आठ साल का विशाल तीसरी कक्षा का विद्यार्थी है। विद्यालय से लौटकर खाना खाने बैठा तो उसके हाथ से रोटी का एक टुकड़ा जमीन पर गिर गया। अभी विशाल का खाना समाप्त भी नहीं हुआ था कि जमीन पर गिरे हुए रोटी के टुकड़े को चींटियों ने घेर लिया। विशाल बड़े गौर से चींटियों को देखने लगा। सब चींटियां बड़े ही अनुशासित तरीके से एक लाइन में चल रही थीं।
‘मम्मी! इनको देखो। इसी तरह हम भी अपने स्कूल में चलते हैं। जब हमें प्रार्थना में जाना होता है। क्या चींटियां भी कहीं जा रही हैं?’ उसने उत्सुकता से पूछा। ‘हां! चींटियां बहुत ही अनुशासित होती हैं। इन्होंने अपना भोजन तलाश कर लिया है और अब वे इसे अपने बिल में ले जा रही हैं।’ मम्मी ने उसे समझाया। तभी विशाल को शरारत सूझी और उसने फूंक मारकर चींटियों को इधर-उधर कर दिया। उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि कुछ ही देर में चींटियां वापस भोजन तक पहुंच गईं और उसे लेकर लाइन बनाकर चलने लगीं। उसे बहुत मजा आया। यह उसके लिए खेल बन गया। वह बार-बार ऐसा करने लगा।
कुछ देर बाद उसने देखा कि वे चींटियां उस रोटी के टुकड़े को घसीट कर बहुत दूर तक ले गई थीं। यह रोटी का टुकड़ा चींटियों के आकार से बहुत बड़ा था और इस समय ये चींटियां उल्टी दिशा में चल रही थीं। ‘मम्मी! जरा देखो तो। यह रोटी का टुकड़ा कितना बड़ा है, और इन चींटियों ने इसे कितनी आसानी से उठा रखा है। लेकिन ये उल्टी क्यों चल रही हैं।’ विशाल ने आश्चर्य से पूछा।
‘हां विशाल! चींटियां बहुत मेहनती होती हैं। जब इन्हें भोजन में छोटा टुकड़ा मिलता है तो ये उसे आसानी से अपने जबड़े में दबा लेती हैं। लेकिन टुकड़ा बड़ा हो तो बहुत सी चींटियां उसे मिलकर उठाती हैं और उसे घसीटने के लिए इन्हें विपरीत दिशा में चलना पड़ता है।’ मम्मी ने फिर समझाया।
‘लेकिन उल्टा चलने पर इन्हें दिखाई कैसे देता है? क्या ये अपने घर का रास्ता नहीं भूलतीं?’ विशाल आज चींटियों के बारे में जानकारी पाकर बहुत हैरान हो रहा था। उसके लिए यह किसी रोचक कहानी जैसी थी।
‘चींटियों के शरीर से एक विशेष प्रकार का रसायन निकलता है जिसे फीरोमोन कहते हैं। जब चींटियां भोजन की तलाश में निकलती हैं तो रास्ते में इसे छोड़ती हुई जाती हैं और वापसी में उसी की गंध के सहारे अपने घर तक आती हैं।’ मम्मी ने बताया तो विशाल की आंखें हैरानी से फैल गईं।
‘कितना ही अच्छा होता यदि ऐसा ही कोई रसायन हमारे म्याऊं के शरीर से भी निकलता। फिर वह भी नहीं खोता। वापस घर लौट आता। है न मम्मी!’ विशाल अपने खोये हुए बिल्ली के बच्चे को याद करते हुए उदास हो गया।
‘ऐसा नहीं है बेटा! तुम्हारा म्याऊं और अन्य जानवर भी घर से दूर जाते समय अपने शरीर से एक तीव्र गंध छोड़ते हैं जो उन्हें वापस लौटने में मदद करती है। इसी प्रकार पक्षी भी तो अपने दिशा ज्ञान के आधार पर ही वापस अपने घोंसले में लौटते हैं। याद है न! किस तरह पक्षी हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद भी अपना मूल स्थान नहीं भूलते। हो सकता है कि तुम्हारे म्याऊं को उसके साथी मिल गए हों और वह उनके साथ चला गया हो।
आखिर सभी अपने साथियों के साथ ही रहना पसंद करते हैं न? इसलिए उदास नहीं होते। जरा सोचो! प्रकृति ने सभी प्राणियों को कितनी अलग-अलग विशेषताएं दी हैं। तुम्हारे म्याऊं को भी तो पेड़ पर चढ़ने की विशेषता दी है न। याद है, कितनी फुर्ती से वो नीम के पेड़ पर चढ़ जाता था।’ मम्मी ने विशाल को म्याऊं की अच्छी बातें याद दिलाते हुए कहा। हालांकि उन्हें भी बिल्ले की उतनी ही याद आती थी जितनी विशाल को।
‘हां मम्मी! मुुझे याद आ रहा है कितना फुर्तीला था वो’ विशाल मुस्कुरा दिया।
‘हां! तो अब मुस्कुराओ और मेरी पहेली को पूरा करो। चींटी मेहनती…म्याऊं फुर्तीला…और टामी?’ मम्मी ने बात बीच में छोड़ दी.
‘टामी चौकन्ना…।’ विशाल ने बात पूरी की और ताली बजाकर हंसने लगा। अचानक उसका ध्यान बाहर पोर्च की तरफ गया। उसे वह दिखा जिसकी उम्मीद छोड़ चुका था।
‘मम्मी! देखो, अपना म्याऊं।’ कहते हुए विशाल दरवाजा खोलकर बाहर की ओर लपका। उसके दरवाजा खोलने की ही देर थी कि म्याऊं फुर्ती से घर के भीतर घुस आया। अब वह अपना पेट उघाड़कर फर्श पर लोट रहा था। ‘यह वापस कैसे आया?’ विशाल ने म्याऊं का पेट सहलाते हुए मम्मी से पूछा।
‘मैंने कहीं पढ़ा था कि बिल्लियां यदि रास्ता भटक जाएं तो उनके ‘लिटर’ यानी शौच की गंध रास्ता पहचानने में उनकी सहायता करती है। यही सोचकर मैंने म्याऊं का ‘लिटर बाक्स’ बाहर खुले में रख दिया। यह सोचकर कि यदि वह वापस आना चाहे तो उसे रास्ता मिल सकता है। देखो, मेरी युक्ति काम कर गई। हमारा म्याऊं अब हमारे साथ है’। मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा तो विशाल मम्मी से लिपट गया। म्याऊंभी उनके पांवों से लिपटकर अपनी खुशी जाहिर कर रहा था। अब म्याऊं को भूख भी तो लगी थी।
तुम्हारा म्याऊं और अन्य जानवर भी घर से दूर जाते समय अपने शरीर से एक तीव्र गंध छोड़ते हैं जो उन्हें वापस लौटने में मदद करती है। इसी प्रकार पक्षी भी तो अपने दिशा ज्ञान के आधार पर ही वापस अपने घोंसले में लौटते हैं। याद है न! किस तरह पक्षी हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद भी अपना मूल स्थान नहीं भूलते।
