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भूले बिसरे साज

किसी भी सभ्यता और संस्कृति के लिए उसकी सांस्कृतिक गतिविधियां जरूरी हैं और इसके लिए आवश्यक है संगीत। संगीत या तो कंठ पर निर्भर है या वाद्य पर। सुर कंठ से निकलते हैं, तो ताल के लिए साजों की जरूरत होती है।

Author June 17, 2018 6:17 AM
लोक गायन के अनुरूप लोगों ने अलग-अलग वाद्य यंत्रों का निर्माण किया। इस तरह अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरह के वाद्य बने। पर छीजती लोक संस्कृति का नतीजा यह हुआ है कि अब बहुत सारे लोकवाद्य या तो गायब हो चुके हैं या लुप्त होने की कगार पर हैं।

लोक गायन के अनुरूप लोगों ने अलग-अलग वाद्य यंत्रों का निर्माण किया। इस तरह अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरह के वाद्य बने। पर छीजती लोक संस्कृति का नतीजा यह हुआ है कि अब बहुत सारे लोकवाद्य या तो गायब हो चुके हैं या लुप्त होने की कगार पर हैं। उन्हें न तो अब कोई बजाने वाला बचा है और न कोई सीखने वाला। इसकी बड़ी वजह है पाश्चात्य वाद्यों, खासकर बिजली से चलने वाले कंप्यूटरीकृत वाद्यों का चलन बढ़ना। इस तरह के एक ही वाद्य से कई वाद्यों की आवाज निकाली जा सकती है। लोकवाद्यों की परंपरा और उनके खत्म होते जाने की वजहों पर नजर डाल रहे हैं रघुवीर सिंह।

इसराज अब ‘दिलरुबा’ नहीं रहा, सुरबहार के सुर, बहार नहीं लाते और ‘अपनी ढपली, अपना राग’ नहीं सुनाती। बीन का लहरा यदा-कदा सपेरों के जरिए सुनाई देता है, तो ढोलक की थाप गांवों में भी मद्धम पड़ने लगी है और पहाड़ के हुड़के की ताल भी खामोश होने लगी है। कभी दरबारी संगीत की शान रहे ‘मयूरी’ को तो याद भी नहीं होगा कि उसके तारों की झंकार पर मन-मयूर कब नाचा था! असम के एजुक तपंग और उत्तराखंड के जौंया मुरुली, बिणाई और नागफनी की सुरीली तान अब सुनाई नहीं देती। मणिपुर के ‘पेना’ के साथ इकतारा का एकमात्र तार भी टूट कर कहीं बिखर गया, तो तमिल संगीत की जान ‘याज’ इतिहास के पन्नों में कैद हो चुका है। जीवन के हर मोड़ पर अपनी सार्थकता सिद्ध करती आई लोक संस्कृति में ताल से ताल मिलाने और सुरीली तान छेड़ने वाले लगभग सभी भारतीय लोकवाद्यों की बोलती बंद होती जा रही है, मगर युवा साजिंदों के रूप में उनका हमसफर बनने को तैयार नहीं हैं।

किसी भी सभ्यता और संस्कृति के लिए उसकी सांस्कृतिक गतिविधियां जरूरी हैं और इसके लिए आवश्यक है संगीत। संगीत या तो कंठ पर निर्भर है या वाद्य पर। सुर कंठ से निकलते हैं, तो ताल के लिए साजों की जरूरत होती है। साज के बिना संगीत और नृत्य दोनों अपूर्ण हैं। भारतीय संगीत की शैली को दक्षिण से उत्तर और कर्नाटक संगीत से हिंदुस्तानी शास्त्रीय रूप में विभाजित किया गया। हमारे संगीत के पुरखों ने इन्हीं शैलियों के आधार पर वाद्य यंत्र विकसित किए। यही साज आज गुमनामी के अंधेरे में खोते जा रहे हैं। गुजरे बीस सालों में धमसा, केंद्री, मादर बजाने वालों की संख्या न के बराबर रह गई है। जो पुराने लोग इन साजों के वादक हैं भी, वे जीवन-संध्या में कदम रख चुके हैं। कटहल की लकड़ी से बनी ढोलक, गम्हार से बनी नाल, सेमल से बने चरचरी और गुलाची से बने केंद्री लोकवाद्य लकड़ी की कमी के कारण भी विलुप्ति के कगार पर पहुंचे हैं। बांसुरी की तरह केंद्री की आवाज इतनी सुरीली होती थी कि जानवर घनघोर जंगल में भी निडर होकर चरते थे।

उत्तर प्रदेश में पिछली सदी तक कमर में बांधे बड़े-बड़े ढोल, सारंगी और चिमरा आदि वाद्य यत्रों की मधुर धुन पर लोग घेरा बना कर नाचते हुए होली के गीत गाते थे। ढोलक बजाने वाली महिलाओं की पूछ बढ़ जाती थी, मगर अब होली के लोकगीत और विशेष तौर पर बजाए जाने वाले साज हाईटेक होली के सामने लुप्त हो चुके हैं। बुंदेली श्रमजीवी समाज में जातीय गीत-संगीत तथा वाद्यों की अलग पहचान और उनके प्रयोग की विशेषता है। ये साज बाजार में न तो बनते हैं और न ही बिकते हैं। तंबूरा, मंजीरा, खंजरी, खड़ताल, किकीहरी, ढोलक, सूपा, घड़ा और लोटा जैसे वाद्य अब बुंदेलखंड में हाशिए पर पहुंच गए हैं।

हिमाचल के वाद्य यंत्र तो वहां की लोक धड़कन हैं। ग्राम्यड़, रूबाव तथा जुमड़, लाहुल और किन्नौर जनजातीय संगीत के तार-वाद्य हैं, तो चंबा जिले की चुराह घाटियों में लोकगायक खंजरी तथा घुरई से सुर, ताल और गीत की रसमयी फुहार बिखेरते हैं। मंडी और शिमला में लोकवादक सूरजमणि और प्रीतमदास पीपणी इतनी दक्षता से बजाते हैं कि किसी भी सुर को साध लें। दूसरी ओर रणसिंघा की अपनी शान है। प्राचीन समय में रणसिंघा युद्ध क्षेत्र में संकेत के लिए बजाया जाता था। करनाल को बजाने की भी विशेष कला है। दोनों ही साज आह्लादकारी स्वर में जुगलबंदी करते हैं।

देव-मंदिरों और देव-यात्राओं में काहल बजाया जाता है। कांसे की झांझों को टकराने से निकलने वाली झंकार वातावरण को सुरमयी बनाती है, तो मंजीरे और खड़ताल के बिना पारंपरिक वाद्य यंत्रों की सूची अधूरी है। लकड़ियों से बजाए जाने वाले नगाड़े के साथ ताल और लय के लिए ढोल का स्वर जरूरी है। पारंपरिक वेश-भूषा में जोगी दो तारे पर बड़ी मस्ती से गाते हैं। पुराने समय में देव-पूजा के समय बेल और पाची, पुत्र-जन्म पर बटवाल, स्वागत के लिए शबद, युद्ध के समय लिंबर, मनोरंजन के लिए रासा साका, मृत्यु पर बेखा बाजा और आत्मा की शांति और स्वर्ग-प्राप्ति के लिए भरत पर ताल बजाया जाता था। अब ढोल, नगाड़ा, ताशा, तुरही, रणसिंघा, पीपणी, डौंरू, दुक्कड़, दंतारा और खंजरी जैसे पारंपरिक साज संरक्षण की बाट जोह रहे हैं।

उत्तराखंड में अलगोजा यानी जौंया मुरुली, बिणाई, नागफनी, इकतारा, भौंकर जैसे लोकवाद्य गुमनामी के बीहड़ में भटक रहे हैं, तो ढोल, दमाऊ, हुड़के, रणसिंघा, नगाड़ा, मशकबीन प्रचलन से बाहर हो चले हैं। जौंया मुरुली हिंदी के जुड़वा का कुमाऊंनी रूप है। इस लोकवाद्य में दो सामान्य मुरलियां एक साथ जुड़ी होती हैं। वादन के दौरान इसमें एक स्वर लगातार बजता रहता है और दूसरी ओर लोकधुन भी बजती जाती है। इसमें रंगीली, बैरागी, उदासी और जंगल- चार प्रकार की धुनें ही बजाई जाती थीं। इसी तरह वेदना की धुन देने वाली बिणाई कभी विरह की पीड़ा को बहलाने का साधन थी। इस छोटे-से लोकवाद्य के दोनों सिरों को दांतों के बीच में दबा कर महिलाएं इसे बजाती थीं। दोनों सिरों के बीच लोहे की एक पतली और लचीली पत्ती को उंगली से हिलाने पर कंपन पैदा होता, जिससे वादक की सांस टकराने पर एक सुरीले स्वर की उत्पत्ति होती और विरही संगीत, वादक और श्रोता के बीच अनूठा गठबंधन बना देता था। सांप के आकार के लोकवाद्य नागफनी की मीठी तान भी अब दिल में नहीं उतरती। जागर में देवी-देवताओं का आह्वान करने और विवाह आदि मांगलिक कार्यों में ऊर्जा के रंग भरने वाला ढोल भी अब उतना मस्त नहीं रहा और बाईस तालों की गूंज से लोक संगीत का दर्शन कराने वाला हुड़का भी अपनी बदकिस्मती पर खामोश है।

राजस्थान के रेगिस्तान में खंजरी और मंजीरे की छनछन और खड़ताल की खनखन नहीं होती। मोरचंग की मधुर धुन रेतीले प्रदेश में कहीं गुम हो गई। कमायचा, चंग, भपंग जैसे साज अपने साजिंदों की राह देख रहे हैं। छत्तीसगढ़ की इस्पात नगरी भिलाई में ढीमर जनजाति के पारंपरिक वाद्य यंत्र मरकी का इस्तेमाल कुछ दशक पहले तक मनोरंजन के साथ नदी-घाटियों में होने वाली फसलों को जानवरों से बचाने के लिए होता था। वजह, मरकी में मटकी को काट कर उस पर चमड़ा मढ़ा जाता था। फिर उसमें छेद कर मोर पंख को इस तरह लगाया जाता था कि मोर पंख खींचते ही हू-ब-हू शेर की दहाड़ सुनाई पड़ती थी। बस्तर का रोंजो और सरगुजा का आदिवासी लोकवाद्य झुमका भी जानवरों का शिकार कराते थे। डांहक साल में सिर्फ एक बार नवरात्र में भक्ति रस घोलता था। राज्य के इन लोकवाद्यों के अलावा ढोंक, चरहे, ढुंगरु, भन्नाटी बांसुरी, अलगोजा, फिरकी, बायर बाजा, चटकोला, कुहुकी भी अब इतिहास का हिस्सा हो गए हैं। कभी अविभाजित भारत के उत्तरी हिस्से में लोकप्रिय रहे लोकवाद्य बुलबुल तरंग में भी अब तरंगें नहीं उठतीं। पंजाब के लोकवाद्य सरांडा को महज तेरह वर्ष की उम्र में गुरु अर्जुन देव ने बनाया था। उन्होंने ‘धुर की बानी’ गाते हुए इसका इस्तेमाल किया। तारों के इस साज से निकलने वाली अद्वितीय और आत्मिक-सुखदायक ध्वनि भी अब सुनाई नहीं देती।

शास्त्रीय रूप ने बचाए कुछ साज

जिन लोकवाद्यों को शास्त्रीयता की छत मिली, वे गुम होने से बच गए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई को शादी समारोहों से निकाल कर गुणियों की महफिलों में जगह दिलाई, तो सारंगी को साबरी खान ने वही सम्मान दिलाया और कृष्ण की बांसुरी की तान को हरिप्रसाद चौरसिया ने आगे बढ़ाया। रुद्रवीणा भी गुमनामी के कोने में जा खड़ी हुई होती, अगर मोहिउद्दीन डागर और अब उनके बेटे बहाउद्दीन डागर ने उसे अपने हाथों में न लिया होता। इसराज या दिलरुबा को बचाने की कोशिश दिल्ली के अलाउद्दीन खान ने की, लेकिन उनके साथ ही इस साज का जीवन भी खत्म हो गया। अठारहवीं शताब्दी में ध्रुपद शैली के लिए बना सुरबहार अभी तक अन्नपूर्णा देवी के हाथों में महफूज है, लेकिन उनके बाद इस साज का भविष्य क्या होगा, कहना मुश्किल है। इसी तरह छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बयान करते अनेक लोकवाद्य शहरी जीवन से दूर गांवों में आज भी बजाए जा रहे हैं। कोंडागांव के चरहे और भन्नाटी बांसुरी, राजनांदगांव की कुहुकी और चिकारा, बालोद के रूंजू और बांस बाजा, कांकेर की मांदरी, कवर्धा के चटकोला, लासपुर के धुंधरू और नारायणपुर के झंडी डंडा फिलहाल तो अपनी धुन में हैं, लेकिन उनकी सांसें कब तक चलेंगी, कुछ पता नहीं।

कहां जा रहे ‘बजंतरी’?

नाटी हो या लोक संगीत, देवनृत्य हो या लोकनृत्य, शादी हो या मेला, सभी जगह वादक यानी बजंतरी या बाजगी तो चाहिए ही। शहनाई बजाने वाला ‘सनाईतड़’ या ‘हेसी’ भी चाहिए, करनाल बजाने वाला ‘करनालची’ भी और ढोल बजाने वाला ‘ढोली’ भी। वाद्य यंत्र भी तो तभी बचेंगे, जब उन्हें बजाने वाले होंगे। यहां यह बताना जरूरी है कि लोकवाद्य वे हैं, जिन्हें वादक कलाकार परंपरागत रूप से बजाते हैं। शादी, नामकरण, देवताओं की पूजा, जागर, जात्रा, बैसी आदि में ही इनकी कला का प्रदर्शन होता है। विवाह समारोह आदि में डीजे संस्कृति के हावी होने से जब इनकी रोजी-रोटी का संकट गहराया, तो इन्होंने पारंपरिक वाद्यों को बजाना छोड़ दिया। जौंया मुरुली को बजाने वाले अब कुछ ही कलाकार रह गए हैं, तो महिलाएं बिणाई को भूलती जा रही हैं। प्रोत्साहन न मिलने से ढोल और हुड़का वादकों का भी यही हाल है। मांग घटने पर लोहारों ने भी बिणाई जैसे साजों को बनाना छोड़ दिया। हालांकि कुछ जानकार बुजुर्गों का कहना है कि पारंपरिक वाद्य देव कार्यों तक सीमित रह गए हैं और आज का युवा देव कार्यों में रुचि नहीं लेता, इसलिए लोकवाद्यों का यह हाल तो होना ही था।

इलेक्ट्रिक वाद्य यंत्रों का असर

गांवों में तान छेड़ने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्रों के विलुप्त होने की वजह आधुनिक यंत्रों का आना भी है। आदिवासी गांवों में सुरीली तान की जगह अब अंग्रेजी गाने गूंजते हैं। पहले सामूहिक रूप से चौपाल या अखाड़ा में बैठ कर लोग गीत गाते थे, लेकिन अब स्टूडियो में गाना रिकॉर्ड होकर बाजार से गांवों में पहुंचता है। सीडी और मोबाइल संस्कृति ने श्रम आधारित संस्कृति को खत्म कर दिया है। पहाड़ी नाटियों में लोकगायक पारंपरिक वाद्यों को ताक पर रख कर ऑक्टोपैड, की-पैड, कांगो को अहमियत दे रहे हैं, तो युवा गिटार, की-बोर्ड और ड्रम की तरफ ज्यादा मुखातिब हो रहे हैं। बॉलीवुड में तो बड़े-बड़े ऑर्केस्ट्रा समूहों की जगह कंप्यूटर, की-बोर्ड और सिंथेसाइजर जैसी मशीनों ने ले ली है।

किसी जमाने में धुन को कंपोज करने के लिए जरूरी हारमोनियम की जगह की-बोर्ड ने ले ली है। इसी की-बोर्ड पर संतूर, सारंगी, पंजाबी ढोल तथा पखावज जैसे खालिस भारतीय वाद्य यंत्रों और कांगो की धुनें भी निकाली जा सकती हैं। मैंडोलिन की धुन को की-बोर्ड की कुछ ‘की-कांबिनेशन’ की मदद से बजाया जा सकता है। भारी-भरकम पियानो के विकल्प के तौर पर छोटे इलेक्ट्रॉनिक पियानो, तानपूरे की जगह रेडियोनुमा इलेक्ट्रॉनिक तानपूरे और सितार की जगह छोटे-से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ‘वीएसटी’ ने ले ली है। इसी ‘वीएसटी’ सॉफ्टवेयर के जरिए डिजिटल फ्लूट का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जो बांसुरी का काम करती है। तबले का विकल्प तबला या ताल मशीन आ गई है, जिसमें सारे ताल मौजूद हैं।

उम्मीद की ये किरणें भी

लोकवाद्यों के रिद्म से श्रोताओं को दीवाना बनाने वाली लोक संस्कृति को बचाने के लिए पहल भी की जा रही है। राजस्थान के जोधपुर में लोकवाद्य संग्रहालय पारंपरिक वाद्यों की सबसे बड़ी छत है, तो छत्तीसगढ़ में भिलाई के रिखी क्षत्रिय ने इन साजों का सबसे बड़ा व्यक्तिगत संग्रह किया है। आज उनके संग्रह में 137 ऐसे पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र हैं, जिनमें से आधे गुमनामी के भंवर में फंस कर रसातल में जा चुके हैं। इन लोकवाद्यों को संग्रहीत करने के लिए रिखी ने बहुत पापड़ बेले। डमरू की तरह दिखने वाले डांहक को पाने में तो उन्हें बरसों लग गए। पारधी जनजाति में देवतुल्य माने जाने वाले डांहक की तस्वीर तक उतारने की इजाजत पारधियों से उन्हें साल भर बाद मिली।

फिर इसके कुछ साल बाद वह डांहक को लाने में सफल हुए। छत्तीसगढ़ के ग्राम मरोदा में भी लोकवाद्य संग्रहालय है और हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में बाबा बालकरूपी मंदिर में लोकवाद्य संग्रह और समूह। देवभूमि कुल्लू के दो युवा भाई कर्मचंद और पवन सोनी प्राचीन वाद्य यंत्रों को बना कर आजीविका चलाते हुए इनके संरक्षण की मुहिम चला रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र, झांसी ने बुंदेलखंड में लोक विधाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया है। उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग ने भी ऐसी ही पहल करते हुए संस्कृति कर्मियों को ढोल, नगाड़े, मशकबीन, रणसिंघे आदि मुफ्त प्रदान किए हैं और गुरु और संगत कलाकारों को छह माह तक मानदेय देने की योजना शुरू की है। राजस्थान के जैसलमेर में लोक संगीत को बचा कर रखने वाली जातियों- लंगा और मांगणियार का गुणसार लोक संगीत संस्थान बच्चों की कार्यशालाएं आयोजित कर रहा है। पोटका प्रखंड के पर्यावरण चेतना केंद्र, बड़ा सिगदी ने भी ऐसी ही पहल करते हुए नई पीढ़ी को पारंपरिक लोकवाद्यों की तालीम दिलानी शुरू की है।

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