उस दिन बहुत तेज हवा चल रही थी। बारिश भी लगातार हो रही थी। पहाड़ों पर बर्फ पड़ने के आसार थे। ठंड से इंसान, जानवर ,पक्षी और पेड़-पौधे सभी का बुरा हाल था। ‘मम्मी क्या मैं बाहर जा सकती हूं।’, पहाड़ों में रहने वाली प्यारी सी लड़की प्रियांशी ने कहा। ‘बेटा बाहर बहुत ठंड है। शायद कुछ ही देर में बर्फ भी पड़ जाएगी। ऐसे में बाहर जाना जोखिम भरा है। तुम्हें ऐसे मौसम में बाहर नहीं जाना चाहिए। तुम अंदर रजाई में लेट जाओ। गर्म दूध पियो।’, प्रियांशी की मम्मी ने कहा।
‘मुझे बाहर जाना है। जरूरी काम है। प्लीज मम्मी।’, प्रियांशी ने जिद करते हुए कहा। ‘इतनी भयंकर ठंड में बाहर क्यों जाना चाहती हो। बीमार पड़ जाओगी। तुमसे कहा न रजाई में लेट जाओ। तुम कहना क्यों नहीं मान लेती।’, मम्मी थोड़ा सख्त लहजे में बोली। ‘अगर मैं रजाई में लेट गई तो उसका क्या होगा।’, प्रियांशी के मुंह से अचानक ये बात निकल पड़ी। ‘किसका क्या होगा। तुम्हें इस ठंड में किसकी फिक्र सता रही है। बताओ मुझे।’, मम्मी ने कहा। ‘नहीं मम्मी, कुछ नहीं।’, प्रियांशी ने बात बदलने की कोशिश करते हुए कहा।
‘बताओ कुछ तो बात है।’, मम्मी बोली। ‘पिछले दिनों मुझे कुत्ते का एक छोटा सा पिल्ला मिला था। जो शायद अपनी मां से बिछुड़ गया था। दो-तीन दिन से उसे मैं खाना खिला रही थी। वह घर के पास वाले पीपल के पेड़ के नीचे सोता है। जब से बारिश और हवा चल रही है मैं उसके पास नहीं जा पा रही। वह भूखा भी होगा। उसे ठंड भी लग रही होगी। उसके पास रहने के लिए कोई घर नहीं है। अगर ऐसे में बर्फ पड़ गई तो उसका क्या हाल होगा।’, प्रियांशी रुआंसी होते हुए बोली।
‘अच्छा तो ये बात है। तुम्हें उस पिल्ले की चिंता सता रही है। यह तो अच्छी बात है। तुम उसे ला सकती हो। लेकिन ध्यान से अपनी टोपी और मोजे पहन कर ही बाहर निकलना। उसे लेकर सीधे घर आ जाना। इधर-उधर न चली जाना।’, मम्मी ने हिदायत देते हुए कहा। ये सुनते ही प्रियांशी उछल पड़ी। वह तुरंत अपने कमरे से निकली और पीपल के पेड़ के नीचे जा पहुंची। वहां वह छोटा पिल्ला ठंठ से ठिठुर रहा था। प्रियांशी को देखते ही वह अपनी दुम हिलाने लगा। वह प्रियांशी की गोद में आ जाना चाहता था।
‘मेरे प्यारे छोटू, अब तुम यहां नहीं रहोगे। मेरे साथ घर चलोगे। यहां बहुत ठंड है न।’, प्रियांशी ने उस पिल्ले को गोद में उठाकर पुचकारते हुए कहा। उसी समय सामने की पहाड़ी से एक परी यह सब कुछ देख रही थी। उस परी का नाम था, पिंकू। वह बहुत दयालु थी। वह परिस्तान से अक्सर पहाड़ों में घूमने आया करती थी। पिंकू परी को प्रियांशी का उस पिल्ले को पुचकारना बहुत अच्छा लगा।
प्रियांशी पिल्ले को लेकर घर आ गई। उसने लकड़ी की पेटी में गर्म कपड़े बिछाए। उसमें उस पिल्ले के रहने का इंतजाम कर दिया। उसे खाना भी खिलाया। गर्माहट पाकर वह पिल्ला सो गया। प्रियांशी भी थक गई थी। बाहर अंधेरा हो चुका था। ‘बेटा चलो अब खाना खा लो। छोटू पिल्ले को सोने दो।’, मम्मी ने आवाज देते हुए कहा।
प्रियांशी खाना खाने चली गई। खाना खाने के बाद वह छोटू को देखने आई। छोटू सो गया था। वह भी सोने चली गई। रात गहराने लगी। ठंड बढ़ने लगी थी। आधी रात होते ही भारी बर्फबारी होने लगी। बर्फबारी ऐसी थी जैसी इससे पहले कभी हुई ही नहीं। पेड़ की टहनियां बर्फ का भार सहन नहीं कर पा रही थी। उनके चटकने की आवाजें सुनाई दे रही थी। इन आवाजों से प्रियांशी और उसकी मम्मी की नींद खुल गई। ऐसी आवाजों से वे डर गईं। उन्होंने हिम्मत कर के खिड़की खोली। खिड़की के पास तक बर्फ जमा हो चुकी थी।
‘ऐसी बर्फबारी मैंने पहले कभी नहीं देखी।’, प्रियांशी ने सहमते हुए मम्मी से कहा। ‘बेटा मैंने भी इतनी भयंकर बर्फबारी पहले नहीं देखी। चलो अब सो जाते हैं। सुबह देखेंगे क्या होता है।’, मम्मी ने कहा। दोनों सो गए थे। उधर छोटू भी गहरी नींद में था। सुबह होते ही प्रियांशी की मम्मी उठी। उन्होंने दरवाजा खोलने का प्रयास किया। दरवाजा न खुल पाया। आधे दरवाजे तक बर्फ जम चुकी थी। ‘बेटा जल्दी उठो दरवाजा नहीं खुल रहा।’ मम्मी ने आवाज देते हुए कहा।
प्रियांशी दौड़ कर मम्मी के पास आई। दोनों ने दरवाजे पर धक्का दिया। लेकिन दरवाजा टस से मस नहीं हुआ। बाहर बहुत बर्फ जम चुकी थी। प्रियांशी और उसकी मम्मी मदद के लिए चिल्लाने लगीं। लेकिन उनकी आवाज किसी ने नहीं सुनी। सुबह-सुबह पिंकू परी वहां से गुजर रही थी। उसने देखा प्रियांशी के घर के बाहर बहुत बर्फ जमी हुई है। वह प्रियांशी के घर के बाहर खड़ी हो गई। उसने अपनी छड़ी घुमाई और देखते ही देखते सारी बर्फ साफ हो गई। दरवाजा खुल गया। यह देखकर प्रियांशी और उसकी मम्मी बड़ी खुश हुईं। लेकिन यह चमत्कार कैसे हुआ उनकी समझ में नहीं आ रहा था।
पिंकू परी वहां से जा चुकी थी। यह सब प्रियांशी का छोटू पर किए गए उपकार का परिणाम था। ‘यह सब कैसे हुआ मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।’, प्रियांशी बोली। ‘शायद भगवान ने हमारी मदद की होगी।’, प्रियांशी की मम्मी ने हाथ जोड़ते हुए कहा। छोटू पेटी से बाहर निकल कर प्रियांशी के पैरों से खेलने लगा। बाहर अब चटक धूप खिलने लगी थी।
