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चर्चाः संगोष्ठियों का सच – साहित्य-चिंता का नया संदर्भ

साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सृजनात्मक विकास को गतिशील करने के लिए सेमिनार-गोष्ठियों का महत्त्व निर्विवाद है। बशर्ते इसे ठीक से संपन्न किया जाए। विषय निर्धारण के साथ वक्ताओं, विषय-विशेषज्ञों के चयन, शोध पत्रों का संकलन-आमंत्रण तथा तैयारी की जरूरी प्रक्रिया से गुजर कर कोई सेमिनार सार्थक होता है।

Author September 30, 2018 2:02 AM
साहित्य-विमर्श का संवादी होना एक तरह के सृजनात्मक प्रयासों को गतिशील बनाने में सहयोगी होता है।

संगोष्ठियों यानी सेमिनारों का मकसद होता है किसी विषय पर अलग-अलग लोगों की राय जुटाना। मगर खासकर साहित्य में यह मकसद अब कहीं खोता गया है। साहित्यिक संगोष्ठियों को लेकर अक्सर यह आरोप लगता है कि आयोजक अपने परिचय के लोगों को या ऐसे लोगों को बुलाते हैं, जिनसे उनका कोई स्वार्थ सधने वाला हो। इस तरह इन सोमिनारों में ऐसे बहुत सारे लोग जुट जाते हैं, जिनका निर्धारित विषय से कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसी संगोष्ठियों से न तो श्रोताओं को कोई लाभ मिलता है, न संबंधित संस्थान को। इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

राजेश मल्ल

हिंदी साहित्य के विकास में सेमिनारों-व्याख्यानों का योगदान अभूतपूर्व है। व्याख्यानों-सेमिनारों-गोष्ठियों द्वारा एक विशाल साहित्यिक-अकादमिक समाज का निर्माण इसकी अभूतपूर्व फलश्रुति है। इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, कानपुर, जबलपुर, भोपाल, गोरखपुर, पटना, मुजफ्फरपुर, पंचकूला, दिल्ली आदि के कैंपस तथा शहरों में होने वाले सेमिनारों, गोष्ठियों, व्याख्यानों ने गंभीर अकादमिक सवालों से एक व्यापक साहित्यिक समूह को जोड़ा, तो दूसरी तरफ साहित्य सृजनकर्ताओं को धार दिया। इसके महत्त्व को ‘हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास’ (सं.- नीलाभ ‘अश्क’) किताब के जरिए बेहतर समझा जा सकता है। यह व्यक्तिगत और प्रगाढ़ मित्र संबंधों के बीच तीखी तथा तैयारी के साथ की गई वैचारिक बहसों का अंतहीन आख्यान एक तरफ विशद तथा गहरे अध्ययन का दस्तावेज है, तो दूसरी तरफ वैचारिक लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण उदाहरण।

नीलाभ ने परिमल तथा प्रतिशील लेखक संघ की गोष्ठियां का वर्णन करते हुए उस वैचारिक ताप और उल्लास को रेखांकित किया है, जो ‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ से लेकर ‘जनता का साहित्य’, ‘साहित्य की पक्षधरता’, ‘विचारधारा और साहित्य’ जैसे विषयों-विचारों को हिंदी के आचार्यों के बीच आमफहम बनाया था। सेमिनारों-व्याख्यानों में सहभागी लोगों की तैयारी तथा सूक्ष्म विश्लेषण चकित-विस्मित करने वाले हैं। प्रमाण के तौर पर व्याख्यानों के संकलन तथा सेमिनार में प्रस्तुत आलेखों की प्रकाशित कृतियों को देखा-पढ़ा जा सकता है।

साहित्य-विमर्श का संवादी होना एक तरह के सृजनात्मक प्रयासों को गतिशील बनाने में सहयोगी होता है। साहित्य अपने अंतिम विषयों में सामाजिक होता है और उसे संभव करने में सेमिनारों, गोष्ठियों, रचनापाठ और बातचीत का महत्त्व निर्विवाद है, बशर्ते यह सारा कर्म साहित्येतर लक्ष्यों से मुक्त हो।आज यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हिंदी जगत अपनी इस महान विरासत से महरूम है। कुछ एक गैर-सरकारी प्रयासों को छोड़ दें तो सेमिनारों-गोष्ठियों की हालत अत्यंत निराशाजनक है। इसको जानने-समझने के लिए इन आयोजनों का भोक्ता तथा सहभागी होना जरूरी है। वरना इस अकादमिक दिवालिएपन तथा अविवेकपूर्ण स्वरूप को ठीक से समझा ही नहीं जा सकता है। इसके सर्वाधिक शिकार विश्वविद्यालय परिसर तथा सरकारी साहित्यिक संस्थाएं हुई हैं। एक तरह से यह बहुत बढ़ा घोटाला-सा है। जनता के धन का अपव्यय और शोध छात्र-छात्राओं का खुला शोषण है। आश्चर्यजनक तो यह है कि इस तरह के कर्मों में कुछ एक लेखक संगठनों के भी आयोजन शिकार हुए हैं।

इस बीमारी का व्यापक तथा भयावह रूप विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए अकादमिक परफारमेन्स इंडेक्स (एपीआई) लागू होने के बाद सामने आए। वैसे पहले भी सेमिनारों के विषय चयन, प्रस्ताव निर्माण तथा धन स्वीकृति का खेल होता था। अहो रूपम् अहो ध्वनिम् वाले आयोजन होते ही थे, लेकिन गंभीर अकादमिक विमर्श पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। अविवेक और फूहड़ता का प्रतिशत कम था, लेकिन आज तो कुपढ़ आचार्यों, दूसरे दर्जे के शिक्षकों, सेमिनार के प्रमाण पत्र बेचने वाले आयोजकों की एक बड़ी जमात तैयार हो चुकी है। जैसे कवि सम्मेलनों के आयोजक-ठेकेदार हैं वैसे ही सेमिनारों के। उनके अलग-अलग गिरोह- ग्रुप हैं, जो अकादमिक जगत के चरखा चला रहे हैं और अपने अज्ञान से साहित्यिक-वैचारिक पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं।

चूंकि राष्ट्रीय सेमिनार के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के अंक ज्यादा होते हैं, इसलिए नेपाल, भूटान या दिल्ली में कृतकार्य आचार्यों का नाम डाल कर सेमिनार को अंतरराष्ट्रीय बनाने का अचूक नुस्खा भी विकसित हो गया है। पंजीकरण शुक्ल से लेकर प्रमाण पत्र तक की बिक्री लूट का नया रूप है। इस क्रम में विगत वर्षों में मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री आदि लोगों को भी सेमिनारों के उट्घाटन, समापन के लिए आमंत्रित करने का सिलसिला निकल पड़ा है। धन-स्वीकृति के साथ कुछ एक प्रांत-प्रचारक या बौद्धिक, जिनका विषय से कोई लेना-देना नहीं होता, उनका व्याख्यान अनिवार्य रूप से सेमिनार में अब शामिल है। इस रूप में अकादमिक सहज ही राजनीतिक मंचों में बदल जाते हैं। कई बार मान्य आचार्य कहीं कोने में खड़े रहते हैं, राजनेताओं की भीड़ के जाने के बाद दिखाई पड़ते हैं।

साहित्यिक-वैचारिक सेमिनारों गोष्ठियों में एक गिरावट पहले ही शुरू हो चुकी थी। अभिनंदन ग्रंथ से लेकर अपने द्वारा नियुक्त अपने विद्यार्थी-शोधार्थी द्वारा अपने पर ही सेमिनार आयोजित करवा देना, पत्रिका का विशेषांक छपवाना, इस तरह की बीमारी थी, लेकिन इसकी बाढ़-सी आ जाएगी, किसी ने सोचा ही नहीं था। इस तरह के प्रायोजित आयोजन अपनी जड़ता और अहंकार पोषण के उद्देश्य से होते थे। साहित्य जगत इसे नोटिस नहीं लेता था। इसे अगंभीर तथा बुद्धिहीनता का प्रमाण मान कर टाल दिया जाता था। लेकिन यह चलन अब आम होता जा रहा है।

इस भयावह अकादमिक वातावरण से इतर कुछ सार्थक प्रयास होते तो हैं, लेकिन उनकी संख्या तथा आवाज काफी धीमी-सी पड़ गई है। जाने-अनजाने निरंतर चलने वाले आयोजनों ने सेमिनार-गोष्ठियों के होने को ही प्रश्नांकित कर दिया है। इस तरह से एक आवश्यक और जरूरी कर्म आज हमारे वैचारिक समझ के विकास को ही धुंधला-गंदला कर दिया है। किसी भी अनुशासन के अधुनातन अध्ययन से परिचित होने का सबसे जरूरी मंच सेमिनार-गोष्ठियां होती हैं। जब बड़े आचार्यों तथा नवोदित शोध-अध्ययनकर्ता एकत्रित होते हैं। अपने अध्ययन प्रस्तुत करते हैं। जब विभिन्न तरह के चिंतन-मनन को आपस में साझा करते हैं, बहस-संवाद करते हैं तथा कुछ नया सोचने-समझने का अवसर प्रदान करते हैं, तो विषय की समझ से लेकर सोचने-समझे की दृष्टि विकसित होती है।

साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सृजनात्मक विकास को गतिशील करने के लिए सेमिनार-गोष्ठियों का महत्त्व निर्विवाद है। बशर्ते इसे ठीक से संपन्न किया जाए। विषय निर्धारण के साथ वक्ताओं, विषय-विशेषज्ञों के चयन, शोध पत्रों का संकलन-आमंत्रण तथा तैयारी की जरूरी प्रक्रिया से गुजर कर कोई सेमिनार सार्थक होता है। इसमें होने वाली थोड़ी भी चूक आपको अपने लक्ष्य से भटका देती है और सारी कवायद एक गलचौर में बदल जाती है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि समय का आबंटन हो तथा उसका पालन भी हो। अब ऐसे प्रयास बहुत कम हो रहे हैं।

देखने-मिलने, बात करने की सहज ललक, जिज्ञासा और उत्साह कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। एक संवादी वातावरण आपको कहीं गहरे वैचारिक रूप से संपन्न कर जाता है। पर इसका गिरता हुआ स्तर मन को दुखी कर जाता है। इस दिशा में आज भी जवाहरलाल नेहरू विवि ने अपनी गरिमा नहीं खोई है। आज भी अनेक लोग ऐसे हैं, जो सेमिनार का आमंत्रण विषय को देख कर स्वीकार करते हैं, तैयारी करते हैं और निश्चित समय में अपना आलेख या वक्तव्य प्रस्तुत करते हैं। प्रश्नों को आमंत्रित करते हैं। नाम गिनाने और स्थानों के विवरण देने से बात नहीं बनती, बल्कि मूल चिंताओं से ध्यान ही हटता है।

जरूरी है कि उस चिंता को साझा किया जाय, जिससे सेमिनार अकादमिक विमर्श तथा साहित्य के जरूरी प्रश्नों से टकराने के माध्यम के स्थान पर एक अंतहीन दुहराव और अगंभीर बचकानापन में तब्दील होता जा रहा है। वैचारिकता तथा सृजनात्मकता को धार देने की जगह ऊब और मूढ़ता पैदा कर रहा है। एक जरूरी कार्यवाही या तो राजनीतिक संबंध साधना का निमित्त बन गया है या गैरजरूरी अहंकार पोषण का साधन। सेमिनारों के आयोजन के संबंध कड़े फैसले का यह समय है, जिससे ज्ञान मीमांसा की विकास सरणि बची रह सके।

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