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नृत्योत्सवः शिव और पार्वती की सुंदर नृत्य प्रस्तुति

रावण ने शिव तांडवस्त्रोत की रचना की थी। इसमें शिव के रौद्र रूप का विवेचन है, जिसे अक्सर कलाकार गाते और नृत्य में पेश करते हैं। आचार्य बृहस्पति ने पार्वती की कोमलता यानि लास्य अंग को पार्वतीलास्यम में छंदों के माध्यम से शब्दांकित किया था। इसमें शिव स्वर हैं और ताल शक्ति हैं।

Author नई दिल्ली | August 9, 2019 1:07 AM
दो दिवसीय समारोह के दौरान आचार्य बृहस्पति की रचनाओं का गायन और उनके विषय में संवाद रखा गया। आचार्य बृहस्पति का आल इंडिया रेडियो में योगदान, पर्वतीलास्यम का काव्य सौंदर्य और उनकी यादों के बारे में कला जगत के मनीषियों ने अपने विचारों को व्यक्त किया।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत में वाग्येकार आचार्य बृहस्पति का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने हिंदी, संस्कृत और उर्दू में बंदिशों की रचना की। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और नृत्य के शास्त्र पक्ष का विशद विवेचन किया। उनकी समग्र रचनाओं का संकलन भारतीय कला की अनुपम धरोहर है। यह वर्ष उनका शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से समारोह का आयोजन किया गया। दीक्षा कार्यक्रम शृंखला के तहत यह समारोह था। दो दिवसीय समारोह के दौरान आचार्य बृहस्पति की रचनाओं का गायन और उनके विषय में संवाद रखा गया। आचार्य बृहस्पति का आल इंडिया रेडियो में योगदान, पर्वतीलास्यम का काव्य सौंदर्य और उनकी यादों के बारे में कला जगत के मनीषियों ने अपने विचारों को व्यक्त किया। इस अवसर पर उनकी कृति पार्वतीलास्यम की नृत्य परिकल्पना पेश की गई। भरतनाट्यम नृत्य शैली में विद्या राव ने परिकल्पित किया था।

रावण ने शिव तांडवस्त्रोत की रचना की थी। इसमें शिव के रौद्र रूप का विवेचन है, जिसे अक्सर कलाकार गाते और नृत्य में पेश करते हैं। आचार्य बृहस्पति ने पार्वती की कोमलता यानि लास्य अंग को पार्वतीलास्यम में छंदों के माध्यम से शब्दांकित किया था। इसमें शिव स्वर हैं और ताल शक्ति हैं। इसी अवधारणा को पार्वतीलास्यम में नृत्यांगनाओं ने पेश किया। उन्होंने नृत्य प्रस्तुति के लिए 12 चरणों में से चार चरण का चयन किया था।

नृत्य प्रस्तुति के आरंभ में नृत्यांगनाओं ने लयात्मक गणेश वंदना पेश किया। यहां नृत्यांगनाओं ने भरतनाट्यम की जतीस का सुंदर सुयोग के साथ पार्वती के अवतरण को दर्शाया। शिव और पार्वती के सौंदर्य का सुंदर वर्णन पेश किया। इसके लिए ‘शशांकम शेखरोज्जवला स्मितां महेशमोहिनी महेश्वरी’ के बोलों पर पार्वती के रूप का मोहक चित्रण नृत्यांगनाओं ने किया। पार्वती और अप्सराओं का शिव के प्रति भावों और अनुभावों का विवेचन भी आंगिका अभिनय के जरिए पेश किया गया। ‘गिरिशनंदिनी सुहासिनी मधुकर गंजिता’ नृत्य के माध्यम से शिव के प्रति पार्वती के समर्पण भाव का विवेचन मार्मिक था। नृत्यांगनाओं ने संचारी भावों के जरिए बहुत ही संक्षिप्त रूप में रती-कामदेव प्रसंग को भी निरूपित किया। इसके साथ ही, पार्वती के लास्य नृत्य और नुपूर की झंकार का वर्णन उन्होंने अगले अंश में पेश किया।

छंद ‘हरित्सुवर्ण कुंडल लसत’ में लास्य नृत्य का लयात्मक नर्तन लासानी था। नृत्यांगनाओं का एक-एक आंगिक दोलन और चेष्टा मनोहारी थी। उन्होंने नायिका की कोमलता को बहुत ही धीरता और लयात्मकता से दर्शाया। पार्वती के लास्य नृत्य की पराकाष्ठा ‘स्वरानुवर्तिणीगिरींद्र’ में दिखी। जब शिव और पार्वती आनंद मग्न और एकाकार होकर परमानंद में लीन हो जाते हैं। यह नृत्य रचना एक अनूठी पहल कही जा सकती है क्योंकि आमतौर पर भरतनाट्यम में नवाचार कम देखने को मिलता है। इस प्रयास के लिए अदिति, गौरी सागर, मयूरी, सुप्रिया और स्नेहा नारायण सभी नृत्यांगनाओं को सराहा जाना चाहिए।

दो दिसवीय समारोह के दौरान शास्त्रीय गायिका सरिता पाठक ने आचार्य बृहस्पति उर्दू खयाल की बंदिशों को गाया। यह राग संजोग में पिरोया गया था। उन्होंने विलंबित लय में ‘माई मोरी पीर कासे कहूं’ और द्रुत खयाल ‘ऐसी भी नाराजगी कहिए’ गाया। इसके अलावा, युसुफ खान निजामी ने कव्वाली पेश की। उन्होंने शिव स्तुति और रचना ‘जो रंग में उसके डूब गए’ को कव्वाली के अंदाज में गाया।

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