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किसी के दिल में क्या चलता है, कौन जानता है?

सांत्वना श्रीकांत की दो कविताएं। एक में जहां मुस्‍कुराहट को दर्द छुपाने का जर‍िया बयां करते हुए मर्मस्‍पर्शी पंक्‍त‍ियां ल‍िखी गई हैं, वहीं दूसरी कव‍िता प्‍‍‍‍‍यार अनजाने प्‍यार की पहचान बता रही है।

The Last Coach Series, jansatta last coach, suno Aparajita in hindi, journalist Sanjay Swatantraप्रतीकात्मक तस्वीर। (Illustration: Subrata Dhar)

मुस्कुराहट के पीछे
—————–
रोना इतना खतरनाक नहीं
जितना कि जाना,
हंसी का जाना
आंसू के ढुलकने से भी
ज्यादा खतरनाक है।
तुम हंसी संभालना और
मैं तुम्हारे आंसू।
मुस्कुराहट तो
दुख छिपाने का जरिया है।
जैसे कि
खिंचे हुए होठों और
मुंदी हुई आंखों से
दुख नहीं दिखता।
किसी के दिल में
क्या चलता है
कौन जानता है?

तेरे-मेरे दरमियां
—————
हर सुबह-
शब्दों में खुद को रचती हूं
निर्झर बहती हूं खुद में
सन्नाटे में बुनती हूं सपने,
अलसाए बच्चों की तरह
करती हूं बातें तुमसे।
हवाओं में बहती
तुम्हारी दुआओं को
भर लेती हूं अपने अंक में
और तुम-
मेरी छातियों के बीच
दुबक जाते हो शिशु जैसे,
कुछ तो है तेरे-मेरे दरमियां।

गिरती हूं तो थाम लेते हो,
संभलती हूं तो
मेरी मुट्ठियों में
भर देते हो मुस्कान,
बेख्याली में भी तुम
कर लेते हो मेरा ख्याल,
कुछ तो है तेरे-मेरे दरमियां।

हवा में लहरा कर अपने हाथ
जब-तब छू लेती हूं तुम को,
चख लेती हूं तुम्हारा प्यार,
तुम्हारी यादों के साये के साथ
जगती हूं रात-रात भर,
बिस्तर की सलवटों पर
बिखर जाते हैं वो सारे अक्षर
जो मेरी पीठ पर
तुम लिख जाते हो,
कुछ तो है तेरे-मेरे दरमियां।

तपते हुए सूरज के साथ
नंगे पांव चलते हुए तो
कभी डूबते हुए सूरज को
अलविदा कहते हुए
हर पल रहते हो संग
जीवन की अमावस में भी
कभी छोड़ा न मेरा हाथ,
कुछ तो है तेरे-मेरे दरमियां।

मेरी चुप्पियों को तोड़ने
चले आते हो अकसर,
कानों में घोल जाते हो
जीवन संघर्ष का गान
दे जाते हो एक पंखुड़ी मुस्कान।
मन के सभी दरवाजे खोल
पुकारती हूं तुम्हें
बांहें पसार करती हूं
तुम्हारा इंतजार,
कुछ तो है तेरे-मेरे दरमियां।

सुनो-
अब की मिले तो
लौट न पाओगे
मेरे संदली ख्वाबों की
आवारा दुनिया से।

-सांत्वना श्रीकांत

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