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मणिपुर के कलाकारों की मोहक प्रस्तुति

नृत्यांगना धन्नो रानी देवी ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ मायबी नृत्य से किया। मायबी नृत्य मई-जून में लोकदेव की अराधना में गांव के पंडित करते हैं।

नृत्यांगना धन्नो रानी देवी ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ मायबी नृत्य से किया। मायबी नृत्य मई-जून में लोकदेव की अराधना में गांव के पंडित करते हैं।

पिछले दिनों स्पीक मैके की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मणिपुरी नृत्यांगना धन्नो रानी देवी ने नृत्य पेश किया। धन्नो की प्रस्तुति में मणिपुरी नृत्य के लोक-तत्व खासतौर पर दिखीं। वह इंफल में एक कार्यक्रम के दौरान मणिपुरी नृत्य के गुरु सिंहजीत सिंह से मिलीं। उनसे प्रभावित होकर सत्तर के दशक में वह दिल्ली आ गई। फिर गुरु के दल के साथ नृत्य प्रस्तुति करने लगीं और त्रिवेणी कला केंद्र में मणिपुरी नृत्य सिखाने लगीं।

इस अवसर पर लेडी इरविन कालेज की निदेशक डा अनूपा सिद्धू ने कहा कि भारतीय परंपरागत कलाएं गत्यात्मक ऊर्जा से पूर्ण हैं। कलाकार अपनी कला से अपने प्रदेश की प्रकृति, आकाश, पेड़-पौधों सबकी झलक अपनी समृद्ध धरोहर से सरलता से परिचित करा देते हैं।

नृत्यांगना धन्नो रानी देवी ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ मायबी नृत्य से किया। मायबी नृत्य मई-जून में लोकदेव की अराधना में गांव के पंडित करते हैं। इस प्रस्तुति में धन्नो ने लयात्मक अंग, पद व हस्त संचालन पेश किया। उनकी पेशकश में कोमलता और सहजता नजर आई। दूसरी पेशकश लय हरोबा थी। इसे नृत्यांगना तनुजा और लक्ष्मी ने पेश किया। मणिपुरी गीत पर आधारित नृत्य में नृत्यांगनाओं ने अंग संचालन के साथ अर्ध भ्रमरी का प्रयोग मोहक अंदाज में किया। उन्होंने नृत्य के क्रम में लयात्मक गतियों का प्रयोग किया।

अगली पेशकश में पुंग चोलम को थोयबा सिंह और शरद ने पेश किया। संकीर्तन शैली में प्रस्तुत पुंग चोलम तीन व तांचप ताल में निबद्ध थे। दोनों नर्तकों ने पंजों और एड़ी के जरिए पद संचालन किया। उन्होंने सोलह और ग्यारह भ्रमरियों का प्रभावकारी प्रयोग किया। इससे उनका नृत्य सम्मोहक बन पड़ा। मणिपुरी नृत्य में पुराने समय में कलाकार तलवारों के साथ कलाबाजी और करतब दिखाते हुए नृत्य करते थे। कुछ सालों से इसमें बदलाव किया गया। अब इसे छोटे-छोटे छड़ी के सहारे किया जाता है, इसे स्टिक डांस नाम दिया गया। इस नृत्य को नर्तक रोमियो ने प्रस्तुत किया। रोमियो की एकाग्रता और कलाइयों की गतियां आकर्षक थीं। उन्होंने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मोहित कर लिया। ढोल चोलम को प्रदीप, थोयबा सिंह और शरद ने पेश किया। ढोल चोलम मुख्यत: होली के अवसर पर मंदिरों में किया जाता है।

गौरतलब है कि मणिपुर में होलिका दहन के बाद पांच दिनों तक होली समारोह चलता है। इस दौरान गांव के बच्चे, लड़कियां, युवाओं की टोलियां परंपरागत तरीके से मंदिरों में इकट्ठे होकर गीत-संगीत की लय पर इसे मनाते हैं। तीनों कलाकारों ने 36-36 भ्रमरियों के प्रयोग और ढोल वादन से नृत्य को खूबसूरत बना दिया। वास्तव में मणिपुरी के कलाकारों की यह मधुरिम पेशकश मधुर थी।

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