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कहानी: कर्ज मुक्ति

बापू की याद या कर्ज की चिंता? बापू को याद करते तो कर्ज में ना फंसते। बापू बड़े सुखी इंसान थे। गरीबी में दिन काटे, पर किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। कर्ज की गुलामी में वो कभी नहीं फंसे।

Hindi Story Karj Mukti, Dr. Veer singh
हीरा की आँखे फिर भर आईं। कर्ज की गुलामी सबसे बड़ी ! (Illustration by C R Sasikumar)

डॉ. वीर सिंह

हीरा ! क्या नाम रखा था माँ-बाप ने ! हमारे घर हीरा आ गया ! हाँ मैं हीरा ही तो हूँ, नाम का हीरा। सरकारी कागजों में मेरा नाम है हीरा सिंह पुत्र श्री भले राम। कितना कर्ज है बापू भले राम तेरे इस हीरा सिंह पर? जानता है? मेरी तीन पीढियां भी नहीं उतार पाएंगी। तू तो चला गया, और तेरा ये हीरा कर्ज की चक्की में पिस रहा है. बापउउउउउउउउउ !…….

हीरा की अचानक बेहोशी टूटती है। उसकी पत्नी दौड़ कर आती है।

“क्या हुआ?” पत्नी ने पूछा।

“कुछ नहीं,” हीरा आंसू पूछता बोला, “थोड़ा पानी लाना, धर्मा।”

क्या हुआ, बताओगे भी? देखा है क्या हालत हो गयी आपकी। चालीस के भी नहीं हुए। बुढ़ऊ लगने लगे हो,” पत्नी धर्मा गुस्से और प्यार की मिश्रित भाषा में बोली।

“बापू की याद आ रही थी।”

“बापू की याद या कर्ज की चिंता? बापू को याद करते तो कर्ज में ना फंसते। बापू बड़े सुखी इंसान थे। गरीबी में दिन काटे, पर किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। कर्ज की गुलामी में वो कभी नहीं फंसे।”

हीरा की आँखे फिर भर आईं। कर्ज की गुलामी सबसे बड़ी ! दरअसल उसको अपने साथी राजपाल की याद आ रही थी, जिसने पिछले सप्ताह ही आत्म हत्या कर ली थी।

“कम से कम रुकमा और सबरी का तो ध्यान रखो। एक १२ की हो गयी, दूसरी पूरे १० की। बेटियों को जवान होते देर नहीं लगती। उनका ब्याह करने को है एक फूटी कोड़ी भी तुम्हारे पास? और कभी होगी भी नहीं। दो पैसे कमाई करते हो, १० पैसे बैंक वालों का ब्याज हो जाता है। इन्हें तो सरकार भी नहीं रोकती। रोज घर पर आ खड़े हो जाते हैं। धमकियाँ देते हैं। कहाँ से लाएं इतना पैसा?” धर्मा बड़बड़ाये जा रही थी, और हीरा अनसुने उसको सुन रहा था।

पानी पीकर हीरा को झपकी लग गयी और उसका अवचेतन मन राजपाल की यादों में खो गया।

राजपाल के घर बैंक के कर्मचारी पुलिस ले कर आये थे। आते ही हथकड़ी पहना दी थी। उसकी पत्नी बीच में आई, तो एक पुलिस वाले ने लात मार कर उसे गिरा दिया। ये देख, राजपाल की माँ सदमे में चल बसी। समाज में किसी को भी अपमानित करने का अधिकार पुलिस को ही तो मिला है! आदमी और पुलिस वाले में यही तो अंतर है। पुलिस वाले इंसान होते तो इंसान का सम्मान भी करना जानते। इंसान की भावना भी समझते। वर्दी पहनते ही आदमी की प्रजाति से बाहर हो जाते हैं। और फिर एक स्त्री को सबके सामने लात मारने में उन्हें कैसी लज्जा?

अभी दो साल पहले ही तो राजपाल ने बैंक से ६ लाख का कर्ज लिया था। कर्ज के पैसे से बीज, खाद और कीटनाशक खरीद लिए। और तो और, एक भैंस और दो बैल भी खरीद लिए। राजपाल ने सोचा था, बैंक के कर्ज से उसके दिन फिर जाएंगे। बैंक ने छह महीने में ही नोटिस भेजना शुरू कर दिया। सूखा पड़ गया, सारी फसल बर्बाद हो गई। अगली फसल बोई तो उसे बाढ़ निगल गयी। घर में भुखमरी इतनी, तो कर्ज कैसे उतरता? चार नोटिस मिलने के बाद भी कर्ज नहीं उतार सका तो राजपाल को जेल की हवा खानी पड़ी। इधर राजपाल जेल में था, उधर उसकी पत्नी और दो युवा लड़के हाड़-तोड़ मेहनत से खेती कर रहे थे। इस बार मौसम ने साथ दिया, फसल अच्छी हुई और कम से कम इतनी आमदनी हो गई कि उसकी पत्नी एक वकील से मिल कर उसकी जमानत करवा सकी।

अब जब सारा पैसा जमानत में लग गया तो राजपाल कर्ज कैसे उतारता? छह महीने हुए नहीं कि राजपाल के घर फिर बैंक का नोटिस आ गया, जिसमे लिखा था, “अगर अब ब्याज चुकता नहीं किया तो १५ दिन में कानूनी कार्यवाही होगी।” राजपाल को जैसे सांप सूंघ गया था! वह अपने झोले में कुछ लेकर खेत की और निकल पड़ा। दो घंटे बाद खबर आई कि राजपाल ने आत्म-हत्या कर ली। उसने उसी कीटनाशक को पीकर आत्म-हत्या कर ली जिसे खरीदने के लिए उसने लोन लिया था।

बड़ी घबराहट के बाद, हीरा अवचेतन माइंड से बाहर आया। उसकी पत्नी उदास मन से उसको एक-टक देख रही थी।

“देखो जी, अब मन छोटा न करो।”, धर्मा बोली। अचानक वो देखती है कि हीरा एक-टक उस कनस्तर को देख रहा है जिसमे कीटनाशक रखा है, जिसे उसने फसलों को बचाने के लिए बैंक से कर्ज लेकर ख़रीदा था।

एक-टक कीटनाशक देखते देखते, हीरा को ऐसा लग रहा था जैसे उसके चेहरे पर मौत उतर आई हो! यह देख कर उसकी पत्नी अंदर तक घबरा गई।

“देखो जी, हमें घबराने की जरूरत नहीं। भगवान सब ठीक कर देगा। हमारे पास जमीन है, उसे बेचकर कर्ज उतार देंगे,” धर्मा हीरा का ध्यान हटाते बोली। “आखिर जमीन से मिलता ही क्या है?” सब सुखी हैं, पर किसानों को क्या मिलता है? खाने-पीने को कुछ न मिले, बस कीटनाशक चखने को मिलते हैं। नीलकंठ हो गए हैं जी हम किसान। भगवान शिव की तरह, बस दुनिया के पापों का जहर पिए जा रहे हैं। मैं तो कहती हूँ कि खेती छोडो…. और…

धर्मा कहती कहती कहीं खो गई। बहुत देर तक पता नहीं क्या क्या बोलती चली गई। तब अचानक सबरी ने उसका ध्यान हटाया। “माँ, किससे बात कर रही हो? बापू तो कहीं चले गए।”

संघर्षों के थपेड़ों से मुरझाए-से धर्मा के मुख-मंडल पर जैसे मौत रेंग गई ! वह चिल्लाते हुए दौड़ी… उसके पीछे उसकी दोनो बच्चियां। धीरे-धीरे गांव इकठ्ठा हो गया था। सब इसी आशंका से ग्रस्त थे कि कहीं हीरा ने आत्म-हत्या तो नहीं कर ली।

कुछ घंटे बाद पता चला कि हीरा बैंक में बैठा पैसे गिन रहा है। उसकी पत्नी और बच्चे वहां पहुंचे तो हीरा उनसे लिपट गया, और बोला “अब हमारे दुखों का अंत हो गया है। मैंने खेती से छुटकारा पा लिया है। मैंने सारी जमीन बैंक के नाम करा कर कर्ज और कर्ज का ब्याज उतार दिया है। अब हम शहर जाकर और मजदूरी कर पेट भरेंगे। कम से कम वहां कर्ज से तो मुक्त रहेंगे।”

वह अपने परिवार के साथ बैंक से बाहर निकलता है तो सामने से आते अपने गांव वालों को वहां पाता है, जो किसी अनहोनी की आशंका से उसे ढूंढते फिर रहे थे। अब हीरा के चेहरे पर जिंदगी खिल रही थी। गांव वाले हतप्रभ थे, “कर्ज में डूबा आदमी इतना खुश !”

“मैं आज बहुत खुश हूँ,” हीरा अपने परिवार की ओर देख कर मुस्कुराता हुआ शेर की तरह दहाड़ता हुआ बोला, “यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा, दुनिया में आज कौन व्यक्ति सबसे सुखी है?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, जो कर्जदार न हो। तो जानते हो गांव वालो, आज मैं दुनिया का सबसे सुखी आदमी हूँ। हाँ, मैं कर्ज-मुक्त हो गया हूँ।”

(लेखक जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्व विद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं)

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