सुबह-सुबह गर्मागर्म चाय की चुस्कियों के संग अखबार पढ़ना मनोहर जी के रोजमर्रा के काम में शामिल था। जिस दिन वे अखबार नहीं पढ़ते, उन्हें कुछ अधूरा-सा अनुभव होता। साथ ही, जिस प्रकार खाने की थाली में छप्पन भोग होने के बावजूद यदि अचार या चटकारेदार चटनी न हो तो खाना चटपटा या मजेदार नहीं लगता, ठीक वैसे ही अखबार पढ़ते हुए मनोहर जी जब तक तीन-चार प्याली चाय नहीं गटक जाते, उन्हें खबरें पढ़ने में मजा नहीं आता।
इसलिए उनकी धर्मपत्नी यमुना देवी उनकी आरामकुर्सी के बगल में रखे गोल स्टूल पर एक चाय से भरा थर्मस, पानी से भरा जग और तीन-चार चीनी मिट्टी के कप सुबह ही रखकर अपने काम में व्यस्त हो जाती हैं। उसके बाद न तो यमुना देवी मुड़कर फिर मनोहर जी की ओर आतीं और न ही घर का कोई सदस्य उनके पास आता। मनोहर जी भी अखबार और चाय के संग मस्त रहते। उन्हें भी घर में क्या चल रहा है, इससे कोई लेना-देना नहीं रहता। वे तो बस अखबार में देश-विदेश की खबरों में खोए रहते।
सेवानिवृत्ति से पहले वे दफ्तर और अपने अन्य कार्यों में व्यस्त रहते थे। उनके पास घर-परिवार के लिए वक्त नहीं होता था और अब परिवार वालों के पास उनके लिए वक्त नहीं है। यही जीवन चक्र है, जो घूमते ही रहता है। जहां से शुरू होता है, फिर वहीं आ जाता है। कहने को तो मनोहर जी जब से सेवानिवृत्त हुए हैं, घर पर ही सारा दिन रहते हैं, लेकिन न तो घर का कोई सदस्य उनसे कुछ बोलता-बतियाता है और न ही वे किसी से कुछ कहते हैं। केवल वक्त पर उनकी पत्नी उन्हें उनके स्थान पर ही भोजन-पानी दे जाती हैं।
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वैसे मनोहर जी के दो बेटे, दो बहुएं और उनके बच्चे भी हैं। सभी साथ में एक ही छत के नीचे रहते हैं, किंतु सभी अपने-अपने काम में व्यस्त हैं। मनोहर जी की घर पर उपस्थिति अदृश्य सदस्य की तरह है। उनका घर पर होना या न होना किसी के लिए कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता।
जब से मनोहर जी सेवानिवृत्त हुए हैं, तभी से वे अखबार का कोई भी कोना नहीं छोड़ते हैं। अखबार में छपी हर एक खबर को पूरे विस्तार से पढ़ते हैं और फिर उस पर मनन भी करते हैं। आजकल उनकी विशेष रुचि अखबार में तस्वीरों के संग छपने वाले शोक-संदेश के स्तंभ में बहुत अधिक बढ़ गई है, जिसे वे कम से कम दो से तीन बार अवश्य पढ़ते हैं।
पहले वे हर व्यक्ति का नाम पढ़ते हैं, फिर गौर से उसकी तस्वीर देखते हैं कि कहीं कोई उनकी जान-पहचान का तो नहीं है। जब वे आश्वस्त हो जाते हैं कि उनका कोई परिचित नहीं है, तब वे मृत व्यक्ति के विषय में लिखे गए शोक-संदेश को बड़े ध्यान से पढ़ते हैं। पूरा शोक-संदेश पढ़ने के बाद वे खुद से ही प्रश्न करते हैं कि क्या यह व्यक्ति ऐसा ही रहा होगा, जैसा उसके बारे में लिखा गया है? क्या वाकई इस व्यक्ति में कोई ऐब नहीं रहा होगा?
अपने इन प्रश्नों का उत्तर भी वे स्वयं ही देते हुए कहते हैं—शायद इसका स्वभाव ऐसा ही रहा होगा, तभी तो शोक-संदेश में ऐसा लिखा गया है। हर रोज मनोहर जी काफी देर तक शोक-संदेश के स्तंभ में छपे हर व्यक्ति को एकटक देखते रहते हैं, फिर उस पर लिखा संदेश पढ़ते हैं और अंत में न जाने क्या उनके मन में आता है कि अखबार बंद करके एक ओर रख देते हैं।
आज भी मनोहर जी अखबार में शोक-संदेश का स्तंभ पढ़ते हुए हर बार की तरह विचारमग्न हो गए और मनन करने लगे कि आखिर किसी भी व्यक्ति की तारीफ उसके मरणोपरांत ही क्यों होती है? क्या व्यक्ति की जीवित रहते हुए तारीफ नहीं हो सकती? या फिर उसके परिवार, मित्रगण या रिश्तेदार उसके गुणों और विशेषताओं को उसके जीवित रहते पहचान ही नहीं पाते? आखिर मरने के बाद आपके प्रति लोगों का नजरिया क्यों बदल जाता है? क्योंकि अब आपसे उनके किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं होनी है।
अब मनोहर जी शोक-स्तंभ के हर संदेश को ध्यान से पढ़ रहे थे। हर संदेश ऐसा ही लग रहा था कि उस व्यक्ति के न रहने से अब किसी और का जीवन कितना सूना हो गया है। जब घर में किसी की मौत होती होगी, तो कौन तय करता होगा कि शोक-संदेश में क्या लिखवाना है? शोक-संदेश में किसी तरह की शिकायत क्यों नहीं शामिल रहती? क्या किसी को किसी से शिकायत ही नहीं थी?
फिर मनोहर जी ने एक और तुलना की। किसी के शोक-संदेश में बहुत अच्छी भाषा थी तो किसी के संदेश में सपाट भाषा थी। आपका शोक-संदेश दुनिया कैसे पढ़ेगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि उसे लिखवाया किसने।
ऐसे ही कई सवाल मनोहर जी के दिलो-दिमाग में समुद्र की लहरों की तरह उठने लगे। वे थोड़ी बेचैनी महसूस करने लगे। अचानक उनके मन में विचार आया कि एक दिन वे भी तो इस दुनिया को अलविदा कहकर परलोक गमन कर जाएंगे और उनकी भी तस्वीर इस शोक-संदेश के स्तंभ में अवश्य छपेगी।
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यह विचार मन में आते ही मनोहर जी गहन चिंतन में डूब गए। थोड़ी देर चिंतन-मनन करने के उपरांत पहली बार अखबार पढ़ना बीच में ही छोड़कर वे अपने कमरे में चले गए। कमरे में जाकर उन्होंने अपनी एक अच्छी-सी तस्वीर एलबम से ढूंढ़कर निकाली और उसे अपनी डायरी में सहेजकर रख दिया। उसके बाद उसी डायरी में उन्होंने एक शोक-संदेश तैयार किया, जिसमें उन्होंने संक्षेप में अपना परिचय, गुण, विशेषताएं और स्वभाव के बारे में लिखा। इतना सब करने के बाद उन्होंने वह डायरी घर के ऐसे स्थान पर रख दी, जहां से घर का हर सदस्य उसे आसानी से देख सके।
सारा दिन मनोहर जी बेचैन रहे। उनका मन दोबारा अखबार पढ़ने का नहीं हुआ और न ही उन्होंने चाय पी। उनकी रात भी करवटें बदलते हुए बीती।
दूसरे दिन सुबह पहली बार यमुना देवी को मनोहर जी अखबार पढ़ते हुए नहीं मिले। उन्होंने इधर-उधर नजरें दौड़ाईं, पर मनोहर जी कहीं दिखाई नहीं दिए। अब यमुना देवी को थोड़ा अजीब-सा लगा। मनोहर जी को ढूंढ़ते हुए जब यमुना देवी उनके कमरे में पहुंचीं तो उन्होंने देखा, मनोहर जी हमेशा के लिए फिर कभी न लौटने वाली लंबी यात्रा पर जा चुके थे।
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आधुनिकता और तेज आर्थिक विकास के जिस दौर को हम प्रगति मानकर आगे बढ़ रहे हैं, उसके भीतर एक ऐसी सच्चाई लगातार गहराती जा रही है, जिसे अक्सर घरों की दीवारों के पीछे दबा दिया जाता है। यह सच्चाई है बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन, रिश्तों का टूटना और परिवारों के भीतर संवाद का खत्म होना। आज स्थिति यह है कि घर तो भरे हुए हैं, लेकिन मन खाली हैं। लोग मौजूद हैं, लेकिन रिश्तों में उपस्थिति नहीं है। तकनीक ने हमें जोड़ने का दावा किया था, लेकिन कई मामलों में उसने भावनात्मक दूरी और बढ़ा दी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
