मनुष्य का अपने घर से निकलना हमेशा से मुश्किल क्रिया रही है। अनजाने सफर पर वह जीत की उम्मीद लेकर निकलता है, लेकिन लौटते समय उसे पता चलता है कि असली यात्रा बाहर की दुनिया की नहीं, अपने भीतर की थी। यही कारण है कि होमर की ‘ओडिसी’ तीन हजार साल बाद भी हमें आज की कहानी लगती है। ट्राय का युद्ध खत्म हो चुका है, देवता पुराने हो चुके हैं, समुद्रों के नक्शे बदल चुके हैं, लेकिन घर लौटने के लिए भटकता हुआ मनुष्य आज भी हमारे बीच मौजूद है।

होमर के ओडीसियस के सामने समुद्र है, तूफान है, राक्षस हैं, देवताओं का क्रोध है और अपनी महत्त्वाकांक्षा है। इन सबके बीच उसकी लड़ाई घर वापसी की है। क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘ओडिसी’ इसी प्राचीन कथा को विशाल पर्दे पर लेकर आई है। यहां भी ओडीसियस के सामने वही बुनियादी सवाल है कि युद्ध जीतने के बाद आदमी अपने घर तक कैसे पहुंचे? नोलन ने लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी कथा को जिस पैमाने पर फिल्माया है, वह स्वयं एक सिनेमाई यात्रा है।

‘ओडिसी’ के इस सिनेमाई रूप के मूल में भी यही सवाल है कि घर पहुंचने की तड़प क्यों होती है?ओडीसियस के लिए इथाका सिर्फ एक जगह नहीं है। वहां उसका परिवार है, उसके अतीत की पहचान है। योद्धा जिस घर की ओर लौट रहा है, वो दरअसल उस मनुष्य की ओर लौटना है जो वह युद्ध में जाने से पहले था। लेकिन ओडीसियस अब पहले जैसा नहीं रहा है।

युद्ध सिर्फ सत्ता ही नहीं मनुष्य को भी बदल देता है। ओडीसियस पहले जैसा नहीं है और इथाका भी वैसी जगह नहीं है, जैसा उसने छोड़ा था। यही मनुष्य की हर वापसी की त्रासदी है। हम जिस घर को छोड़कर जाते हैं, जब लौटते हैं तो अक्सर वह घर उस रूप में नहीं मिलता।

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ओडीसियस की यात्रा में समुद्र केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। वह मनुष्य की परीक्षा है। बाधाओं की अच्छी बात यह है कि वह मनुष्य को बंधन मुक्त करती हैं। मनुष्य सिर्फ अपने घर को नहीं बल्कि खुद को भी पहचानने लगता है।

‘ओडिसी’ प्रश्न उठाती है कि क्या मनुष्य हमेशा वही चाहता है जो उसके लिए अच्छा है? कभी-कभी घर लौटना इसलिए कठिन होता है कि रास्ते में ऐसे आकर्षण मिलते हैं जिनके कारण आदमी अपनी मंजिल भूल सकता है। आज आकर्षण बदल चुके हैं। स्क्रीन की सत्ता है, इंटरनेट पर प्रसिद्धी है। इसलिए ओडिसी की यात्रा आज भी जारी है।

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क्रिस्टोफर नोलन की फिल्मों में समय के पास वह शक्ति दिखती है जो मनुष्य की चेतना को बदल देती है। नोलन की ‘ओडिसी’ में समुद्र समय की विशालता का प्रतीक है। मनुष्य उसके सामने कितना छोटा है। तीन हजार साल पुरानी कहानी और आज की सबसे उन्नत सिनेमाई तकनीक एक साझा सवाल पूछती है-मनुष्य आखिर लौटता कहां है? महान मिथकों की यही ताकत होती है कि हर युग में उसे नया रचनाकार मिलता है। ‘ओडिसी’ वीरता की कहानियों के ढांचे को बदल देती है। युद्ध जीतना ओडीसियस की शुरुआत है।

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‘गुनाहों का देवता’ के चंदर और सुधा ने लंबे समय तक प्रेम की आदर्श स्थिति पर बहस चलाई है। धर्मवीर भारती का चंदर प्रेम को जीता नहीं है, बल्कि उसकी पूजा करता है। वह अपने गुरु के प्रति आदर्श की चारदीवारी खड़ी कर उसी में कैद हो जाता है। चंदर हर निर्णय को नैतिकता पर इतना परखता है कि सबसे ज्यादा अनैतिक परिणाम सामने आता है। उसकी प्रेमिका सुधा भी प्रेम के आगे पिता के निर्णय को सर्वोच्च मानती है। न दो लोग प्रेम कर पाते हैं, न खुश रह पाते हैं। उनका जीवन एक शून्य में तब्दील हो जाता है। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक