आज पापा की तेरहवीं है। पूरा घर उनके पसंदीदा पकवानों की सुगंध से महक रहा है। डुबकीदार आलू की सब्जी के साथ आलू की कचौड़ी, उड़द की दाल की कचौड़ी, इमरती, बालूशाही, छोले, दही बड़े, काशीफल की सूखी खट्टी मीठी सब्जी, तले हुए परवल और गोभी… । ये सब मात्र पापा को ही पसंद नहीं थे, वरन आम दिनों में मुझे भी बेहद पसंद थे, लेकिन आज उनकी सुगंध से कलेजा रीता-सा हो रहा है।
सफेद साड़ी में मां को देख कलेजा मुंह को आ रहा था। बिना बड़ी सी मैरून बिंदी और मांग में सिंदूर की रक्ताभ रेखा के उनका चेहरा श्रीहीन नजर आ रहा था, मानो पति को हमेशा के लिए खो कर वे वीरान खंडहर में बदल गई थीं। दोपहर से आगंतुकों को पंगत में जिमाते-जिमाते दिन ढल आया था, लेकिन मेरे मुंह में दो कप चाय के अलावा अन्न का एक दाना तक नहीं गया था।
भूख के मारे अंतड़ियां ऐंठ उठी थीं। तभी मेरी छोटी बहन मेरे पास आई। ‘जीजी, चलो, खाना खा लो।’ जिमाने वाले एक-एक कर पत्तल में पकवान रखते गए। सबसे पहले उन्होंने पत्तल में सब्जियां रखीं, फिर बारी आई कचौड़ी और पूड़ियों की। किसी ने फूली-फूली करारी आलू की कचौड़ी पत्तल में परोसी ही थी कि पापा की मेरे हाथ की कचौड़ी मुदित मन खाते-खाते, उसकी तारीफ का पुल बांधते हुए विहंसती हुई छवि मानस पटल पर कौंध आई और गले में एक सुबकी उठी। उन्हें याद कर मेरे सीने में चक्की सी चलने लगी।
पापा को पूड़ी कचौड़ी बेहद पसंद थी। सो हर रविवार रसोई में मेरी जिम्मेदारी थी सुबह के नाश्ते में आलू की कचौड़ी बनाने की, क्योंकि मां हर रविवार की सुबह हवन करती थीं। मैं मझली बहन की मदद से आलू उबालती, छीलती, हींग मसालों वाली चटपटी पिट्ठी बनाती और फिर मां और पापा को कचौड़ी खिलाने के लिए बुला लेती। पापा अक्सर हर कौर के साथ-साथ मां से मेरी और मझली की तारीफ करते न अघाते।
किसी तरह सायास बेमन पकवानों को गले से नीचे उतार हम सारे भाई-बहन उठ गए और मैं गुजरे वक्त की यादों के झुटपुटे से वापस लौटी। वक्त बड़ा ही बेरहम होता है। जहां सुख में उड़ान भरता है तो दु:ख के साए में ठिठकता ठहरता चींटी की चाल सा रेंगते हुए गुजरता है। पापा के देहांत को पूरा महीना भर होने आया था। उस दिन रविवार था।
मां-पापा के कमरे की सफाई में मैं जुटी हुई थी। आखिर में उनके कमरे की सबसे पुरानी स्टील की जगह-जगह पेंट उखड़ी हलके धूसर रंग की अलमारी बची थी। मां ने बताया था, पापा इस अलमारी को अपने विवाह के बाद पहली दिवाली पर अपनी निजी नौकरी के पहले बोनस पर मां के लिए शादी के बाद अपने पहले तोहफे के तौर पर खरीद कर लाए थे।
उसके घर में आने के बाद करीब पचास-पचपन कैलेंडर बदल चुके थे। मैं कितनी बार पापा के पीछे पड़ी थी, ‘पापा, इस बदरंग अलमारी को स्टोर में रख देते हैं। कितनी खराब लगती है ये आपके सजे-संवरे रूम में।’ लेकिन उस अलमारी से अपने भावनात्मक लगाव का दम भरती मां उसे अपने कमरे से हटाने के लिए तैयार नहीं हुई।
एक अरसे पहले जब मां-पापा की शादी का शीशम की लकड़ी का पलंग अपनी आखिरी सांसें गिन टूट गया था, मैंने और मझली ने मां-पापा से बहुत जिद कर एक सुर्ख सनमाइका लगा हुआ नया पलंग बनवाया था। हम दोनों बहनें अपनी एक रईस रिश्तेदार के घर क्रीम रंग का सनमाइका चढ़ा शानदार नया पलंग और ड्रेसिंग टेबल देख कर आए थे और हमने जिद पकड़ ली थी कि उस बार गांव के खेत के बटाई के रुपए आने पर हम भी उनके जैसा सनमाइका चढ़ा पलंग और ड्रेसिंग टेबल बनवाएंगे।
मां-पापा दोनों पलंग और ड्रेसिंग टेबल पर बटाई के रुपए खर्च करने के हक में बिलकुल न थे। वे उन रुपयों से घर के पिछवाड़े की खाली जमीन पर एक रूम बनवाने के पक्ष में थे, लेकिन मैंने और मझली ने बाल्टी भर-भर आंसू बहा मां-पापा से हमारी जिद पूरी करवा ली थी। मां-पापा बस खाने-पीने और हम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के खर्चे में हाथ नहीं खींचते। हमारे घर में हमेशा तीनों वक्त यथेष्ट स्वादिष्ट खाना बनता। मां-पापा की सोच थी, ‘बच्चों को कभी ऐसा नहीं लगना चाहिए कि घर में खाने-पीने में कोई कमी की जाती है।’
गांव से रुपए आते ही हमारे मन की मुराद पूरी होने की राह पर थी। पापा ने एक लकड़ी के कारीगरको पलंग बनाने के लिए बुलाया। उस नए ढांचे में पुराने पलंग का मजबूत फ्रेम और साइड रेलें लगवाई गईं, मां-पापा की इस दलील के साथ कि हम अपनी शादी के पलंग को कबाड़ बना-कर हरगिज-हरगिज नहीं फेंकेंगे। शानदार पलंग, ड्रेसिंग टेबल, एक नई अलमारी और घर के पुराने सोफे के साथ मां-पापा का कमरा बढ़िया लगा करता, लेकिन पुरानी, बदरंग स्टील की अलमारी रेशम में टाट के पैबंद की मानिंद लगा करती।
मैंने वही पुरानी अलमारी खोली। अलमारी खोलते ही सामने एक लकड़ी का सुंदर पर तनिक धूल धूसरित डिब्बा दिखा। मैंने उसे बाहर निकाला और मां से पूछा, ‘मम्मी, ये डिब्बा आपने कब खरीदा?’ ‘बेटा, ये डिब्बा नहीं, शृंगार दान है, जो मेरी शादी पर मुझे मेरी अम्मा ने दिया था।’ ‘इसमें आप मेकअप का सामान रखती थीं?’ ‘हां री, लेकिन तूने जब वो ड्रेसिंग टेबल बनवाई, तब से ये बेकार हो गया और तेरे पापा ने अपना सामान रखने के लिए इसे ले लिया।’
मैंने बड़ी उत्सुकता से उस डब्बे का ऊपरी पल्ला ऊपर किया। उस डब्बे में लाल, गुलाबी, हरी, नीली, पीली, यानी लगभग हर रंग की लेकिन समय के साथ बदरंग हुई लाटरी की टिकटें रखी हुई थीं। ‘मम्मी, पापा लाटरी की टिकट खरीदते थे? अरे वाह! कभी उनका कोई इनाम निकला?’ ‘हमारा नसीब इतना अच्छा कहां था?
बरसों पहले तेरे पापा हर महीने तनख्वाह मिलने पर ये टिकटें खरीदते थे। रिजल्ट वाले दिन दफ्तर से आते ही मुझे चहकते हुए हुंकार लगाते, री भागवंती, चल, मेरे पास आकर बैठ और टिकटों के नंबर बोल कर बता। मैं टिकट का नंबर बोलती जाती और वे रिजल्ट से मिलान करते, और फिर जैसे-जैसे उन्हें एहसास होता कि उनकी लाटरी के टिकट के रुपए बेकार हो गए, वे मायूस हो कर बोलते कि कसम है मुझे, जो अब मैं लाटरी के टिकटों में पैसे जाया करूं।
अरे इतने पैसों में तो मटकू हलवाई के यहां की असली घी की पूरी एक किलो गरमा गरम जलेबियां आ जातीं। लेकिन अगले ही महीने फिर से लाटरी की टिकटें खरीद लाते और मुझसे ये कहते हुए उस लकड़ी की पेटी में रख देते कि मैंने लाटरी की टिकटें उस डिब्बे में रख दीं हैं, उन्हें छेड़ना मत। वो मेरा बेमोल खजाना है।’ मां ने अपनी भीग आई आंखों को पोंछते हुए कहा।
‘मां, इन टिकटों को रद्दी में रख दूं?’ ‘ना री, इन्हें ऐसे ही रहने दे। तेरे पापा का खजाना हैं ये।’ ‘पापा का खजाना! हां, पापा का खजाना ही तो हैं ये।’ मैंने लाटरी की टिकटों की धूल साफ कर वापस उस डिब्बे में रख दीं। मेरी नजर सामने दीवार पर हार लगी उनकी तस्वीर पर पड़ी। मुझे लगा, पापा मुस्कुरा रहे थे, और उनकी सौम्य छवि देख मेरा पूरा वजूद पुरसुकून हो गया।
