‘चंदा है तू, मेरा सूरज है तू, ओ मेरी आंखों का तारा है तू’, गीत गाकर मां अपने बेटे को सुला रही थी। तभी मुन्नी कमरे में आती है। मां अंगुली के इशारे से उसे चुप रहने को कहती है। भैया को नींद आ रही है। उसे सो जाने दो। मुन्नी शांति से एक तरफ बैठकर मां को देखती है। मां का पीला और कृशकाय चेहरा देखकर मुन्नी को बहुत दुख होता है। मां बहुत अधिक परिश्रम करने से थक जाती, तब मुन्नी को उनके ऊपर बहुत दया आती। समय मिलने पर वह मां की मदद करती। लेकिन स्कूल और पढ़ाई के कारण मां की ज्यादा मदद नहीं कर पाती थी। सरपंचजी की चार बेटियां थीं। लेकिन बेटे की चाह में मुन्नी की मां एक-एक करके लगातार चार बेटियों को जन्म देती है, तब जाकर उसे एक बेटा होता है। लगातार शारीरिक शोषण व बीमारी से उसका शरीर कमजोर होता गया, फिर भी उसे लगातार ताने-उलहाने सुनने पड़ते कि वह लगातार बेटियों को ही जन्म दे रही है। उन्हें अपने परिवार के लिए वारिस चाहिए। बेटियां तो पराया धन हैं।
हालांकि सरपंचजी के घर में बेटे और बेटी में कोई भेदभाव नहीं दिखता था। दोनों का एक ही तरीके से पालन-पोषण होता है। लेकिन बेटे की कामना में सरपंचजी को यह नहीं दिखाई पड़ा कि उनकी पत्नी के शरीर पर क्या गुजर रही है, ऐसी स्थिति में वह लगातार शारीरिक और मानसिक पीड़ा को सहन करती हुई बच्चों को जन्म देती रहती है। ऊपर से मुन्नी की दादी भी बहू को दुख पहुंचाने में कोई कमी नहीं रखती मुन्नी की मां अपने सभी काम लगातार खुद करती है। मुन्नी का भाई अभी छोटा ही है। मां की गोद में ही रहता है। मुन्नी की मां को फिर से उल्टियां शुरू हो जाती हैं। वह अपने पति की इच्छापूर्ति की फिर से शिकार होती है। डाक्टर की सलाह से दवा खाकर उस अजन्मे शिशु की हत्या गर्भ में ही हो जाती है। मुन्नी की मां लगातार दर्द से तड़पती रहती है। वह मानसिक और शारीरिक रूप से इतना अधिक टूट जाती है कि उसे पुरुष के नाम से ही घृणा होने लगती है।
रिमझिम बारिश की एक दरमियानी रात। मुन्नी और सभी बहनें बेखबर सो रही थीं। तभी उस गहराती रात में सरपंचजी अपनी मित्र-मंडली के साथ बैठकर घर वापस आते हैं। उनकी चाल की लड़खड़ाहट खुद-ब-खुद सब कुछ बयां कर देती है। नशा उनके दिमाग पर गहराता जा रहा था। नशे में मुन्नी की मां की हालत को भूल कर उसे ढूंढ़ते हैं। उन्हें मुन्नी की मां की कमजोरी और मानसिक स्थिति का कोई भान नहीं है। मुन्नी की मां अपना कमरा बंद करके सो रही थी। जैसे ही वह अपने कमरे की ओर बढ़ते हैं, उन्हें दो लोग पकड़ कर दूसरे कमरे में बंद करके सुला देते हैं।
मुन्नी के मां के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए वे सो जाते हैं। सुबह होने पर घर के आंगन में सभी लोग इकट्ठा बैठते हैं। दादी बैठती है और पंडित जी को बुलाकर सलाह होती है कि पंडित जी अभी सरपंचजी की उम्र ही कितनी है। मुन्नी की मां तो अपने बच्चों व शारीरिक कमजोरी से ही जूूझती रहती है। उसके पास अपने पति को देने के लिए बिल्कुल समय नहीं है। वह अपना पत्नी धर्म भूल चुकी है। पंडित जी भी धृतराष्ट्र की भांति आंख बंद करके बैठे रहते हैं, और यह नहीं कह पाते कि सरपंचजी ही अपना पति धर्म भूल गए हैं।
सरपंचजी की मां ने कहा कि मैं इस घर की राजमाता की हैसियत से यह कहना चाहती हूं कि सरपंचजी की दूसरी शादी कर दी जाए ताकि उनकी जवानी भी खुशी-खुशी बीते। पंडितजी को भला क्या आपत्ति हो सकती है। लड़कियों की तलाश शुरू हो जाती है। किसी एक गरीब घर की पढ़ी-लिखी और खूबसूरत बेटी का रिश्ता, पांच बच्चों के पिता के साथ तय कर दिया जाता है, क्योंकि उनकी उम्र अभी ज्यादा नहीं है और वे बहुत विशाल संपत्ति के मालिक हैं। एक लड़की को और चाहिए भी क्या?
श्वेता जो एक गरीब पिता की संतान है, उसके पिता उसे भाग्य की दुहाई देकर उसकी शादी सरपंचजी के साथ करवा देते हैं। आज सरपंचजी का अपनी नई पत्नी के साथ प्रथम मिलन है। सजे-धजे सरपंचजी खुशी-खुशी पान का बीड़ा मुंह में दबाकर मस्त-मस्त चाल से अपनी नई पत्नी के कमरे की ओर बढ़ते हैं। थोड़ी दूरी पर महिलाएं गीत गा रही हैं। ढोलक की थाप और गीतों की गूंज के बीच एक कमरे में मुन्नी की मां बैठ कर अपनी दुनिया को लुटते हुए देख रही है। उसके आंसुओं से किसी को कोई सरोकार नहीं है।
मधुमिलन की रात हर लड़की के जीवन में प्रेम का आकर्षण लेकर आती है। हर लड़की अपने पति का इंतजार करती है। किंतु श्वेता तो बिस्तर पर बैठी हुई रणचंडी की तरह नेत्रों में घृणा और वितृष्णा का भाव लेकर पांच बच्चों के पिता के इंतजार मेंअपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही थी।
श्वेता को पता है कि इस क्रूर समाज में संरक्षण और सुरक्षित रहने के लिए अपने पिता की बात स्वीकार कर लेने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं था।उसके कानों में तो अपने पिता की वही आवाज गूंज रही थी। बेटा हम गरीब हैं, तुम शादी कर लो, नहीं तो अब तुम इस गांव में भी सुरक्षित नहीं हो।। श्वेता पढ़ी-लिखी और समझदार है। वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती थी।
श्वेता सरपंचजी की पत्नी बनने के साथ ही विद्रोहिणी भी बन जाती है। जैसे ही सरपंचजी उसके कमरे में कदम रखते हैं, वह अपने बिस्तर से उठ कर खड़ी हो जाती है, और उन्हें दूर रहने का इशारा करती है। वह सरपंचजी से कुछ प्रश्न दूर रहकर ही पूछना चाहती है। श्वेता के इस अनोखे रूप को देखकर सरपंचजी का वासना का नशा बहुत तेजी से दूर भाग जाता है।
श्वेता सरपंचजी से पूछती है, आप की कितनी बेटियां हैं? सरपंच जी प्यार से मुस्कुरा कर उत्तर देते हैं, तुम्हें तो पता ही है। श्वेता चीख कर कहती है, नहीं…ईईईईई, मुझे कुछ भी पता नहीं। तब सरपंच जी कहते हैं कि मेरी चार बेटियां हैं। आपकी बड़ी बेटी की उम्र 13 वर्ष, और मेरी उम्र 18 वर्ष। बस मुझे जो पूछना था, मैंने पूछ लिया। इतना कह कर वह अपने नेत्र नीचे कर लेती है और चुप हो जाती है।
श्वेता के चुप होते ही सरपंचजी उसे अपनी बाहों में लेते हैं। कुछ देर बाद आत्मा और शरीर के दर्द से तड़पती श्वेता को छोड़कर बाहर आ जाते हैं। सरपंचजी कमरे से बाहर आकर टहलने लगते हैं। उनकी आंखों में पहली शादी से लेकर दूसरी शादी तक के दृश्य घूमते हैं। अब ये दृश्य उन्हें परेशान कर रहे हैं। फिर वे मुस्कुरा कर खुद से ही पूछते हैं, मुन्नी की मां का दोषी कौन है? श्वेता का दोषी कौन है? जब कोई अपने दोष पर मुस्कुरा कर सोचे तो उसकी सोच में वही मर्दानगी झलकती है, जो मुन्नी की मां और श्वेता का दोषी है। दोषी खुद को संतुष्ट कर रहा है। अपनी जवानी और अपनी अमीरी के बारे में सोचते ही सरपंचजी खुद को दोषमुक्त पाते हैं। वे अब श्वेता के सवालों और शरीर को भूल चुके हैं। आवाज लगाते हैं, मुन्नी की मां…।
