सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी कविता में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती स्त्री को दिखाया। ‘वह तोड़ती पत्थर’ आज भी श्रमिक वर्ग के संघर्ष को दर्शाती सशक्त साहित्यिक रचनाओं में से एक है। उस वक्त भारत एक उपनिवेश था। रचनाकार यथार्थ की ठोस जमीन पर कविता के बीज बोने की कोशिश में थे। इसी वक्त निराला लिखते हैं, ‘वह तोड़ती पत्थर/देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर’।
जिस स्त्री के हाथों को छायावादी कविता कमल की नाल की तरह देख रही थी, निराला उसके हाथों में भारी-भरकम हथौड़ा पकड़ा देते हैं। निराला के शब्दों में स्त्री के प्रति करुणा नहीं निकलती है, बल्कि पाठक उसे शक्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
निराला लिखते हैं-‘गुरु हथौड़ा हाथ’। जो स्त्री अट्टालिका के निर्माण में जुटी है उसके अपने सिर पर छाया नहीं है। ऐसा ही दृश्य हमें इक्कीसवीं सदी में कोरोना के समय दिखा था, जब दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों से मजदूर पैदल ही अपने गांवों के लिए निकल गए थे। जिस शहर को उन्होंने बनाया था, वहीं उनके लिए आसरा नहीं था। उस वक्त शहर से निकाले जा रहे मजदूर और इलाहाबाद की 1935 की स्त्री दोनों के लिए निराला कहते हैं, ‘जो मार खा रोई नहीं।’
श्रमिक स्त्रियों के लिए रोना भी एक विलासिता है। निराला ने उस स्त्री को न तो कोई नाम दिया, और न ही उसकी कोई जातिगत पहचान बताई। वह स्त्री प्रतीक है संसाधनों के गैरबराबरी की। कविता की आखिरी पंक्ति है, ‘लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-मैं तोड़ती पत्थर।’ यहां पर वह स्त्री अब खुद अपनी बात कह रही है। कवि ने स्त्री की बात ‘वह’ से शुरू की थी।
अंत में स्त्री ‘मैं’ हो जाती है। एक वर्गीय संवाद के बाद ही श्रमिक स्त्री का ‘मैं’ दिखता है। पत्थर तोड़ना मुश्किल श्रम में से एक है। यह कविता इतिहास में मुश्किल कामों को करती स्त्री के योगदान को गुमनाम रखने की साजिश का प्रतिरोध है।
