नैतिक पहरेदारी…यह शब्द सत्ता से लेकर समाज तक अपनी-अपनी शक्तियों के हिसाब से इस्तेमाल किया जा रहा है। पिछले दिनों बिहार के जमुई का वीडियो काफी प्रचारित हुआ। बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि आरोपी युवक रील बनाने के ही चक्कर में पकड़े गए। मुख्यमंत्री के बयान का एक तर्जुमा यह भी हो सकता है कि उसी तरह की यौन हिंसा सामने आ पाई है, जिनके रील प्रचारित हुए। नहीं तो पीड़ित पक्ष इस थाने से लेकर उस थाने तक का चक्कर लगाते रहता। रील नहीं बनती तो न आम लोगों का गुस्सा फूटता और न पुलिस कार्रवाई करती।

बिहार की मंत्री श्रेयसी सिंह ने इस मसले पर बयान दिया कि नैतिक पहरेदारी थोड़े सभ्य तरीके से भी की जा सकती थी। वैसे, यह तरीका असभ्य इसलिए हुआ क्योंकि रील के जरिए पूरे देश के लोगों के फोन तक पहुंच गया। जब सत्ता ने नैतिक पहरेदारी को अपना मानदंड बनाया था तो उसे सभ्य और असभ्य के दायरे में नहीं रखा था। सत्ता द्वारा नैतिक पहरेदारी के आह्वान के बाद सबसे पहला हमला वैलेंटाइन डे जैसे उत्सवों पर हुआ।

किसी की पसंद-नापसंद जनप्रतिनिधि कैसे तय कर सकते हैं

कथित नैतिक पहरेदार पार्क में बैठे लड़के-लड़कियों की पिटाई कर देते थे। कौन क्या खाएगा, क्या पहनेगा इस तरह के फरमान जब जनप्रतिनिधि सुनाने लगते हैं तो आम जनता के पास किसी तरह का सुरक्षा-कवच नहीं रह जाता है। अब उसे कोई भी उस भोजन के लिए प्रताड़ित कर सकता है जो बहुसंख्यक नहीं खा रहा है, उसे वह पहनने के लिए प्रताड़ित किया जा सकता है जिसे सामंती सत्ता निषेध मानती है।

नैतिक पहरेदारी महिलाओं पर दोहरा वार करती है। पहले ही घर में उनके लिए कई नियम-कानून बने हुए हैं। अब घर के बाहर भी उसके लिए खास संहिता इसलिए लागू कर दी जाती है क्योंकि वह स्त्री है। किसी भी संवैधानिक संस्था का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग अगर कथित नैतिक पहरेदारी की वकालत करते हैं तो साथ ही वे संवैधानिक अधिकारों के हनन के लिए भी प्रोत्साहित कर रहे होते हैं। भारत का संविधान जेंडर, जाति और धर्म के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं करता है। लेकिन कथित नैतिकता की बात करते ही यह भेदभाव शुरू हो जाता है।

क्या किसी ने पीड़िता की पीड़ा का अनुमान लगाया?

जब मुख्यमंत्री रील के वीडियो को अपराधी तक पहुंचने का जरिया बता रहे थे तो क्या उन्हें यह एहसास नहीं था कि इंटरनेट के इतिहास में दर्ज इस वीडियो का असर उस लड़की के आगामी जीवन पर क्या पड़ेगा। सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने यौन हिंसा के वीडियो को बिना चेहरा संपादित किए चलाया। अपने साथ हुए अपराध को बार-बार सोशल मीडिया पर देखना व्यक्ति और उसके परिवार को कितना व्यथित कर सकता है, क्या इसका भी कोई अनुमान लगाया गया है?

यौन हिंसा करना और साथ में वीडियो बनाना दोहरा अपराध है। हम इस तरह के वीडियो को सिर्फ इसलिए जायज नहीं ठहरा सकते कि इस कारण अपराधी पकड़े जाएंगे। नैतिक पहरेदारी और रीलतंत्र दोनों समाज के लिए घातक है।