new hindi book launch review in hindi - किताबें मिलींः 'देस बिदेस दरवेश', 'पंचकोण', 'बात से बात' और 'कद आवैला खरूंट' - Jansatta
ताज़ा खबर
 

किताबें मिलींः ‘देस बिदेस दरवेश’, ‘पंचकोण’, ‘बात से बात’ और ‘कद आवैला खरूंट’

यह तो सच्चाई है कि ज्ञान और अनुभव के लिए देशाटन बहुत आवश्यक है। हमारे पुराने देश और समाज में तीर्थाटन की परंपरा रही, पर उसमें अनुभव, ज्ञान से अधिक पुण्यसंचय का भाव जुड़ गया।

Author August 5, 2018 4:08 AM
पंचकोण

देस बिदेस दरवेश

यह तो सच्चाई है कि ज्ञान और अनुभव के लिए देशाटन बहुत आवश्यक है। हमारे पुराने देश और समाज में तीर्थाटन की परंपरा रही, पर उसमें अनुभव, ज्ञान से अधिक पुण्यसंचय का भाव जुड़ गया। दरवेश की ‘अमरनाथ यात्रा’ वे ‘गंगासागर जात्रा’ आस्था की उत्सुक यात्रा है… अनुभव के मार्ग का बोधरोहण है, जिसमें अल्पज्ञता के स्वीकार का संकोच नहीं होता। यहां अंधविश्वासों की परंपरा का अनुसंधान नहीं, लोक की आस्था का आचमन है। आज के पर्यटन में जानकारी अधिक महत्त्वपूर्ण मानी जाती है और सौंदर्य सुविधा से तथा सुविधा बाजारू दुकानदारी से जोड़ की जाती है। यहां मिलना भेंटना, जानना समझना सीधे धन की मात्रा से जा जुड़ता है। इस तरह देशाटन या तो दरवेश की झोली में समाता नहीं या झोली ही फाड़ देता है।

देशाटन द्विविध कहा गया है- शुकमार्गी और पिपीलिका-पथ। पहले में धरती के ऊपर उड़ते हुए नीचे विहंगम दृष्टि डालते जाइए तथा दूसरे में कदम-कदम बढ़ते, ठहरते आसपास सूंघ, टोह कर आगे बढ़ना होता है, पर संयोग कहें या भाग्य कि कभी-कभी चींटी पंखों पर भी चढ़ जाती है। ‘बिदेस यात्रा’ शायद इसी की बानगी है। यों दीन दुनिया से थोड़ा-थोड़ा निरपेक्ष दरवेश भी इसी बाग-बगीचे का एक तिनका या पत्ता है अत: जानना उसे भी होगा कि इतिहास का काला पक्षी जीवन की मुंडेर पर आकर बोलने लगा है। उसकी कुटिल दृष्टि कब दरवेश के कंधे और झोली पर जा ठहरे, क्या पता! यों ये यात्राएं असाधारण नहीं हैं, साधारण जीवन से जुड़ी होना ही इनकी विवेशता है।

देस बिदेस दरवेश : महेश कटारे, भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी एस्टेट, नई दिल्ली; 200 रुपए।

पंचकोण

सिम्मी हर्षिता के अब तक लिखे गए उपन्यास मध्यवर्ग के थे। उन्होंने कहानियां जरूर सभी वर्गों पर लिखीं, पर उपन्यास निम्न वर्ग से वंचित रहा। प्रस्तुत उपन्यास ‘पंचकोण’ निम्न वर्ग के कथ्य पर केंद्रित है, जो गांव से शहर आए लोगों की मानसिकता और संघर्ष और उनकी समस्याओं को उजागर करता है। उपन्यास की मुख्य पात्र रानी, उसका पति जानी और उसका पिता है। ससरू गांव और शहर दोनों जगह पितृसत्ता का प्रतीक है और वह हर घटना का सूत्रधार है। और भी बहुत से पात्र हैं, जिससे उपन्यास में एक टकराव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।

ख्यातिलब्ध कथाकार और संपादक शानी अक्सर कहते थे- हिंदी के रचनाकार मुसलिम पात्रों को प्राय: अनदेखा करते हैं। इस उपन्यास में तो चेन्नई के निकट के गांव के मुसलिम पात्र हैं। वे दिल्ली में आकर रोजी-रोटी के संघर्ष में जूझते हैं। उनके जीवन में एक नई तरह की उथल-पुथल जन्म लेती है। अत: गांव और दिल्ली जैसे महानगर का टकराव भी पाठक के सामने आता है। कहना न होगा कि सिम्मी हर्षिता का चीजों को देखने का नजरिया अपने समकालीन कथाकारों से अलग और विशिष्ट है- ये सब चाहे बस-यात्रा करती लड़कियों को दुश्चिंता हो या प्रेमी-प्रेमिकाओं के अंतर्संबंधों का वर्णन। अधिक क्या? ‘पंचकोण’ का कथा-रस पाठक को अंत तक बांधे रखता है- एक विचलन से भरता हुआ।

पंचकोण : सिम्मी हर्षिता, ग्रंथ अकादमी, 1659 पुराना दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए।

बात से बात

बात से बात’ में शामिल बातों का सिरा सन 1990 से शुरू होकर 2015 तक की बातों को समेटे है। यह समय बीसवीं सदी का अंत और इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ का है। दो सदियों के इस संक्रमण काल में समाज और साहित्य दोनों में बहुत कुछ बदला है। इन बदलावों की अनुगूंज ‘बात से बात’ में भी सुनाई पड़ेगी। इसीलिए यह किताब इस दौर के साहित्य को समझने का एक अवसर हो सकती है। इसके पन्नों को पलटते हुए कभी आप कवि-मन के भीतरी आवर्त को छू लेने के अहसास से रोमांचित हो सकते हैं। इन पन्नों में आपको एक खालिस इंसान मिलेगा, जो गांव-जवार के साधारण लोगों की बातों में खो-सा जाता है। आंखों में उनके लिए कुछ विशेष न कर पाने का मलाल लिए अरसे पहले हुई उन बातों को याद करता है- ‘मैं गांव के बारे में सोचता हूं… तो सबसे ज्यादा लगता है कि जो मेरे निकट के लोग थे उनके दुख को इतने करीब से देखा है, वे निर्धन लोग, मजदूर, किसान किस्म के लोग बगल में हैं, उनके लिए क्या किया। अब मैं सोचता हूं कि वे उस समय तो और अभाव में थे, तो मैंने क्यों नहीं जानने की कोशिश की कि उनके क्या दुख हैं? लोगों के दुख जितना गहराई में, नजदीक जाकर देखना चाहिए थे, वह मैंने क्यों नहीं किया?’ कभी एक ऐसे कवि से भी आपकी भेंट हो सकती है, जिसे हिंदी कविता के साथ-साथ पूरे भारतीय साहित्य और विभिन्न कलाओं पर बतियाना हमेशा अच्छा लगता है।…ऐसी बहुत-सी बातें इस किताब में आपको मिलेंगी।

बात से बात- केदारनाथ सिंह के साथ : संकलन-संपादन: संध्या सिंह, श्याम सुशील; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज. नई दिल्ली; 400 रुपए।

कद आवैला खरूंट

यह कवि राजेंद्र जोशी का राजस्थानी में रचा कविता संग्रह है। इसमें ‘हेत’, ‘रेत’ और ‘चेत’ खंडों के अंतर्गत अट्ठावन कविताएं संकलित हैं। पुस्तक के शीर्षक से ही पता चल जाता है कि वर्तमान परिवेश स्वच्छ नहीं है। यहां जगह-जगह असुरक्षा, अनाचार, अत्याचार, अन्याय और विडंबनाओं का बोलबाला है, जो आम पाठक को सोचने और संकल्प लेने को प्रेरित करता है। सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से देखें तो अन्नदाताओं की अंतर्वेदना (‘तिरसा किरसा’), पशुओं के पलायन की मजबूरी (‘इंदर री उडीक’) और लोभ-लालच में काल-कवलित होते इंसान की विवशता का बिंब (‘काळ रा काळा हाथ’) जैसी कविताओं में देखे जा सकते हैं। यहां हर कहीं मर्मांतक पीड़ा से रूबरू हुआ जा सकता है, कहीं सुख-चैन नजर नहीं आता। लोकतंत्र के नाम पर जैसी लूट-खसोट और लोक की अनदेखी का आलम इस युग में है, वैसा पहले कहां था? आज हर किसी की जुबान पर ताला है। संग्रह की अंतिम कविता ‘कूंची राज कनै’ में इस यथार्थ को बहुत मार्मिक रूप से प्रकट किया गया है।

कद आवैला खरूंट : राजेंद्र जोशी; ऋचा (इंडिया) पब्लिशर्स, बिस्सा रो चौक, बीकानेर; 200 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App