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संगीत : जहीरुद्दीन डागर की स्मृति में संगीत संध्या

संगीत संध्या की शुरुआत डा. आकाशदीप के सरोद वादन से हुई थी। आकाश ने अपने घराने के खास राग पहाड़ी झिंझोटी में आलाप-जोड़-झाले सहित विलंबित और द्रुत बंदिशें पेश कीं।
Author नई दिल्ली | May 13, 2016 01:04 am
दिवंगत उस्ताद जहीरुद्दीन डागर।

डागर बंधु स्मृति न्यास और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने मिलकर उस्ताद जहीरुद्दीन डागर की स्मृति में एक संगीत संध्या सेंटर सभागार में आयोजित की। पिछले पचीस सालों से डागर बंधु न्यास ने हर विधा और घराने के उभरते हुए कलाकारों से ले कर स्थापित कलाकारों के कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित किए हैं। अपने घराने की परिधि से बाहर निकल कर इस बार भी इस न्यास ने मैहर घराने के युवा कलाकार डा. आकाश दीप को न केवल सरोद वादन के लिए आमंत्रित किया बल्कि इस अवसर पर उनकी लिखी पुस्तक ‘द एकजूबरेंस ऑफ इंडियन म्यूजिक : सरोद एंड सरोदियाज ऑफ मैहर घरानाह्ण का विमोचन भी आयोजित किया।

दिवंगत उस्ताद जहीरुद्दीन डागर की स्मृति को युवा उस्ताद वासिफुद्दीन डागर के प्रभावशाली ध्रुपद गायन ने सजीव किया। यह उनके उस्ताद और चाचा उस्ताद जहीरुद्दीन डागर ही थे जिन्होंने डागर बंधुओं की जोड़ी में से उस्ताद फैयाजुद्दीन डागर के आकस्मिक निधन के बाद उनके सुपुत्र और अपने शिष्य वासिफ को अपने साथ गायन के लिए मजबूर किया था। अपने उस्ताद के साथ किशोर वासिफ का वह सहमा सा मंच प्रदर्शन आज भी उन लोगों के जेहन में ताजा है जिन्होंने उस दिन भरे मन से इस बिरवे के चीकने पात पहचान कर उसे आशीष दिया था। इस शाम भी अपने उस्ताद के लिए इस धीर गंभीर श्रद्धांजलि से वासिफ ने एक बार फिर उन्हें आश्वस्त किया।

अतिथि कलाकार के सरोद वादन और पुस्तक विमोचन के बाद उस्ताद वासिफुद्दीन डागर के लिए समय कम बचा था पर उन्होंने शुरू से ही सुरमयता का विरल वातावरण रच दिया। बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक यंत्र के, मात्र तानपुरों की जोड़ी के सुरीले निनादमय वर्तुल से फूटती उनकी आवाज से मानों सुरों की उजास बिखर गई। अपनी मुखतसर हाजिरी में भी जिस तरह ध्यानस्थ होकर राग देस की विधिवत आलाप के बाद चौताल में उन्होंने एक ध्रुपद ‘जय जय शारदा भवानी’, और देस में ही एक धमार ‘सांवरे रंग डार दियो’ गाकर भैरवी में द्रुत सूलताल के एक ध्रुपद से अपना गायन संपन्न किया। उसने श्रोताओं को गहरे प्रभावित किया। पखावज पर मोहन श्याम शर्मा ने भी उनकी बेहतरीन संगति की।

संगीत संध्या की शुरुआत डा. आकाशदीप के सरोद वादन से हुई थी। आकाश ने अपने घराने के खास राग पहाड़ी झिंझोटी में आलाप-जोड़-झाले सहित विलंबित और द्रुत बंदिशें पेश कीं। इसके बाद उस्ताद अली अकबर खां के रचे राग चंद्र-नंदन में औचारमयी आलाप के बाद तीनताल में गत बजाई। तबले पर उनकी नायाब संगत उस्ताद अकरम खां ने की। उनके सरोद में उस्ताद अली अकबर खां साहब वाला ठहराव और सुरीलापन दिखाई देता है, यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी कही जाएगी। उन्हें न केवल मैहर घराने की तालीम अच्छे गुरुओं से मिली है बल्कि उन्होंने इस घराने पर शोध भी किया है, जिसके फलस्वरूप उनकी पुस्तक शुभी प्रकाशन से छपी है।

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