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किताबें मिलींः नए समय का कोरस

आज के नौनिहाल हर क्षेत्र में महारत हासिल कर रहे हैं, पर उनकी ओर सीना फुला कर देखने वाले नहीं देख पाते कि उनकी परेशानी क्या है, विशेष रूप से लड़कियां जिन्होंने अपने को साबित किया है।

Author July 22, 2018 3:03 AM
नए समय का कोरस : रजनी गुप्त; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी एस्टेट, नई दिल्ली; 360 रुपए।

नए समय का कोरस

‘अचानक आसमान ने हल्के नीले रंग के पूरी बांहों का परिधान पहन लिया, जिसके बीचोंबीच रंग की धारियों से तिलक लगा दिया हो जैसे किसी ने।’ ऐसे माहौल में जमा हैं आधुनिक बच्चे, जो जवानी की दहलीज से जब नीचे उतर रहे हैं। नेहा और उसके स्कूल, कॉलेज, पहले जॉब के साथी इसी वातावरण में इकट्ठे हैं। अपने ऊंचे और वाइट कॉलर जॉब से असंतुष्ट, अपने सभी फिक्र को धुएं में उड़ा देने का जज्बा है जिनमें। ऐसे आधुनिक जीवन की कहानी को बखूबी अपनी समांतर भाषा में उकेरा है रजनी गुप्त ने। उपन्यास में उपस्थित खुले मिजाज और बड़ी-बड़ी कारपोरेट संसार में विचरण करने वाली खुदमुख्तार स्त्रियीं अंदर से कितनी खोखली हैं, इसका जिक्र किए बिना नहीं रहती लेखिका।

आज के नौनिहाल हर क्षेत्र में महारत हासिल कर रहे हैं, पर उनकी ओर सीना फुला कर देखने वाले नहीं देख पाते कि उनकी परेशानी क्या है, विशेष रूप से लड़कियां जिन्होंने अपने को साबित किया है। अब पहले वाली पीढ़ी की तरह कोई नहीं कह सकता कि वे कमतर हैं और न कोई यह कह सकता है कि लड़की होने के कारण उनकी पदोन्नति हो जाती है, पर यह बात परिवार बनाने पर भारी है। नव्या की मुश्किलें देख कर नेहा विवाह के बारे में सोचती तक नहीं। वह उससे स्वीकार करती है- ‘तभी तो मेरी शादी करने की हिम्मत नहीं होती। कितना मुश्किल है मल्टी टास्किंग होना।’ खुद अपने लिए समय नहीं। टारगेट पूरा करने में समय हाथ से फिसलता जाता है। नए समय का कोरस है ये, जो संकेत देता है भयावह विखंडन का। आकांक्षाओं के आकाश को छूने वाले थके पंछियों का। रजनी गुप्त ने उनकी डोर तो अपने हाथों में रखी है, पर आकाश की निस्सीमता बेहद लुभावनी है।

नए समय का कोरस : रजनी गुप्त; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी एस्टेट, नई दिल्ली; 360 रुपए।

कुछ अल्प विराम

हमारा जीवन घटनाओं से भरा है। प्राय: बड़ी घटनाएं तो हम सबको याद रहती हैं और उनका उल्लेख भी बार-बार हमारी चर्चा में होता है। लेकिन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे कई प्रसंग आते हैं, जो हमें बहुत छोटी मगर बड़ी महत्त्वपूर्ण बात बता जाते हैं। कई बार अपने जीवन की आपाधापी में हम ऐसे छोटे प्रसंगों को नजरअंदाज कर जाते हैं या कुछ देर बाद भूल जाते हैं। इन प्रसंगों में छिपा संदेश या झिड़की हमें महसूस नहीं होती, क्योंकि हमारा ध्यान बड़ी घटनाओं की ओर रहता है। ऐसे ही कुछ प्रसंगों का संकलन है इस संग्रह में। ये सारे प्रसंग अनायास ही घटित हुए हैं। कभी लेखक के जीवन में, तो कभी किसी दूसरे के जीवन में। दूसरे के जीवन में घटित प्रसंग को सुन कर भी उनमें से अगर कुछ मिला तो लेखक ने उसे चुनने की कोशिश की है।
‘कुछ अल्प विराम’ को साहित्य की किसी एक विधा के खांचे में डाल कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह विधाओं की परिधि को तोड़ कर जिंदगी की सच्चाई से सीधा संवाद जोड़ती है। इसमें जीवन के उन सभी छोटे-बड़े प्रसंगों को इकट्ठा करने की कोशिश की की गई है, जो गुदगुदाते हैं, हंसाते हैं, रुलाते हैं, कभी हल्की-सी चपत लगाते हैं और कभी चिकोटी काट लेते हैं। जरूरी नहीं कि जिंदगी का हर सबक, हर समय किसी भारी-भरकम शास्त्रीय किताब से ही सीखा जाए। जिंदगी के छोटे से प्रसंग भी कई बार बड़ा सबक सिखा जाते हैं। ऐसे ही प्रसंग इस किताब में संकलित हैं।

कुछ अल्प विराम : सच्चिदानंद जोशी; प्रभात पेपरबैक्स, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली;150 रुपए।

अवध का किसान विद्रोह

भारत को किसानों का देश कहा जाता है, बावजूद इसके न तो किसान कभी इस धारणा को अपने आत्मविश्वास में अनूदित कर सके, न देश के मध्यवर्ग और कर्णधारों ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया। यह देश जो लगातार आगे बढ़ता रहा है, इसका किसान या तो खुद पीछे छूटता चला गया या आगे बढ़ने के लिए उसने किसान की अपनी पहचान को पीछे छोड़ा है। यह हमारे राष्ट्रीय जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में एक है।

यह पुस्तक भारतीय किसान-जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पर केंद्रित है। 1920-22 के दौरान अवध के लगभग सभी जिलों में स्वत:स्फूर्त ढंग से फूट पड़ा किसान-विद्रोह उस आक्रोश की अभिव्यक्ति था, जो किसानों के मन में अपनी लगातार उपेक्षा से पनप रहा था। इस घटना ने एक ओर तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नीतियों की सीवन उधेड़ कर उसकी वास्तविकता को उजागर किया तो दूसरी ओर राष्ट्रवादी सोच और उसके नेतृत्व के वर्ग-आधार को स्पष्ट करते हुए वर्ग और जाति की विकृतियों को भी उजागर किया। इस आंदोलन ने शायद पहली बार राष्ट्रवाद की सुपुष्ट मिट्टी से गढ़े जाने वाले देश की वर्गीय प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। आश्चर्य नहीं कि राष्ट्र-निर्माण की आक्रामक पहलकदमियों में आज भी न सिर्फ किसान बल्कि वे सब लोग बाहर रह जाते हैं, जिनके पास अपनी बात कहने की भाषा और सामाजिक साहस नहीं है। किसान की अवस्थिति, क्योंकि शहर के हाशिए से भी काफी दूर है, इसलिए वह केंद्रीय सत्ताओं पर अपना दबाव और भी कम डाल पाता है। उनके किसी भी आंदोलन के क्रांतिकारी तेवर को दबाने और अभिजात तबकों को लाभ पहुंचाने की नीति तब भी आम थी, आज भी आम है।

अवध का किसान विद्रोह : सुभाष चंद्र कुशवाहा; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 299 रुपए।

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