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संगीत समीक्षा : सम का सबरंग सब रस

समारोह की परिकल्पना थी कि नारी के उद्यम, उसके सुख-दुख, आंसू और मुस्कान, हर्ष और विषाद को आमंत्रित कलाकार अपनी प्रस्तुतियों में रेखांकित करें।

Author नई दिल्ली | April 10, 2016 11:45 PM
कार्यक्रम की एक प्रस्तुति।

सोसाइटी फॉर एक्शन थ्रू म्यूज़िक सम- उन कलाकारों को मंच प्रदान देने का प्रयत्न करती है जिनमें प्रतिभा तो है पर पहुंच नहीं। प्राय: सम के आयोजनों का रुझान शास्त्रीय संगीत की ओर ही रहता है लेकिन इस बार अपने उन सदस्यों की मांग पर, जो इससे अलग तरह के संगीत में रुचि रखते हैं, उसने सात और आठ अप्रैल को सब रंग सब रस नाम से एक उत्सव आयोजित किया। लोक कला मंच के सहयोग से उन्हीं के सभागार में आयोजित यह दो रोजा जलसा नारी शक्ति की थीम पर केंद्रित था। इसलिए आमंत्रित कलाकार भी नारियां ही थीं। समारोह की परिकल्पना थी कि नारी के उद्यम, उसके सुख-दुख, आंसू और मुस्कान, हर्ष और विषाद को आमंत्रित कलाकार अपनी प्रस्तुतियों में रेखांकित करें।

उद्घाटन संध्या का शुभारभ रीति के अनुसार वंदना माथुर के गाए भजनों से हुआ। लेकिन इसके बाद की प्रस्तुतियों में मनोभावों की विविधता थी। मसलन मालविका भट्टाचार्य ने दीप्ति मिश्र की कही दो ग़ज़लों को खुद गाया। पहली का मतला था-ज़िंदगी ऐसी भी होगी कभी सोचा न था। और दूसरी के बोल थे- हद से गुजरी बात, तो जाने कहां तक जाएगी। डा स्वप्निल वर्मा ने वियोग शृंगार की चैती और संयोग के उल्लास भरी होरी गाई।

इसके बाद अजयिता मुखोपाध्याय ने दो भजन गए, पर उनके बाद श्रद्धा गुप्ता ने ठुमरी मिश्र खमाज देखे बिना नहीं चैन और तिलक कामोद में -होरी सकल ब्रिज धूम मची गाई। जायका बदलने के लिए अनुराधा बनर्जी ने भजन गाए, तो संगीता लाहिड़ी ने दादरा -छोड़ो डगरिया कन्हाई और लागी बयरिया मैं सोय गई ननदी में अलग अलग जज़्बातों की बानगी दिखाई।

अंतिम संध्या की शुरुआत दामोदर लाल घोष की शिष्या देवश्री चक्रवर्ती ने सरस्वती वंदना से की। देवश्री की आवाज़ सधी हुई और सुर में थी राग सरस्वती और आड़ा चौताल में सूझ बूझ से बांधी अपने गुरु की मनोरम संगीत रचना तालध्लय के अवग्रहों तक का ध्यान रखते हुए उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से गाया। इसके बाद दो भजन-मेरे तो गिरधर गोपाल और तुम बिन हमरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरधारी गाना, उनके लिए आसान था। हारमोनियम पर दामोदर लाल घोष और तबले पर सचिन शर्मा ने अच्छी संगत की।

हापुड़ से आई जया शर्मा ने इसके बाद अपनी चार शिष्याओं सुप्रिया, नेहा, प्रिया और सुरभि को पेश किया। चारों में मिल कर एक भजन, कीर्तन और एक होरी की ज़ोरदार सामूहिक प्रस्तुति दी। बीच-बीच में आलाप और सरगम का काम उनकी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि का गवाह था, लेकिन पूरी तरह सुर में रहने की ओर उन्हें ध्यान देना चाहिए। जिसके लिए ज़ाहिर है रियाज़ ज़रूरी है। संगत के लिए हारमोनियम पर स्वयं जया और तबले पर जयदीप नियोगी थे।

सुमित्रा गुहा की शिष्या रूपा मुखोपाध्याय ने राग पीलू में ठुमरी कौन गली गयो श्याम और एक पारंपरिक भजन ब्रज बोली में गाया। रूपा की प्रस्तुतियां भी बता रही थीं कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा है। लय उनकी संतोषजनक है पर सुर की ओर उन्हें भी ध्यान देना होगा। डा मौमिता बैनर्जी ने इसके बाद ग्वालियर घराने की एक रागमाला और राग देस में एक चतुरंग गाया। समारोह का समापन रक्षा सिंह डेविड और उनकी शिष्याओं के कथक से हुआ।
प्राय: सभी कलाकारों का हारमोनिम पर साथ दिया दामोदर लाल घोष ने और तबले पर दीपक कुमार, प्रभाकर पांडे और उदय शंकर मिश्र थे। अगर संगत भी महिला कलाकार ही करतीं तो नारी शक्ति की संपूर्णता और सामर्थ्य बढ़ जाती।

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