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विशेष: पीड़ा में महाप्राण

जॉन बैरी ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट इनफ्लुएंजा-द एपिक स्टोरी आफ द डेडलिएस्ट पेंडेमिक इन हिस्ट्री’ में इस महामारी की विकरालता का वर्णन करने के साथ भारत में इस महामारी के फैलने के कारणों पर भी प्रकाश डाला है।

Author Updated: November 16, 2020 2:21 PM
साहित्यकार महाप्राण निराला जी ने महामारियों के संकट को बड़े करीब से देखा है।

निराला के जीवन और साहित्य का बड़ा हिस्सा उस पीड़ा और संवेदना से जुड़ा है, जिसने उनके मन और उनकी कलम पर खासा असर डाला। खासतौर पर ‘कुल्लीभाट’ में स्पैनिश फ्लू के प्रकोप का मार्मिक वर्णन उन्होंने किया है। गौरतलब है कि निराला की पत्नी के साथ उनके परिवार के कई लोग इस महामारी के शिकार हो गए थे।

पांडेय बेचैन शर्मा ‘उग्र’ की कहानी ‘वीभत्स’ भी भारत में फैली स्पैनिश फ्लू की त्रासदी को बयां करती है। इस महामारी की चपेट में खान अब्दुल गफ्फार खां और प्रेमचंद भी आ गए थे। इतिहासकार और ‘राइडिंग द टाइगर’ पुस्तक के लेखक अमित कपूर ने इस फ्लू के समूचे इतिहास को समेटा है।

जॉन बैरी ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट इनफ्लुएंजा-द एपिक स्टोरी आफ द डेडलिएस्ट पेंडेमिक इन हिस्ट्री’ में इस महामारी की विकरालता का वर्णन करने के साथ भारत में इस महामारी के फैलने के कारणों पर भी प्रकाश डाला है। प्रेमचंद ने उस समय फैले हैजे और प्लेग का वर्णन ‘ईदगाह’ और ‘दूध का दाम’ कहानियों में किया है।

त्रासदी दर त्रासदी कलम और तारीख
महामारियों का लंबा इतिहास है। यदि हम ध्यान दें तो बीते दो हजार सालों में 20 बड़ी महामारियां पूरे विश्व पर कहर बरपा चुकी हैं। कुछ महामारियों का असर बहुत ज्यादा नहीं था। इनमें कोरोना 17वीं ऐसी महामारी है, जिसमें मौतों का आंकड़ा 13 लाख तक पहुंच गया है। पहले के इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि पहली बार साल 165 में महामारी फैली थी। उस समय एंटोनाइन प्लेग नाम की महामारी एशिया, मिस्र, यूनान (ग्रीस) और इटली में फैली थी। इससे 50 लाख के आसपास लोगों की मौत हुई थी।

इसके बाद जो महामारी फैली, उसका नाम था- जस्टिनियन प्लेग। यह महामारी साल 541-542 में एशिया, उत्तरी अफ्रीका, अरेबिया और यूरोप में फैली। जस्टिनियन प्लेग के बाद 1347 से 1351 के बीच एक बार फिर प्लेग फैला। इसे ‘द ब्लैक डेथ’ नाम दिया गया। इसका सबसे ज्यादा असर यूरोप और एशिया में हुआ था। ये प्लेग चीन से फैला था। 1492 में अमेरिका में चेचक यानी ‘स्मॉलपॉक्स’ नाम का संक्रमण फैल गया।

इन तमाम दौरों में मानवता के हिस्से आई त्रासदी का लेखकों ने न सिर्फ संवेदनात्मक ब्योरा लिखा है बल्कि ये सारा लेखन मानवीय इतिहास और संवेदना की आज अक्षर पूंजी भी है।

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