मलयालम साहित्य के साथ सिनेमा भी बहुत समृद्ध रहा है। मलयालम फिल्में बाल कलाकारों को लेकर काफी संवेदनशील रही हैं। बाल किरदारों को लेकर कई ऐसी फिल्में बनी हैं जिन्होंने सिनेमा प्रेमियों और कला समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है। ऐसी ही फिल्म है ‘एंडे वीडु अप्पुविन्तेयुम’। हिंदी में इसका अर्थ होता है-मेरा घर अप्पू का भी।
2003 में प्रदर्शित 143 मिनट की इस फिल्म के निर्देशक सिबी मलयिल हैं। सिबी अपनी फिल्मों में भावनात्मक कहानी का ताना-बाना बुनते हैं। मलयालम में इस फिल्म के लोकप्रिय हो जाने के बाद तमिल भाषा में ‘कन्नाडि पूकल’ नाम से इसका पुनर्निमाण किया गया।
फिल्म की कहानी विश्वनाथन, उनकी पत्नी मीरा और दंपति के बेटे वासुदेव पर केंद्रित है। वासुदेव की भूमिका कलिदास जयराम ने निभाई है। मीरा वासुदेव की सौतेली मां है, लेकिन दोनों के बीच मां-बेटे का सहज व प्यारा संबंध है। वासुदेव को इस बात का अहसास नहीं होता है कि मीरा उसकी सगी मां नहीं है। मीरा एक बेटे को जन्म देती है। भाई पाकर वासु बहुत खुश होता है, और वह उसका नाम अप्पू रखता है। वह अप्पू को बहुत प्यार करता है।
अब विश्वनाथन और मीरा का सारा ध्यान नवजात की तरफ चला जाता है, और वासु खुद को अकेला महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि अप्पू के कारण उसके मां-बाप उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। तभी अप्पू का जन्मदिन आने वाला होता है। वासु अपने छोटे भाई के जन्मदिन को लेकर बहुत रोमांचित होता है। वह अपने बचाए पैसों से अप्पू को जन्मदिन पर देने के लिए तोहफा भी खरीद लेता है।
अप्पू के जन्मदिन के समारोह में मेहमानों के महंगे तोहफों को देख कर वासु निराश हो जाता है। निराशा में वह अपना लाया तोहफा छुपा देता है। इसके बाद से वह यह बात और गहराई से महसूस करने लगता है कि अप्पू के कारण अब उसे अपने मां-बाप का प्यार नहीं मिल रहा है। यह निराशा उसके व्यवहार में दिखने लगती है। एक दिन परेशान होकर विश्वानाथन वासु को थप्पड़ मार देते हैं। वासु को लगता है कि यह सब अप्पू की वजह से हो रहा है। ऐसे ही भावनात्मक उथल-पुथल में वासु के हाथों दुर्घटनावश अप्पू की मौत हो जाती है। वासु को बाल-सुधार गृह भेज दिया जाता है।
रिहाई के बाद वासु जब घर लौटता है तो मीरा एक और बच्चे को जन्म दे चुकी होती है। वासु इस बच्चे का नाम भी अप्पू रखता है। वह अपना छुपाया हुआ तोहफा बच्चे को लाकर देता है। वासु का लौटना, मां-बाप के साथ फिर से रिश्ता बनना, इन सब चीजों को निर्देशक ने ऐसे दिखाया है कि यह फिल्म बाल-मनोविज्ञान के संदर्भ में भी एक मिसाल बन जाती है। वासुदेव के रूप में कलिदास जयराम ने यादगार अभिनय किया है। इसमें अभिनय के लिए कलिदास को सर्वश्रेष्ठ बाल किरदार का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
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