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हिंदी सिनेमा से गुम होती खलनायिका

अब फिल्मों में खलनायिकाएं कम ही देखने को मिलती हैं जबकि पहले उनके बिना फिल्में अधूरी सी लगती थीं।

Author April 14, 2017 2:56 AM
हिंदी सिनेमा से गुम होती खलनायिका

चांद खां रहमानी
अब फिल्मों में खलनायिकाएं कम ही देखने को मिलती हैं जबकि पहले उनके बिना फिल्में अधूरी सी लगती थीं। अगर हम खलनायकों को फिल्म का अहम पात्र मानते हैं तो खलनायिकाओं की अहमियत भी किसी भी कीमत पर कम नहीं आंकी जा सकती है। पहले खलनायक सेठ, साहूकार, जमींदार, ठेकेदार, सूदखोर लाला या लंपट बनिया हुआ करता था जो नायक-नायिका और जनता का केवल शोषण करते थे। आज खलनायक का रूप बदला है। अब उसकी शक्ल तस्कर, देशद्रोही, बदमाश, गुंडा या भ्रष्ट नेता की बन चुकी है। खलनायिका का रूप भी ऐसा ही हुआ करता था। खलनायिकाओं के रूप में थोड़ी आधुनिकता महसूस की जा सकती है।

नादिरा को एक नर्तकी के रूप में भी जाना जाता है, लेकिन वे खलनायिका के रूप में ही ज्यादा जानी गर्इं। महबूब खान की फिल्म ‘आन’ में वे दिलीप कुमार की नायिका थीं। यह उनकी सबसे सफल फिल्म मानी जाती है। ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ उनकी खलनायिकी के रूप में बेहतर फिल्म है। बाल कलाकार के रूप में करियर शुरू करने वालीं बिंदु मशहूर रंगकर्मी फरदून ईरानी की बेटी हैं। 1940 में फिल्म ‘मिट्टी और सोना’ में वे खलनायिका बनकर आर्इं।

वे 1969 में फिल्म ‘दो रास्ते’ में पहली बार खलनायिका बनीं। फिर ‘नतीजा’ में विनोद खन्ना के साथ खलनायिका बनीं। फिल्मकार सावन कुमार ने इसी नाम से फिल्म ही बना डाली जिसमें अनु अग्रवाल खलनायिका बनती हैं जो जयाप्रदा को बर्बाद करने पर तुली रहती हैं। पहले नारी प्रधान फिल्में बनती थीं जिनमें खलनायिकाओं के लिए अलग पटकथा होती थी। लेकिन धीरे-धीरे पटकथा लिखने का चलन खत्म सा हो गया।

सबसे सशक्त खलनायिका 

हिंदी फिल्मों की सबसे सशक्त खलनायिका ललिता पवार को माना जाता है। उन्होंने कुटिल सास, अशिष्ट पड़ोसन, गद्दार व लालची रिश्तेदार, ईष्यार्लु सौतेली मां जैसे नफरत भरी निगाहों से देखे जाने वाले किरदारों को इतनी जीवंतता से पर्दे पर पेश किया कि फिल्मी इतिहास उन्हें शायद ही भुला पाए। यही कारण है कि पर्दे पर उनके आते ही दर्शकों के चेहरे घृणा भाव से भर जाते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने पात्र को कितनी जीवंतता से जीया। याद कीजिए, ओपी रल्हन की फिल्म ‘फूल और पत्थर’ की वह क्रूर सास (ललिता पवार) जिसने अपनी बहू शांति (मीना कुमारी) पर जुल्म की इंतेहा कर दी थी। शांति मरणासन्न स्थिति में होती है और वह उसे पहली मंजिल के एक कमरे में अकेली छोड़ जाती है जहां उसे कोई पानी देने वाला तक नहीं होता है। ऐसी में शांति को देखकर उस चोर का भी दिल तड़प उठता है जो उस घर में चोरी करने आता है। वह चोरी का इरादा छोड़कर शांति को बचाकर ले जाता है। यह तो ललिता पवार के फिल्मी चरित्र की क्रूरता का एक उदाहरण भर है। 1950 में वी शांताराम की फिल्म ‘दहेज’ में वे पहली बार खलनायिका बनी थीं। इस फिल्म में वे जयश्री की कुटिल सास बनी थीं।

अच्छी नर्तकी भी थीं

शशिकला भी अपने समय की मशहूर खलनायिका रहीं। वे नर्तकी भी थीं और उन्होंने नायिका की भूमिकाएं भी कीं। ‘फूल और पत्थर’ में वे नर्तकी और खलनायिका थीं। शशिकला का काम नायक को फंसाकर अपने बॉस का काम कराना या फिर नायक को अपने हुस्नजाल में फंसाकर नायिका के जीवन में जहर घोलना होता था। वे गैंग की खास सदस्य के रूप में काम करतीं थी।

गैंग की खास सदस्य

हेलन ने जहां नृत्य में अपना नाम कमाया वहीं वे खलनायिका भी किसी से कम नहीं रहीं। वे क्रूर सास, सौतेली मां या भाभी को परेशान करने वाली ननद नहीं बनीं बल्कि गैंग की सदस्य ज्यादा रहीं। उनका काम नायक-नायिका से गैंग के लिए काम कराना या नायक को अपने जाल में फंसाना होता था। अपने बॉस को खुश रखना । बर्मा से आई इस अभिनेत्री ने ‘चंगेज खान’, ‘एक फूल चार कांटे’, ‘अमीर गरीब’, ‘संन्यासी’, ‘द ग्रेट गैंबलर’, ‘डॉन’ और ‘दोस्ताना’ जैसी अनेक फिल्मों में यादगार रोल किए।

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