सर, उसे ऐसे मत काटिए। आंखों में आंसू लिए चित्रा ने अपने एक शिक्षक से कहा। शिक्षक ने चित्रा की आंखों में घूरते हुए उसे शव के नजदीक बुलाया और उसे सर्जिकल चाकू पकड़ाते हुए कहा, ‘अब तुम इसे यहां से काटो’। चित्रा के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। फिर भी उसे ऐसा लग रहा था, मानो शव में से आवाज आ रही, ‘काट दे, मैं कह रहा हूं ना कुछ नहीं होगा मुझे, अरे मुझमें से तो खून भी नहीं निकलेगा। तू तो काट दे!’ तब भी चित्रा कांपते हाथों में चाकू लिए खड़ी-खड़ी उस शव को ही देखती रही।
शिक्षक ने कहा भी, ‘चित्रा काटो इसे, यहां से, इससे सिर्फ इसकी त्वचा की ऊपरी सतह ही कटेगी।’ चित्रा को जैसे कुछ भी सुनाई देना बंद हो चुका था। उसके कानों में तो जैसे केवल मुर्दे के शब्द ही गूंज रहे थे, ‘काट दे कुछ नहीं होगा…’, तभी शिक्षक ने फिर एक बार जोर से चिल्लाते हुए कहा, ‘चित्रा…! तुम्हें सुनाई दे रहा है कि नहीं, मैं कुछ बोल रहा हूं तुमसे…? तुम्हें किसी की हत्या नहीं करनी है बल्कि आपरेशन करना है, इसलिए इस चाकू को पेन की तरह पकड़ो’।
शिक्षक की ऊंची आवाज से चित्रा वर्तमान में वापस आई। वो बिना कुछ बोले रोते हुए कमरे से बाहर भाग गई। अगले कई दिनों तक उसकी आंखों के सामने उस मृत व्यक्ति का चेहरा घूमता रहा। हालांकि शव काफी पुराना था। चेहरे से पहचान पाना मुश्किल था। फिर भी वह शव चित्रा को किसी अपने से व्यक्ति की रह-रहकर याद दिला रहा था। शायद यह उसी इंसान का था, जिसके साथ चित्रा ने जीवन बिताने के सपने देखे थे कभी। लेकिन यह सब हुआ कैसे? उसने शहर छोड़ा था, संबंध नहीं। चित्रा का मन विविध प्रकार की आशंकाओं से भर गया। उसने उसे कई बार फोन मिलाने की कोशिश की।।
उसने तुरंत वहां जाकर उसका पता लगाने की कोशिश भी की लेकिन वहां भी चित्रा के हाथ निराशा ही लगी। उसे पता चला, उसके वहां से जाने के बाद वह व्यक्ति भी न सिर्फ शहर बल्कि देश भी छोड़कर जा चुका था।
अगले कुछ दिनों तक अन्य विद्यार्थियों के लिए उसी शव पर काम करने और सीखने के आदेश थे। चित्रा जब भी उसके निकट जाती, उससे कुछ भी न हो पाता, वह सिर्फ दूसरों को करते हुए देखती और मन ही मन दर्द महसूस करती। मानो वह कोई शव नहीं बल्कि कोई जीवित मनुष्य हो।
चित्रा की मानसिक हालत बिगड़ती जा रही थी। इसका सीधा असर उसकी शिक्षा पर हो रहा था। ऐसे में अपने ही क्षेत्र की एक बहुत ही पुरानी और उम्रदराज महिला चिकित्सक से एक सेमिनार के दौरान चित्रा का सामना हुआ। उनके अनुभव सुनने और जानने के बाद चित्रा को लगा कि उसे उनसे एक बार मिलना चाहिए। चित्रा ने सेमिनार खत्म हो जाने के बाद उनसे मिलने के लिए अपने ही एक वरिष्ठ से सिफारिश करवाई और आखिरकार वह महिला चिकित्सक चित्रा से मिलने के लिए तैयार हो गई।
जब चित्रा उनसे मिली तो पहले तो वह उन्हें देखती ही रह गई। अति प्रभावशाली व्यक्तित्व, सादगी में लिप्त वह उससे ऐसे मिली जैसे उसे बहुत पहले से और बहुत अच्छे से जानती है। कुछ देर इधर-उधर की बातें कर जब उन्होंने चित्रा को सामान्य मन:स्थिति में लाकर सीधे मुद्दे की बात की तो चित्रा समझ ही नहीं पाई कि उन्हें उसकी समस्या के विषय में इतनी सब जानकारी कहां से और कैसे मिली। उन्होंने चित्रा को समझाया, ‘यदि तुम सच में एक कुशल सर्जन बनना चाहती हो तो सबसे पहले खुद पर विश्वास करना सीखो। हमेशा ध्यान रखो कि तुमने औजार किसी की जान बचाने के लिए उठाया है और इस नेक काम में ईश्वर तुम्हारे साथ है। यदि तुम्हें उस परिष्कृत शव में अपना कोई नजर आ भी रहा है तो कोई बात नहीं। तुम उसे जिंदा ही समझो। लेकिन यह हमेशा याद रखो कि किसी भी कीमत पर तुम्हें उसे बचाना है। इसलिए तुम्हारा काम अपनी तरफ से परिपूर्ण होना चाहिए। समझी…?’
‘लेकिन कोई भी डाक्टर कभी भी अपने किसी व्यक्ति की शल्य-चिकित्सा खुद नहीं करता’। ‘तो तुम्हें क्या लगता है, ऐसा क्यों होता है…?’ ‘क्योंकि अपने किसी व्यक्ति के प्रति उसकी भावनाएं जाग सकती हैं और शल्य-चिकित्सा करते वक्त चिकित्सक के हाथ कांप सकते हैं।’ ‘बिलकुल ठीक, लेकिन यह सोचो यदि कोई एक डाक्टर अपने बच्चे के लिए या किसी भी अपने को किसी दूसरे डाक्टर के हवाले करता है तो, क्या ऐसे ही कर देता है, बिना यह जाने कि वह जिसे अपना व्यक्ति सौंप रहा है वह कितना काबिल है? नहीं ना…? बल्कि वह किसी ऐसे डाक्टर को चुनता है जो काबिल होने के साथ-साथ उसकी जान पहचान में भी हो, है कि नहीं..?’
‘हां शायद, मुझे नहीं मालूम’।
‘तो सोचो उस चुने हुए डाक्टर पर भी कितना दबाव होता होगा। उसके लिए भी कितनी बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी होती होगी। फिर भी वह नहीं घबराता और मरीज को एक आम मरीज समझ कर हर हाल में उसे ठीक करने का मकसद रखता है। बस तुम्हें भी वही सोच अपनाने की जरूरत है’। चित्रा ने अचानक कहा, ‘पर आपको कैसे पता कि मेरी क्या समस्या है…?’ वह महिला चिकित्सक एक मधुर मुस्कान लिए कहती है, ‘तुम पहली नहीं हो जो कमरे से बाहर चली जाती हो।’
उस दिन के बाद से मैंने उनकी कही यह बात गांठ बांध ली और तब से अब तक जितनी भी शल्य-चिकित्साएं मैंने की उनका परिणाम आप सब के सामने है, और मैं आज यहां इस सेमिनार में खड़ी आप सब से रूबरू हूं।’
‘तो क्या आप उनसे दुबारा फिर कभी मिलीं..?’ ‘नहीं, उस एक मुलाकात के बाद जैसे वह गायब ही हो गई’। ‘और वह शव क्या सच में आपके किसी अपने का था?’ ‘नहीं, वह शव किसी अजनबी का ही था। मैंने उसके बारे में फिर से जानकारी इकट्ठी की।’ ‘फिर आपने इतनी आसानी से यह कैसे सोच लिया कि वह वही है’।
‘कई बार निजी परेशानियों के चलते आपका मन विचलित होता है और आपके मन में बुरे विचार आने लगते हैं। अक्सर ऐसी अवस्था में अपने किसी प्रियजन के साथ कुछ अनहोनी की आशंका अधिक होती है। मुझे पूरा यकीन है, आप सबने भी कभी न कभी ऐसा अनुभव जरूर किया होगा। भले ही आपका अनुभव लंबा न रहा हो। है ना…? मेरे साथ भी उन दिनों ऐसे ही हालात थे। वह मात्र मेरा वहम ही था। आज वह व्यक्ति पूर्णत: स्वस्थ है और एक सफल जीवन जी रहा है। पुस्तक समीक्षा: ज़िंदगी के बदसूरत ‘मेंढकों’ को किस करना क्यों जरूरी
