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कला और साहित्य

नन्ही दुनिया: कहानी- मैं भी भैया जैसी…

देवेंद्र कुमार की कहानी - मैं भी भैया जैसी..

विमर्शः साहित्य का भविष्य, भविष्य का साहित्य

इन दिनों जो साहित्य दुनिया की भाषाओं में लिखा जा रहा है, और जिससे हम कमोबेश परिचित हैं, वह कलाओं के साथ एक सहकारी...

कहानीः आग

नंदकिशोर नंदन की कहानी - 'आग'

चर्चाः मकसद से भटकती गोष्ठियां

सेमिनारों की अराजक स्थिति का सबसे बुरा प्रभाव सामान्य श्रोताओं पर पड़ा है। श्रोताओं की स्वत: स्फूर्त भागीदारी अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।...

चर्चाः संगोष्ठियों का सच – साहित्य-चिंता का नया संदर्भ

साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सृजनात्मक विकास को गतिशील करने के लिए सेमिनार-गोष्ठियों का महत्त्व निर्विवाद है। बशर्ते इसे ठीक से संपन्न किया जाए।...

कविताः मैं देख सकती हूं तुम्हें

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता

प्रसंगः आधुनिक चेतना का विकास और भारतेंदु

भारतेंदु अपने युग की चेतना के अनुरूप परिवर्तित हो रहे साहित्यिक मूल्यों, प्रतिमानों और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर कविता में नए भावबोध...

कविताः नदी स्त्री है

नीरज नीर की कविता

कविताः लव का लैम्पपोस्ट

संजय स्वतंत्र की कविता

किताबें मिलीं: ‘नान्या’, ‘दस कालजयी उपन्यास’, ‘पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भया’ और ‘सृजन-रंग’

‘नान्या’ की यह कथा अपने भीतर के एकांत में घटने वाले आत्मसंवाद का रूप ग्रहण करती हुई इतनी पारदर्शी हो जाती है कि पाठक...

कविताः आखिर हम कब तक अबला कहलाएंगे..

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविताएं

कहानीः फटा जूता

सारा सामान रख लिया, कुछ रह तो नहीं गया! सोलंकी ने एक दृष्टि जमीन पर बिछी बोरी पर डाली। हां, सब कुछ रख लिया,...

किताबें मिलींः ‘अशोक राजपथ’, ‘अनुभूति और अभिव्यक्ति’ और ‘अनंतिम मौन के बीच’

अशोक राजपथ अवधेश प्रीत का यह उपन्यास बिहार के कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षण-परिवेश को उजागर करता है कि किस तरह प्राध्यापक अपनी अतिरिक्त...

कविताः उठो, कि सुबह हो गई है

संजय स्वतंत्र की कविता

नन्ही दुनिया: कहानी – घमंडी धोलू

रूकरा गांव में एक बहुत पुराना नीम का पेड़ था। उस पर कई प्रकार के पंछी रहते थे। उनमें आपस में बहुत प्रेम था।...

ललित प्रसंगः सही जवाब की शिनाख्त

हम जो कुछ भी देख रहे हैं, देख पा रहे हैं, वह वास्तविकता नहीं है। वास्तविक नहीं है है। वह सब किसी की महत्त्वाकांक्षा...