दिया है। काम की राजनीति…इक्कीसवीं सदी के भारत की राजनीति। एक नई किस्म की राजनीति दिल्ली के लोगों ने देश के अंदर शुरू की है।

सचमुच यह एक अलग किस्म की राजनीति है। वे कह रहे हैं-दिल्ली वालों आप ने कमाल तो कर दिया। देश में डंका बज रहा है आप का……..। एक दिन आएगा जब पूरी दुनिया में भारत का डंका बजेगा। यह संभव देश की इस नई राजनीति से होगा। उनका भाषण समापन की ओर है। मेट्रो कोच में उद्घोषणा हो रही है अगला स्टेशन न्यू अशोक नगर है। मैं सीट से उठ गया हूं।

…मुख्यमंत्री कह रहे है- मैं अंत में एक गीत गाऊंगा। पर एक शर्त है। मैं एक-एक लाइन गाऊंगा और आप मेरे पीछे-पीछे बोलेंगे। यह हम सब के सपने को पूरा करने की प्रार्थना है-
हम होंगे कामयाब एक दिन,
मन में है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन।
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
होगी शांति चारों ओर एक दिन
…मन में है विश्वास
पूरा है विश्वास…
नहीं डर किसी का आज
एक दिन हो हो …
मन में है विश्वास…
नहीं डर किसी का आज…

सोच रहा हूं कि क्या भारतीय राजनीति में एक और नया अध्याय लिखने का समय आ गया है? कौन लिखेगा। मेरे कानों में गीत गूंज रहा है, …हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन। मेरे कदम बढ़ चले हैं कुछ नया सोचने के लिए कुछ नया करने के लिए। कामयाबी का आप भी नया अध्याय लिखिए न।

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