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विशेष: संक्रमण जब-जब लेखन तब-तब

अब सवाल यह है कि इन महामारियों का संज्ञान उस समय के साहित्य ने किस तरह लिया? समाज में घटित घटनाओं का संज्ञान लेना साहित्य का दायित्व होता है। साहित्य अपने समय को रेखांकित करता है। वह अपने समय के सवालों से लगातार टकराता है। साहित्य इन सबसे अछूता नहीं रह सकता।

Author Updated: November 16, 2020 1:48 PM
दुनिया भर में जब-जब महामारी का प्रकोप हुआ, तब-तब साहित्य में उस पर बहुत कुछ लिखा गया। यही लेख तत्कालीन व्यवस्था के बारे में बताते हैं।

कोरोना महामारी के संकट ने सेहत के मोर्चे पर तो हमें चौकन्ना किया ही ही, इस कारण हम मानवीय संवेदनाओं के उन तलों को भी लगातार स्पर्श करने की कोशिश कर रहे हैं, जो ऐसे समय में मनुष्य की भीतरी पीड़ा और उससे जुड़े मनोविज्ञान को नए सिरे से हमारे सामने परिभाषित करता है। दिलचस्प है कि कोरोना से पहले भी महामारियों की चपेट में इंसानी सभ्यता आती रही है। अच्छी बात यह है कि न सिर्फ अभी बल्कि पहले भी साहित्यकारों ने इस तरह के संकट की स्थिति में फंसे लोगों और उनके समाज के बारे में लिखा है। इनमें कई कृतियां तो विश्व साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। कोरोना के दौर में और उससे पूर्व लिखे गए साहित्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं नीरज कुमार मिश्र।

चीन के वुहान शहर से निकला कोरोना वायरस इतना खतरनाक होगा, इसका किसी को पता नहीं था। आलम यह रहा कि आरंभ में चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसको गंभीरता से नहीं लिया। आज इस लापरवाही का खामियाजा पूरा विश्व भुगत रहा है। कोरोना का संक्रमण लगभग पूरे विश्व में फैल चुका है। बड़े और विकसित देशों की तकनीक भी इसे रोक पाने में असमर्थ रही है। इस विषाणु से संक्रमित लोगों की संख्या पांच करोड़ से ऊपर पहुंच गई है। इस महामारी ने अब तक 13 लाख से ज्यादा लोगों को लील लिया है। यही वजह है कि इस महामारी की व्यापकता को देखते हुए इसे वैश्विक महामारी घोषित किया गया। हालांकि, यह संकट अपने लक्षण, प्रभाव और विस्तार के मामले अब तक की महामारियों से खासा अलग और ज्यादा घातक है।

संवेदना का संज्ञान
अब सवाल यह है कि इन महामारियों का संज्ञान उस समय के साहित्य ने किस तरह लिया? समाज में घटित घटनाओं का संज्ञान लेना साहित्य का दायित्व होता है। साहित्य अपने समय को रेखांकित करता है। वह अपने समय के सवालों से लगातार टकराता है। साहित्य इन सबसे अछूता नहीं रह सकता। यही वजह है कि समूचे विश्व साहित्य ने समय समय पर आई इन महामारियों का संज्ञान लिया है। कोरोना के समय पूरे विश्व में जिस तरह की परिघटनाओं को हम देख रहें हैं, उन्हें आज के रचनाकारों ने अलग-अलग विधाओं में दर्ज किया है। कोरोना से पहले आईं अनेक महामारियों की वास्तविकताओं और इनके प्रभावों को पहले के साहित्यकारों ने रेखांकित किया है।

ब्रिटिश लेखक डैनियल डेफो ने 1722 में ‘ए जर्नल आॅफ प्लेग ईयर’ नामक पुस्तक में 1665 में लंदन में फैली प्लेग महामारी के बारे में जिक्र किया है। उस पुस्तक में लेखक ने उस समय के ‘लॉकडाउन’ के नियमों का जिक्र किया है। जुलाई 1665 में लंदन के सार्वजनिक जगह पर इकट्ठा होने की पाबंदी लगा दी गई। लेकिन जैसा भारत में हो रहा है कि लोग पूर्णबंदी का पालन ठीक से नहीं कर रहे, इस पुस्तक के अनुसार वैसा उस समय लंदन का भी नजारा था।

डेफो के अनुसार, ‘लंदन वालों के लिए घातक बात यह हुई कि कुछ लोग उस पाबंदी मानने को तैयार नहीं थे। ऐसे लोग लगातार लापरवाही करते जा रहे थे। वो लोग रास्तों में घूमते थे। सामान लेने के लिए जगह- जगह भीड़ लगा लेते। जबकि उन्हें उस समय घर में रहना चाहिए।’ इस लापरवाही का आलम ये हुआ कि अगस्त खत्म होते होते सैकड़ों लोग इस महामारी से अपनी जान गंवा बैठे। इस पुस्तक में पृथक (क्वारंटीन) किए गए लोगों का मार्मिक चित्रण है। आज यही हालात भारत में भी है। लोग बेहद लापरवाही दिखा रहे हैं जिसकी वजह से संक्रमण का आंकड़ा अब भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।

कामू की कलम
इसी तरह अल्बर्ट कामू ने भी अपनी पुस्तक ‘द प्लेग’ में उन्नीसवीं सदी में अल्जीरिया के शहर ओरान में आई प्लेग महामारी का वर्णन किया है। इस पुस्तक के बहुत से वर्णनों में आज के समय के अनेक चित्र मिलते हैं। 1939 में छपे उपन्यास ‘पेल  हॉर्स, पेल राइडर’ में स्पेनिश फ्लू महामारी का जिक्र ब्रिटिश लेखिका कैथरीन इन पोर्टर ने किया है। इसी तरह स्टीफेन किंग ने 1978 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द स्टैंड’ में कैप्टन ट्रिप्स नामक फ्लू को केंद्र में रखा है। इस फ्लू ने भी विश्व में बड़ी तबाही मचाई थी। गैब्रियल गार्सिया मार्खेस ने 1985 में लिखे अपने उपन्यास ‘लव इन द टाइम आफ कॉलरा’ में प्यार को केंद्र में रखकर युद्ध और कॉलरा से प्रभावित लोगों का जीवंत वर्णन किया है। ‘द चाइल्ड गार्डन’ उपन्यास में जेओफ रैमन ने कैंसर बीमारी की विभीषिका को दर्शाया है।

इधर कुछ सालों में कई महामारियों ने अपने पैर पसारे हैं। 2002 में सार्स, 2012 में आया मर्स और 2014 में आया इबोला आदि विषाणुओं का प्रकोप इसके उदाहरण हैं। विश्व साहित्य की अनेक पुस्तकों में इनके प्रभाव को देखा जा सकता है। जैसे मैरी शैली का लिखा ‘द लास्ट मैन’,रिचर्ड प्रेस्टन का ‘द हॉट जोन’, एडगर एलन पो की कहानी ‘द मास्क आफ द रेड डेथ’, माइकल क्रिस्टन का ‘द एंड्रोमेड स्ट्रेन’, पुर्तगाली उपन्यासकार खोसे सारामायो ने अपने उपन्यास ‘ब्लाइंडनेस’ में अंधेपन की महामारी की मार्मिक वर्णन किया है।

जिम क्रेस ने ‘द पेस्टहाउस’ में प्लेग महामारी का वर्णन किया है। कोरियाई उपन्यासकार हे यंग प्यून ने अपने उपन्यास ‘सिटी आॅफ ऐश एंड रेड’ में प्लेग महामारी से संक्रमित व्यक्ति की दास्तान को बेहद मार्मिकता से व्यक्तकिया है। ‘चिल्ड्रन हॉस्पिटल’, ‘फाइंड मी’, ‘सेवरेन्स’, ‘द बुक आॅफ एम’, ‘द ईयर आॅफ द फ्लड’ आदि पुस्तकों में किसी न किसी रूप में महामारियों का जिक्र हुआ है।

बाढ़ और अकाल
हिंदी साहित्य में भी भारत में हैजा, प्लेग, चेचक, मलेरिया, टायफाइड और टीबी जैसी महामारियों का जिक्र देखने को मिलता है। भारत में महामारियों के साथ अकाल और बाढ़ बड़ी त्रासदी के रूप में समय-समय पर आते रहे हैं। जिसका संज्ञान उस क्षेत्र विशेष का साहित्य लेता रहा है। गोस्वामी तुलसीदास की ‘कवितावली’ में उस समय के अकाल, भूख और महामारी का वर्णन मिलता है। उसके बाद के साहित्य की सभी विधाओं में किसी न किसी रूप में इनका विवरण मिल जाएगा।

रवींद्रनाथ ठकुर ने अपनी काव्य रचना ‘पुरातन भृत्य’ में उस समय फैली चेचक महामारी का वर्णन किया है। तपेदिक ने उनसे उनकी बेटी और बेटे को छीन लिया। इस दर्द से गुजरते हुए उन्होंने ‘शिशु’ नाम से अलग-अलग उपशीषर्कों से कविताएं लिखीं। जो बाद में ‘अर्धचंद्र’ नाम से छपा। बंकिमचंद्र चटर्जी के ‘आनंद मठ’ के पहले भाग के प्रारंभ में बंगाल के अकाल की विभीषिका का जिक्र है।

मास्टर भगवानदास ने अपनी कहानी ‘प्लेग की चुड़ैल’ में प्लेग महामारी से प्रयाग शहर में व्याप्त डर के मनोविज्ञान का सजीव चित्रण किया है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘श्रीकांत’ में प्लेग महामारी से सामाजिक स्थिति में हुए प्रभावों का मार्मिक वर्णन किया गया है। रांगेय राघव के रिपोतार्ज ‘तूफानों के बीच’ और प्रकाश चंद गुप्त के रिपोतार्ज ‘बंगाल का अकाल’ में बंगाल के अकाल का मार्मिक वर्णन मिलता है। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘आरण्यक’ में और ताराशंकर बंद्योपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘धात्री देवता’ में हैजा महामारी का चित्रण किया है।

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