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किताबें मिलीं: ‘साहस और डर के बीच’, ‘समय के तलघर में शब्द’, ‘बांझ सपूती’ और ‘नागार्जुन दिल्ली में’

नरेंद्र मोहन की डायरी- साहस और डर के बीच- ऐसे ही अनुभव-क्षणों का कोलाज है- सच की टेक पर बिना डरे कला-संरचनाओं, साहित्य, समाज और राजनीति के बीहड़ में प्रवेश करती, तथ्यों और घटनाओं के साक्ष्य के साथ समाज और राज्य पर एक साफ, निष्कपट और निडर आवाज की प्रस्तुति।

Author October 14, 2018 3:21 AM
बांझ सपूती पुस्तक का कवर पृष्ठ

साहस और डर के बीच

नरेंद्र मोहन के लिए सृजन एक तरह की सुलगती खामोशी है, जो किन्हीं खास क्षणों में सिर चढ़ कर बोलती है। एक पीड़ा, एक पैशन, एक थ्रिल, जिसे आप रोक नहीं पाते, जिसके बिना न जी पाते हैं, न मर पाते हैं। यह वह अंदरूनी जगह है, जहां आप एक साथ जीते-मरते हैं। अलग-अलग माध्यमों और उनकी विशिष्टताओं के बावजूद सर्जनात्मकता का स्पंदन और एक सपने को बचाने की कोशिश सभी कलाओं में साझा है। साहित्य की किसी भी विधा में लिखते हुए नरेंद्र मोहन इस सपने और स्पंदन से, अभिव्यक्ति की छटपटाहट से गुजरते हैं, उस वक्त कहीं ज्यादा जब वे दूसरी कलाओं- चित्र, छवि-चित्र, नृत्य और संगीत के अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं।

नरेंद्र मोहन की डायरी- साहस और डर के बीच- ऐसे ही अनुभव-क्षणों का कोलाज है- सच की टेक पर बिना डरे कला-संरचनाओं, साहित्य, समाज और राजनीति के बीहड़ में प्रवेश करती, तथ्यों और घटनाओं के साक्ष्य के साथ समाज और राज्य पर एक साफ, निष्कपट और निडर आवाज की प्रस्तुति। वैचारिक-भावनात्मक बेचैनियां, ज्ञान, संवेदना, साहित्य और कला माध्यमों की धमकें, हलचलें और सभा-संगोष्ठियां यहां महज दर्ज नहीं हुई हैं, दस्तावेज बन गई हैं। काल के अंतरालों में बिंधे आत्म-कथन और आत्म-स्वीकृतियां के दायरे यहां इतनी तेजी से व्यापकता धारण करते हैं कि आश्चर्य होता है। जहां तक व्यक्ति के लंबे आत्म-संघर्ष के बहुपक्षीय निरूपण का प्रश्न है, वह इस डायरी का हिस्सा है- सृजन का नेपथ्य!

और हां, नरेंद्र मोहन और निंदर का द्वंद्व डायरी में बड़ा दिलचस्प है। अपना होते हुए भी ‘दूसरा’ वह बीच-बीच में मुंह उठाए चला आया है- कई स्वरों-सरोकारों से भरपूर डायरी का केंद्रीय मेटॉफर! वे कहते हैं : ‘दिल्ली में रहना कोई दिल्लगी नहीं है, यारो। आखिर देश की राजधानी है… रही होगी कभी यह रेशमी नगरी, आज इसकी आन, बान और शान के क्या कहने। बड़ी-बड़ी सभा-संगोष्ठियां और लोकार्पण यहां होते रहते हैं। किताबों की सबसे बड़ी मंडी। एक के बाद एक हजारों किताबें आती हैं और एक अदृश्य कुंए में गिरती जाती हैं। जलते-जलते प्रशंसा करते, हंसते-हंसते छुरा घोंपते हुए लेखकों की यहां हजारों किस्में हैं और चुप्पी की साजिश के कहने ही क्या। उन अदाकारों की बात न ही उठाइए, जो इस कला से काटते हैं कि खून का एक कतरा न गिरे और आप लुढ़कते नजर आए।

मेरे लिए लिखना एक नशा न होता तो मैं उससे और वह मुझसे इस तरह चिपका न रहता। हां, देर से ही सही, उसे संभालने की कला सीखने लगा हूं। उम्र जरूर आड़े आ रही है पर मनोबल टूटा नहीं है और मैं उत्साह में उसे लांघ जाने पर तुल जाता हूं, जानते हुए भी कि यह निंदर की शरारत है। जब शरीर साथ नहीं देता तो मैं निंदर को खरी-खोटी सुनाने लगता हूं।’

साहस और डर के बीच : नरेंद्र मोहन; संभावना प्रकाशन, रेवती कुंज, हापुड़; 450 रुपए।

समय के तलघर में शब्द

सुधीर विद्यार्थी की यह पुस्तक ‘समय के तलघर में शब्द’ हिंदी रचनाकारों की जिस जिंदगी का खाका खींचती है वहां ‘भेड़िये’ और ‘तांबे की कीड़े’ जैसे समर्थ रचनाकार की शिनाख्त के साथ-साथ शमशेर बहादुर सिंह के गद्य, कविता, चित्र और चितेरे की तरह भाषा को गढ़ने के उनके हुनर तथा किसी तरह की दलीय प्रतिबद्धता के सवालों की भी सही पड़ताल करती प्रतीत होती है। दूसरी ओर सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के कविकर्म से नहीं, बल्कि उनके उस पक्ष से यह पुस्तक सीधे साक्षात्कार कराती है, जिसमें भारतीय क्रांतिकारी दल से उनके जुड़ाव का मुखर समावेश है, जो खासकर उनकी जेल से लिखी कहानियों और कमोबेस कविता में भी झलकता-झांकता है। जहां एक ओर विष्णु प्रभाकर का गांधीवाद अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता दिखाई देता है तो उसके बरक्स रामरख सिंह सहगल का क्रांतिकारी संपादकत्व उन हदों तक जा पहुंचता है, जिसमें वे सीधे-सीधे उस क्रांति के अगुआ बने दिखाई पड़ते हैं जिन्हें दल ने उन दिनों निर्भीकता से लक्षित किया था।

यह पुस्तक सही अर्थों में रचनाकारों के विभिन्न जीवन-स्वप्नों के बेहद चित्रात्मक ढंग से व्याख्यायित करने के साथ आखिर साहित्य के उस पूरे फलक से भी हमारा सुपरिचय कराती है, जिसमें अपने समय और समाज के साथ कोई कलम थामने वाला मुठभेड़ करता और रचता है। कलाकार कभी निरपेक्ष नहीं होता, बल्कि उसकी पक्षधरता ही उसे युगांतकारी और कालजयी होने की भूमिका में ला खड़ा करती है, यह बताना इस पुस्तक का मंतव्य भी है।

समय के तलघर में शब्द : सुधार विद्यार्थी; नई किताब प्रकाशन, 1/11829, ग्राउंड फ्लोर, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 350 रुपए।

बांझ सपूती

चर्चित रचनाकार वीरेंद्र के उपन्यास ‘बांझ सपूती’ को पढ़ते हुए लगता है कि रोज-रोज की असंगतियों, संघर्षों, विमर्शों का यह जरूरी रोजनामचा है। मानवीय सोच के व्यापक धरातल पर उपजी पीड़ा का अंकन करती हुई कथा सफल और सार्थक होने को प्रमाणित करती है। शास्त्रों, लोक-कथाओं, लोक-विश्वासों, धर्म-ग्रंथों और परंपराओं के भीतर से यात्रा करते हुए समकालीन विमर्श के भीतर से जिंदगी का एक ऐसा ताना-बाना तैयार किया गया है कि पाठक पृष्ठ-दर-पृष्ठ समृद्ध होता हुआ कथा की यात्रा में समा जाता है। यह उपन्यास की विशेषता है कि यहां घटनाओं के नियोजन से किसी सरलीकृत निष्कर्ष तक पहुंचने का उपक्रम नहीं है, बल्कि सहजता से घटती घटनाएं लेखक के विमर्श सूत्रों की प्रयोगशाला के रूप में वर्णित हैं।

स्त्री-पुरुष में रोज के बिगड़ते-बनते समीकरण, शोषित जीवन की असंगतियों, गांव के परिवर्तित मान-मूल्य और शहर के तनाव भरे उलझते जीवन के बीच एक मजबूत प्रेम भी है। स्त्री के दैहिक संबंध बनते ही वर्जनाएं जहां टूटती हैं, वहीं देहभाषा की अनूठी पहचान भी यहां दृष्टिगत है। जहां पर्यावरण की चिंता से उपन्यास श्रेष्ठ तो बनता ही है, वहीं कबीर के अंदाज वाला दलित विमर्श भी चौंकाने वाला है। विमर्शों के बीच आंचलिकता की छौंक बड़ी मजेदार है। उत्तेजक बहसों के साथ-साथ रसमय जीवन का प्रगाढ़ राग भी है और प्रेम में योग जैसी एकाग्रता भी, और यह सब सारंग जी के अनुभव को रेखांकित करते हैं। उपन्यास का यह महत्वपूर्ण संकेत है कि सृष्टि धीरे-धीरे क्षय हो रही है, मनुष्य ही बचा सकता है- पृथ्वी, हवा, पानी, चूल्हे की आग और दांपत्य रस भी।

बांझ सपूती : वीरेंद्र सारंग; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

नागार्जुन दिल्ली में

बाबा अर्थात नागार्जुन का दिल्ली आना-जाना कई बार होता रहा। जहां भी वे दिल्ली में जाते, उनका एक नया घर ही बन जाता। साहित्य रसिक और शोधार्थी जाहिदुल दीवान भी बाबा के दीवाने बन गए। आश्चर्य की बात यह है कि नागार्जुन से उनकी कभी भेंट न हो पाने के बावजूद वे उनकी कविता से इस कदर प्रभावित हुए कि बाबा नागार्जुन पूरी तरह उनके दिल में ही बस गए। जाहिदुल दीवान का दिल्ली आना हुआ, तो एक-एक करके उन लोगों से मिलने लगे, जिनसे नागर्जुन की भेंट दिल्ली में हुई थी। इनमें युवा रचनाकार और पत्रकार तो थे ही, साथ ही वरिष्ठ लेखक, आलोचक और प्राध्यापक भी शामिल थे। इन सबमें आम बात यह थी कि नागार्जुन को सभी ने करीब से देखा और समझा था।

अशोक वाजपेयी हों या मुरली बाबू और रेखा अवस्थी, अनवर जमाल हों या हरिपाल त्यागी, श्रीकांत मिश्र, अब्दुल बिस्मिल्लाह हों या विष्णुचंद्र शर्मा और विश्वनाथ त्रिपाठी, असगर वजाहत, महेश दर्पण, इब्बार रब्बी हों या मैनेजर पांडेय, पंकज सिंह, कर्णसिंह चौहान, हर किसी के पास अपने-अपने नागार्जुन हैं। ऐसे ही बाईस नागार्जुन प्रेमियों की स्मृतियों को संपादक जाहिदुल दीवान ने अपनी इस अनूठी पुस्तक में संजोया है।

नागार्जुन दिल्ली में : संपा.- जाहिदुल दीवान; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए।

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