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विशेष: स्त्री संघर्ष से विमर्श तक

महिलाओं की दुनिया भारत के साथ पूरे विश्व में बदल रही है। इसी के साथ बदल रही है महिला चिंतन और लेखन की धारा भी। अच्छी बात यह है कि अपनी स्थिति के बारे में अब महिलाएं खुद आगे आकर अपनी बात कह रही हैं। समाज से लेकर साहित्य तक बुना जा रहा यह साझा महिला संघर्ष के साथ उससे जुड़े विमर्श को भी नई राह दिखा रहा है।

Author Updated: January 11, 2021 4:49 AM
Femaleसांकेतिक फोटो।

चंद्रभान सिंह यादव

स्‍त्री चिंतन उतना ही प्राचीन है, जितना हमारा साहित्य। फ्रेडरिक एंगेल्स की पुस्तक ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ के अनुसार व्यक्तिगत संपत्ति के विकास के साथ स्त्री के शोषण का आरंभ होता है, जिस प्रकार का रिश्ता मजदूरों का पूंजीपतियों से है, कुछ उसी प्रकार का रिश्ता स्त्रियों का पुरुषों से है। दरअसल, पूंजीवाद और पुरुषवाद का गठबंधन पुराना है। इस संबंध के क्रूर विरोधाभास आज कई स्तरों पर महसूस किए जा रहे हैं। अलबत्ता इस दौरान महिला संघर्ष के दबाव में दुनियाभर में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाले कई कानून भी बने हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल की रचना ‘द सब्जेक्सन आॅफ वीमन’ के अनुसार स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक विषमताएं जरूर हैं, पर बौद्धिक क्षमता में दोनों बराबर हैं। वैसे भी विषमता (लिंग, वर्ण और रंग) को असमानता मानना अमानवीय है। सीमोन द बोउवार ‘द सेकेंड सेक्स’ में अकारण नहीं लिखती हैं कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है।’ अनामिका ‘स्त्री विमर्श की उत्तर गाथा’ में विमर्श और विमर्शकारों के दायित्व पर गंभीरता से प्रकाश डालती हैं- कुल मिलाकर स्त्रीवाद के दो दायित्व हो जाते हैं। पहला, ‘जेंडर-स्टीरियोटाइप’ पर प्रहार तथा दूसरा, स्त्री-मन और शरीर की सही समझ का विकास।

रचना और स्त्री

स्त्री-विमर्श की पृष्ठभूमि साहित्य तो तैयार करता है, पर समाजशास्त्र व मनोविज्ञान के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। साहित्येतिहास में जिन कृतियों को महान बतलाया गया है, उनमें स्त्रियों के व्यक्तित्व का समग्रता से मूल्यांकन नहीं है। तथाकथित महान रचनाकारों के द्वारा भी स्त्रियों की परंपरागत छवि और पुरुषवर्चस्व को स्थापित करने का प्रयास किया गया है, जिस पर स्त्री-विमर्श सवाल उठाता है।

भक्तिकालीन संतों की प्रगतिशीलता का बखान करने वाले उनके संकीर्ण स्त्री-चिंतन पर मौन साध लेते हैं। नवजागरण काल में जरूर स्त्री के जीवन स्तर में सुधार और उसे शिक्षित करने का प्रयास किया गया पर छायावादी दौर में वह फिर से प्रेयसी, प्रकृति और देवी के रूप में आती है, उसके मानवी रूप का दर्शन कम होता है।

बड़ी उपलब्धि

स्त्री-विमर्श समकालीन साहित्य की महान उपलब्धि है। यह महिलाओं को मिले लोकतांत्रिक अधिकार, शिक्षा और स्वावलंबन का परिणाम है। इसका श्रेय सिर्फ उन्हीं को जाता है। इस विमर्श ने नारी जीवन के उन पक्षों को प्रस्तुत किया है, जिनकी चर्चा से साहित्य और समाज विज्ञान में परहेज किया जाता था।

मासिक धर्म और प्रसव पीड़ा की प्रामाणिक अभिव्यक्तिकिसी पुरुष के बूते की बात नहीं है। अनामिका अपनी कविता ‘प्रथम स्राव’ में कहती हैं- ‘अनहद-सी बज रही है लड़की/ कांपती हुई/ लगातार झंकृत हैं/ उसकी जंघाओं में इकतारे/ चक्रों सी नाच रही है वह/ एक महीयसी मुद्रा में/ गोद में छुपाए हुए/ सृष्टि के प्रथम सूर्य-सा लाल लाल तकिया।’ अति गोपनीयता और लज्जा के कारण किशोरियां अनेक ऐसे यौन रोगों से पीड़ित रहती हैं, जिनकी चिकित्सा की समुचित व्यवस्था का अभाव है। यह समस्या सिर्फ भारतीय महिलाओं की नहीं बल्कि वैश्विक है। यों ही नहीं मासिक धर्म के मुद्दे को उठाने वाले वृत्तचित्र ‘पीरियड: एंड आॅफ सेंटेंस’ को सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म का आॅस्कर अवार्ड (2019) प्रदान किया गया।

सच की अभिव्यक्ति

स्त्री-विमर्श सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, अपितु पूरी दुनिया इसके दायरे में है। यहां स्त्रियां अपनी पीड़ा और समस्या को ही नहीं व्यक्त कर रही हैं बल्कि अपनी शक्तिकी समीक्षा भी कर रही हैं। मसलन, स्नोवा बार्नो की लंबी कविताएं संघर्ष का चलचित्र हैं और मानवता की रक्षक भी। वो लिखती हैं, ‘ जब तक ताकतवर मुल्कों में/ साहसी और इंसाफ पसंद लड़कियां पैदा होती रहेंगी/ तब तक कोई भी बम/ कोई भी बुलडोजर/ और कोई भी प्रोपेगंडा/ मनुष्यता को अंधा नहीं कर पाएगा।

’ यहीं रशेल का आह्वान सुनना भी जरूरी है- ‘बहुत जरूरत है तुम्हारी जैसी लड़कियों की/ जो अपने हर कातिल की शिनाख्त करना जानती हों/ फिर चाहे कश्मीर की लुटी-पिटी लड़की हो/ या गुजरात की …या गाजा या इसराइल की/ उन्हें सबसे पहले अपनों के खिलाफ खड़ा होना है/ यहां तक कि हर औरत के खिलाफ भी/ जो संगठित धर्म और संगठित राष्ट्रीयता की गुलाम है।’ कहने की जरूरत नहीं कि नारीवादी लेखन घर-परिवार व स्त्री जीवन से आगे बढ़कर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को अपने आगोश में ले चुका है।

‘अन्या से अनन्या’

बाजारवादी दौर ने महिलाओं को कुछ स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और शक्तिशाली तो बनाया है, पर इसी दौर में महिला उत्पीड़न के नए मोर्चे भी खुले। ‘मी-टू’ अभियान ने मौजूदा दौर की महिलाओं के जीवन से जुड़े उस पक्ष से अवगत कराया, जिससे या तो हम अवगत नहीं थे या फिरउस पर सार्वजनिक तौर पर बात करने से कतराते थे।

देह और संदेह की इस दुनिया के मार्मिक सच को प्रभा खेतान ने आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ में बयां किया है। वो लिखती हैं, ‘मुझे कोई सजा नहीं मिली, किसी दैहिक पीड़ा का अहसास कभी नहीं हुआ, लेकिन एक चरम मानसिक यंत्रणा को भोगते रहने को, एक स्थायी आतंक को झेलते रहने को मैं बाध्य थी।’

कुमुद शर्मा की एक दशक पूर्व प्रकाशित पुस्तक है- ‘आधी दुनिया का सच’। इस पुस्तक में उठाए गए मुद्दों और समस्याओं से स्त्री समाज आज भी मुक्तनहीं है। इसलिए आवश्यक है कि इस पुस्तक का मूल्यांकन और विश्लेषण हो। नारी जीवन की विडंबना, अंतर्विरोध और उसकी तड़प को एक स्त्री स्वर देती है तो उसमें अनुभूति की आंच होती है।

वो एक प्रकरण का उल्लेख करते हुए लिखती हैं- ‘ड्राइंग रूम में किसी के साथ वह बैठी हुई थी। कुछ इंतजार के बाद उसे बेडरूम का रास्ता दिखाया गया। इससे पहले कि वह कुछ समझती, दरवाजा बंद हो गया। इस घटना के एक दशक बाद उसी स्त्री ने अपनी आत्मकथा लिखी, जिसमें उसने पुरुष की बर्बर वासना और उससे जुड़ी वारदात का कारुणिक चित्र खींचा था।’ यह एक मराठी रंगमंच से जुड़ी फिल्म अभिनेत्री के जीवन का सच है।

पत्रकारिता से लेकर विज्ञापनों तक में महिला सश्कतीकरण की आड़ में महिलाओं की आज ऐसी छवि पेश की जा रही है, जो दृश्य से लेकर भाषा तक हर लिहाज से आपत्तिजनक है। ज्यादातर टीवी धारावाहिकों की कहानियों की आधारभूमि विवाहेत्तर संबंध है। यही नहीं, इस सब के बीच नैतिकता के दायरे में अगर कोई कसूरवार दिखाया भी जा रहा है तो वो पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं हैं।

हावी होने की भूख

पुरुष की हिंसक मनोवृत्ति से प्रेम जैसा पवित्र संबंध भी अछूता नहीं है। प्रेम के अस्वीकार या प्रेमिका की शादी किसी और से तय होने पर अहंकारी और देह के भूखे प्रेमी हिंसक हो जाते हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसी घटनाएं विकासशील से लेकर विकसित देशों में खूब देखी गई हैं। इस जघन्य अपराध पर दुनियाभर में कई फिल्में बनी हैं। भारत में ‘छपाक’, पाकिस्तान में ‘सेविंग फेश’ और ब्रिटेन में ‘एसिड अटैक: माई स्टोरी’ इस तरह के दर्द को दृश्यमान करने वाली प्रमुख फिल्में हैं।

हिंसा की शिकार केवल निम्न, मध्य वर्ग की महिलाएं ही नहीं, अपितु सभी वर्गों की शिक्षित-अशिक्षित, आत्मनिर्भर महिलाएं भी हैं। कुमुद शर्मा पुरुष की हिंसक मनोवृत्ति की गहरी पड़ताल करते हुए लिखती हैं- ‘महिलाओं की आजादी, उनका सामर्थ्य पुरुष को आतंकित करने लगते हंै तो वह स्त्री को अपनी बर्बर हिंसा का शिकार बना कर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करता है, इसे पुरुष ‘डामिनेंस अर्ज’ (हावी होने की भूख) के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।’ वो इसी क्रम में आगे कहती हैं कि यौन हिंसा के तौर पर सामने आ रही यह वीभत्सता समाज के लिए शर्म का विषय है तो मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का।

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