आज फिर सामने वाली बहुमंजिला सोसायटी के नीचे से तेज-तेज झगड़े की आवाज आ रही थी। यह कोई नई बात नहीं थी। लगभग हर दूसरे दिन यही होता—कभी सड़क की सफाई को लेकर, कभी किसी आवारा कुत्ते को किसी ने पत्थर मार दिया हो तो उस पर। एक औरत जोर-जोर से चिल्लाती और आस-पड़ोस के लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आते। कुछ तमाशा देखते, कुछ हंसते और फिर अपने-अपने काम में लग जाते।
बहुमंजिला सोसायटी के सामने ही मंदिर है। रोज सुबह-शाम यहां आवाजाही लगी रहती। इंदु यह सब देखकर समझ गई थी कि आज भी वही शोर है। उसे कई बार यह दृश्य देखना पड़ा था, क्योंकि इंदु का मंदिर जाना और उस औरत का चिल्लाना अक्सर एक ही समय होता। मंदिर में ही किसी ने बताया था कि उस औरत का नाम मार्था है। वह ईसाई है और उसी बहुमंजिला की पहली मंजिल पर रहती है।
बहुमंजिला विलासिता का प्रतीक था, जहां केवल संपन्न लोग ही फ्लैट ले सकते थे। इसका मतलब था कि वह किसी संपन्न परिवार से ही होगी। आज भी शायद किसी बात ने उसे भड़का दिया था। इंदु मंदिर जाने के लिए घर से निकली तो सारी आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। उसके घर के गेट से ही बहुमंजिला का किनारे वाला हिस्सा दिखाई देता। वहीं से वह अकसर मार्था को चिल्लाते हुए देखती-सुनती थी। अधिकतर जब सुबह की दिनचर्या शुरू होती, तभी उसका किसी न किसी से विवाद हो जाता।
गोरे रंग की मार्था, घुटनों तक की स्कर्ट और ब्लाउज पहने, छोटे-छोटे कटे बाल और हाथ में एक थैली लिए रहती। अगर वह यूं आक्रामक व्यवहार न कर रही हो, तो कोई यह नहीं कह सकता था कि वह मानसिक रूप से परेशान है। जब वह नीचे उतरती, तो सड़क के सारे आवारा कुत्ते उसे घेरकर बैठ जाते। ये कुत्ते बड़े खतरनाक माने जाते थे—लोगों के पीछे दौड़ते, गाड़ियों पर भौंकते, कभी किसी को काट लेते, कभी गिरा देते। लेकिन मार्था को देखते ही उनकी पूंछें हिलने लगतीं। वह उन्हें प्यार करती।
धूप में, सड़क के किनारे, सोसायटी के गेट के पास कुर्सी डालकर बैठ जाती और कालोनी में घूमने वाले कुत्ते उसके आसपास जमा हो जाते। ऐसा लगता, मानो वह कोई महारानी हो और आसपास उसके सेवक बैठे हों। कभी-कभी वह उन कुत्तों को ऊपर फ्लैट में भी ले जाती। फ्लैट वाले इसका विरोध करना चाहते, मगर वह इतनी झगड़ालू थी कि कोई उसका सामना नहीं करना चाहता।
उससे कोई भी बात करना पसंद नहीं करता, लेकिन उसे इन बातों की कोई परवाह नहीं थी। थैली से बिस्कुट निकाल-निकालकर वह कुत्तों को खिलाती रहती। कभी प्यार से सहलाती, कभी गले लगाती, कभी गोद में बैठा लेती। लोग उसे मजाक का विषय बना लेते। उसकी ऊंची आवाज और लगातार चिल्लाना किसी को भी उससे बात करने के लिए प्रेरित नहीं करता था।
इंदु ने महसूस किया कि मार्था को कुछ बातों पर बहुत गुस्सा आता है। जो भी आदमी कचरा फैलाता, वह उस पर अंग्रेजी-हिंदी की मिली-जुली भाषा में चिल्लाने लगती। कोई आवारा कुत्ते को पत्थर मार देता तो उसकी शामत आ जाती। मार्था इतना शोर मचाती कि आसपास के सारे लोग बाहर निकल आते।
इसी बीच एक दृश्य रोज दोहराया जाने लगा। एक आदमी गुलाबी साइकिल पर रोज मंदिर आता। वह मार्था को लगातार देखता रहता—उतनी देर तक, जब तक वह मंदिर के भीतर न चला जाता। फिर वह मार्था से थोड़ी दूरी बनाकर बैठ जाता। मार्था उसे देखकर कभी अजीब-सी मुस्कान दे देती, कभी अचानक चुप हो जाती और कभी और जोर से चिल्लाने लगती।
कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा। फिर वह आदमी मंदिर के गेट के पास बने पिलर पर चढ़कर बैठने लगा। उसका मुंह हमेशा मार्था की ओर रहता। कभी ध्यान मुद्रा में बैठ जाता, कभी जोर-जोर से गाने लगता। उधर मार्था सामने रखी कुर्सी पर बैठ कर किताब खोलकर पढ़ती रहती। दोनों बहुत देर तक एक-दूसरे को देखते रहते।
कई बार मार्था उसे नीचे उतर जाने को कहती, तो वह चुपचाप उतरकर चला जाता। एक दिन वह जोर-जोर से अपनी कापी से कविता पढ़ रहा था—
‘तुम लगाकर बैठी हो धूप में कुर्सी, आज तक देखी नहीं हसीना तुम-सी। जरा एक बार सीधे देख लो मुझे भी, थक गया हूं सहते-सहते तुम्हारी नजरें तिरछी।’ ये चार पंक्तियां इंदु को भी याद हो गई थीं।
एक रोज जब इंदु मंदिर से लौट रही थी, तभी उसकी नजर मार्था की आंखों से मिली। मार्था ने इंदु की तरफ हाथ बढ़ाया और बोली, ‘आप रोज मंदिर जाती हैं न? आज पहली बार आपसे बात हो रही।’ इसके बाद जब भी इंदु निकलती, दोनों एक-दूसरे का अभिवादन करने लगी। थोड़ी-बहुत बातचीत भी होने लगी। इंदु धीरे-धीरे मार्था के स्वभाव को समझने लगी थी।
एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा, ‘आप अकेली रहती हैं?’
मार्था बोली, ‘मेरा बेटा है। अमेरिका में रहता है।’
‘आप कभी-कभी वहीं जाती होंगी? तभी कुछ दिनों नजर नहीं आतीं?’
‘हां।’
‘और आपके पति?’ मार्था चुप हो गई।
कुछ दिनों बाद, जैसे उसके भीतर बरसों से जमा बांध टूट गया—
‘मैं उसे बहुत प्यार करती थी’। उसकी आवाज भर्रा गई। ‘एक दिन उसने मुझे गुलाब दिया था। मुझे लगा था-प्रेम हमेशा साथ निभाता है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बेटा नहीं हुआ था तब तक, वह कभी-कभी शराब पीता था। धीरे-धीरे उसकी आदत बढ़ती गई। जब पीकर घर आता, तो पहले मुझे तोड़ता—शब्दों से, हाथों से—और फिर घर में तोड़-फोड़ मचाता। हर तरफ कचरा, गंदगी फैल जाती थी। कहीं भी उल्टियां करता, बोतलें तोड़ देता। तभी से जब भी कचरा देखती हूं, खुद पर काबू नहीं रख पाती। ज्यादा शराब से उसका लिवर खराब हो गया और वह मर गया। तब से मुझे लगने लगा इंसानों से बेहतर ये कुत्ते हैं। अब यही मेरी दुनिया हैं।’
समय बीतता गया। एक दिन इंदु ने देखा—दोनों एक बेंच पर बैठे हाथ थामे हैं। मार्था अब शांत थी। धीरे-धीरे कालोनी में यह स्पष्ट होने लगा कि दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया है।
इंदु ने सुना था कि उसने एक दिन मुस्कुराकर मार्था से पूछा था, ‘क्या तुम मेरे साथ रहोगी?’ मार्था ने उत्तर में कुछ नहीं कहा। बस उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी। वही उसकी स्वीकृति थी। अब धूप में रखी उस कुर्सी के पास दो कप चाय भी रखी दिखाई देती हैं। कुत्तों की टोली पहले की तरह आसपास बैठती है, पर अब वहां शोर नहीं, एक सुकून भरी खामोशी होती है।
एक दिन इंदु वहां से गुजरी तो कवि ने मुस्कुराकर कहा, ‘अब मार्था अकेली नहीं है।’
