मां, क्या तू मेरे लिए रोती है? आठ साल का चैत्या अपनी मां से बार-बार यह सवाल इसलिए पूछता है क्योंकि उसके दोस्त ने बताया है कि असली मां अपने बच्चे के लिए रोती है। मराठी फिल्म ‘नाल’ का आठ साल का नायक चैत्या बहुत छोटे-छोटे सवाल उठाता है। बच्चे के यही सहज सवाल ‘नाल’ को बेहतरीन भावनात्मक फिल्मों में से एक बनाते हैं।

नागराज मंजुले की इस फिल्म का निर्देशन सुधाकर रेड्डी यक्कंती ने किया है। आठ साल का चैतन्य, जिसे चैत्या के नाम से पुकारा जाता है, एक गांव में अपने मां-बाप और दादी के साथ रहता है। शरारती और संवेदनशील चैत्या को एक दिन पता चलता है कि जिसे वह अपनी मां मानता है, उसने उसे जन्म ही नहीं दिया है।

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इस एक तथ्य के सामने आने के बाद चैत्या के बाल-मन में द्वंद्व शुरू हो जाता है। वह अपनी मां पर शक करने लगता है कि क्या वह उसे सच में प्यार करती है। अपने आठ साल के जीवन अनुभव में वह एक ही सत्य को जानता है कि मां वही होती है, जो बच्चे को जन्म देती है।

अब मासूम चैत्या एक नन्हा मनोवैज्ञानिक बन जाता है। वह अपनी मां के प्यार को परखने लगता है। मां के असली प्यार की खोज में वह तरह-तरह की बचकानी हरकतें करता है। एक बार वह घर से भागने की भी कोशिश करता है। इस फिल्म की खासियत यह है कि निर्देशक ने बाल-मन को बच्चे जैसा ही रखा है। उसके सवालों पर वयस्कता का बोझ नहीं डाला है। इसलिए फिल्म भावनात्मक रूप से बहुत सहज तरीके से आगे बढ़ती है। बिना किसी उत्तेजना और तनाव के चैत्या को अपने सवालों के जवाब मिलने लगते हैं।

निर्देशक ने फिल्म का नाम ‘नालगर्भनाल के संदर्भ में रखा है, जिससे मां और बच्चे का कुदरती रिश्ता जुड़ता है। धीरे-धीरे चैत्या को यह बात समझ में आ जाती है कि कोई मां बच्चे को तब भी प्यार कर सकती है, जबकि उसने उसे जन्म न दिया हो। यानी मां बनने के लिए बच्चे को जन्म देना जरूरी नहीं है।

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फिल्म गांव की पृष्ठभूमि में चलती है। गांव भी फिल्म के एक किरदार की तरह महसूस होता है। 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘नाल’ को सर्वश्रेष्ठ प्रथम फिल्म का पुरस्कार मिला था। चैतन्य के रूप में श्रीनिवास पोकले ने कमाल का अभिनय किया है। मां सुमी का किरदार देविका दफ्तरदार ने निभाया है, जबकि पिता बप्पा की भूमिका स्वयं नागराज मंजुले ने निभाई है।

‘नाल’ 2018 में प्रदर्शित हुई थी। चैत्या की भावनात्मक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 2023 में ‘नाल-2’ भी प्रदर्शित हुई। फिल्म के दूसरे भाग में चैत्या अपनी जन्म देने वाली मां पार्वती और पिता अजीनाथ से मिलने उनके गांव जाता है। वहां वह अपने सगे भाई-बहनों से भी मिलता है। उसका छोटा भाई मानसिक चुनौतियों से जूझ रहा है, इसलिए वह दुनिया को अपनी मासूम नजर से देखता है। छोटी बहन चिमी शुरू में चैत्या को भाई के रूप में स्वीकारने से कतराती है। चैत्या अब परिवार की परिभाषा में उलझता है।