तुलनात्मक धर्म के जाने-माने विद्वान और मैकगिल यूनिवर्सिटी में बिरक्स प्रोफेसर अरविंद शर्मा का 30 सितंबर 2026 को 86 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 225 से ज्यादा पुस्तकें लिखी थीं। उन्हें वर्ष 2025 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था।

अरविंद शर्मा का जन्म भारत में हुआ था और उनकी शुरुआती शिक्षा भी यहीं हुई थी। इसके बाद वे आईएएस में शामिल हुए और गुजरात राज्य (1962-68) में सेवा की। बाद में उन्होंने अमेरिका में अपना एकेडमिक करियर फिर से शुरू किया। इसी दौरान, 1976 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया में लेक्चरर नियुक्त किया गया और उन्होंने क्वींसलैंड और सिडनी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया। 1987 में वे मैकगिल यूनिवर्सिटी चले गए, जहां वे अभी ‘तुलनात्मक धर्म’ के बिरक्स प्रोफेसर हैं। उन्होंने अमेरिका (नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी, बोस्टन यूनिवर्सिटी, टेम्पल यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी) और भारत (नालंदा यूनिवर्सिटी) में भी पढ़ाया है।

अरविंद शर्मा ने तुलनात्मक धर्म और भारतीय धर्मों के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लेखन और प्रकाशन किया है। उनके द्वारा संपादित दो किताबें इस क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हैं। पहली तो ‘वुमन इन वर्ल्ड रिलीजन्स’ (SUNY 1987) और ‘आवर रिलीजन्स’ (हार्पर, 1993)। उनकी सबसे हालिया किताब का शीर्षक ‘रिलिजियस टॉलरेंस: ए हिस्ट्री’ (2019) है।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने भी दुख जाहिर किया

भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने भी दुख जाहिर किया है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “प्रोफेसर अरविंद शर्मा (13 जनवरी 1940 – 30 सितंबर 2026) 1990 के दशक में हममें से कई लोगों के लिए एक विद्वान-मार्गदर्शक थे। वे कक्षा के अंदर और बाहर एक अद्भुत शिक्षक थे। उनका निधन एक अत्यंत दुखद क्षति है। संस्कृत के विद्वान और धर्मों, विशेष रूप से हिंदू धर्म के विशाल ज्ञान से परिपूर्ण, प्रोफेसर शर्मा ने अपने लेखन और तुलनात्मक धर्म एवं हिंदू धर्म पर लिखी या संपादित कई पुस्तकों के माध्यम से धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्र के अध्ययन में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए।”

कंचन गुप्ता ने आगे लिखा, “उनका घर मैकगिल विश्वविद्यालय था, जहां वे 1994 से तुलनात्मक धर्म के बिरक्स प्रोफेसर थे और विशेष रूप से उनका कार्यालय-पुस्तकों, कागजों और उनके गहन विचारों से भरा हुआ। मुझे उस ज्ञान के मंदिर में जाने और गुरु के चरणों में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रोफेसर शर्मा को बनारस (जहां उनका जन्म हुआ था) या प्रयागराज (जहां उन्होंने अध्ययन किया था) में पढ़ाना चाहिए था, दोनों शहर ज्ञान और विद्वत्ता के केंद्र थे। उनका न कर पाना हमारी सभ्यता के तीव्र पतन का एक भयावह प्रमाण है और हमारी सांस्कृतिक पहचान के गंभीर क्षरण का एक अभिशाप है, इसके अलावा हमारे प्राचीन शिक्षा जगत के पतन और मृत्यु का भी। अनेक मायनों में वे एक ऋषि थे, एक महान आत्मा, एक तेजस्वी बुद्धि वाले व्यक्ति जिन्होंने अपना पूरा जीवन सांसारिक वस्तुओं और अभिलाषाओं से विरक्त होकर ज्ञान अर्जित करने और साझा करने के मार्ग पर व्यतीत किया। उनके द्वारा छोड़े गए कार्यों से सनातन धर्म समृद्ध हुआ है। उनके न रहने से सनातन धर्म गरीब हो गया है। प्रो. शर्मा हमें धर्म के मूल सिद्धांत की सदा याद दिलाते रहेंगे: धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्… उनकी आत्मा को सद्गति प्राप्त हो। ॐ शांति शांति शांति ।।”