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द लास्‍ट कोच सीरीज: रात अकेली है..

...साठ-सत्तर की रफ्तार में कार दौड़ रही है। गलियों और मोहल्लों में दिखने वाले कुत्ते मुख्य सड़कों पर आ गए हैं। कुछ तो बीच सड़क पर बैठे दिख रहे हैं तो कुछ बेखौफ आराम फरमा रहे हैं उस सड़क पर, जिस पर कुछ दिनों पहले तक भारी-भरकम गाड़ियां दौड़ रही थीं। ... एक कुत्ता अचानक गाड़ी के सामने आने पर चालक ने ब्रेक लगाई है। सड़क पर रगड़ खाती कार और ब्रेक की चीख दूर तक पसर गई है। रात थोड़ी और सहम गई है...। मौजूदा दौर में देर रात खामोश सड़क से गुजरते हुए अपने अनुभव साझा कर रहे हैं द लास्ट कोच के लेखक और पत्रकार संजय स्वतंत्र।

राज तथा समाज के खोललेपन की तस्वीर उकेरने वाले इस आलेख को पढ़ने के बाद दिल डूब रहा है इस स्याह रात में। रास्ते में न जाने कितने पुलिस अवरोधक आए मगर हमें रोका नहीं गया। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मेट्रो के पहिए थम चुके हैं। मुझे लास्ट कोच की याद आ रही है। कभी इठलाती हुई प्लेटफार्म पर आने वाली मेट्रो किसी यार्ड में सो रही होगी। कहते हैं जिंदगी कभी ठहरती नहीं। तो मेट्रो के बिना भी मेरे कदम कहां थमे हैं। मेरी तरह हजारों ऐसे लोग हैं जो संकट के इस दौर में अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने मोर्चे पर डटे हैं- अपने देश के लिए, अपने समाज के लिए और अपने परिवार के लिए। एक हौसला जो आपको माता-पिता और अपने शीर्ष नेतृत्व से मिलता है। आपदा की इस घड़ी में करोड़ों लोग घरों में रह कर तो कई लोग घरों से बाहर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं। उनमें मैं भी हूं और मेरे साथी-सहयोगी भी।

रात के ग्यारह बज चुके हैं। थक गया हूं मगर हौसले नहीं थके। न्यूजरूम से निकल कर गाड़ी में बैठते ही हमारे चालक विमल जी की चुप्पी ने डरा दिया है। मैंने उनसे पूछा, क्या बात है? उनका जवाब है- खामोश सड़कें बहुत डरा रही हैं इन दिनों। दूर-दूर तक कोई जन दिखाई नहीं देता। अजीब मरघटी सन्नाटा है। रात भी सहम गई है। मैंने जवाब दिया, कोई बात नहीं विमल जी। ये सड़कें फिर गुलजार हो जाएंगी। …… गाड़ी के शीशे के पार देख रहा हूं कि मुस्कुराता हुआ चांद साथ-साथ चल रहा है। जैसे किसी नायिका के गले से हार छिटक गया हो। गहरी नीली स्याही में डूबा आसमान एकदम साफ दिख रहा है।

विमल जी ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ाते हुए म्यूजिक ऑन कर दिया है। देव साहब की फिल्म ज्वेल थीफ में फिल्माया एक पुराना गीत बज उठा है-
रात अकेली है, बुझ गए दीए,
आ के मेरे पास… कानों में मेरे
जो भी चाहे कहिए….
जो भी चाहे कहिए…

आशा जी कागाया यह मधुर गीत शहद की तरह घुल रहा है। मुझे अपनी कहानी की नायिका की याद आ रही है। कहां होगी वह? यूं ही नीलाभ के कानों में वह गुनगुना उठती थी। … सहसा डॉ. अनामिका का संदेश मोबाइल स्क्रीन पर चमक उठा है-फीवर हो गया है मुझे। गला भी खराब है। सीजनल फ्लू है। मैंने पूछा-दवा लोगी, तो उसका जवाब है, कल रात ही तो पैरासिटामोल ली है। …डॉक्टर होकर लापरवाही करती हो, मैंने नाराज होकर लिखा। इस पर अनामिका का अगला मैसेज स्क्रीन पर चमका- कल सुबह समंदर किनारे टहलने निकल गई थी। आपको पता है न मैं समंदर की लहरें गिनती हूं। आपका भेजा संगीत सुनती हूं। देर तक वहीं बैठी रही। आप चिंता मत कीजिए। मैं ठीक हो जाऊंगी। मैंने जवाब दिया- हां। आत्मविश्वास रखो। तुम हो तो सब कुछ है। शायद वह भावुक हो गई है। कोई जवाब नहीं…।

मैंने विमल जी को म्यूजिक बंद करने के लिए कहा है। आशा जी का स्वर दिल को छू गया है। अकेली रात देह में उतर आई है। मैने यह गीत यू-ट्यूब से उधार लेकर डॉ अनामिका को शेयर कर दिया है। कुछ देर में स्माइली के साथ उसका जवाब आ गया-वॉव। ग्रेट। विल लिसेन। … दिल उदास है। दूसरों को हौसला देने वाले जब खुद हारने लगते हैं तो डर लगने लगता है। मेरे कुछ साथियों को देर रात तक नींद नहीं आती। उन्हें भविष्य की चिंता सताने लगी है। दिमागी काम करते-करते बदन जवाब देने लगा है।

…साठ-सत्तर की स्पीड पर कार दौड़ रही है। गलियों और मोहल्लों में दिखने वाले कुत्ते मुख्य सड़कों पर आ गए हैं। कुछ तो बीच सड़क पर बैठे दिख रहे हैं तो कुछ बेखौफ आराम फरमा रहे हैं उस सड़क पर, जिस पर कुछ दिनों पहले तक भारी-भरकम गाड़ियां दौड़ रही थीं। … अचानक एक कुत्ता हमारी गाड़ी के सामने आ गया है। उसे बचाने के फेर में विमल जी ने ब्रेक लगाई है। सड़क पर रगड़ खाती उनकी नई कार और ब्रेक की चीख दूर तक पसर गई है। रात थोड़ी और सहम गई है। खामोश सड़क पर आज मुझे पहली बार डर लगा है…।

मैंने गाड़ी के अंदर की लाइट जला ली है। अपने अखबार के पन्ने पलट रहा हूं। सातवें पेज पर राजनीतिक चिंतक और संपादक मुकेश भारद्वाज जी का आलेख है… मरकज-ए-मरघट। संक्रमण के बाद की तमाम लापरवाहियों पर उनका बेबाक चिंतन बहुत कुछ सोचने को विवश कर रहा है। सहसा ही मुझे सड़क पर कामगारों से अपील वाला एक होर्डिंग दिखा है। मगर जिनके लिए यह लगाया गया, वे तो जा चुके हैं। … इस समय गहरी नीली स्याह रात है और छापेखाने की काली स्याही में मुकेश जी के लिखे अक्षर आंखोंं के आगे उभर रहे हैं-

‘‘…दिल्ली में जब राजमार्गों से होते हुए मजदूरों का काफिला अपने गांव की पगडंडी तक पहुंचने को हुआ तो राजधानी की सूनी सड़कों पर सरकार ने होर्डिंग लगाए। जब आसन्न भुखमरी की मार के डर से पैदल ही गांव की ओर बेदखल हुए तो शहर की सड़क पर लोगों से दिल्ली छोड़ कर न जाने की अपील की गई थी। कारवां गुजर जाने और गुबार से उबर जाने के बाद यह होर्डिंग बताता है कि जनता के अधिकारों का नाशक बनने के बाद सरकार उनके साथ कैसे कीटों जैसा व्यवहार करती है।’’

राज तथा समाज के खोललेपन की तस्वीर उकेरने वाले इस आलेख को पढ़ने के बाद दिल डूब रहा है इस स्याह रात में। रास्ते में न जाने कितने पुलिस अवरोधक आए मगर हमें रोका नहीं गया। गाड़ी पर प्रेस लिखा है। कर्फ्यू पास लगा है। मैंने सफेद मास्क पहन रख रखा है। शायद इसी वजह से। …रास्ते में हमें एक भी निजी वाहन नहीं दिख रहा। अलबत्ता, इक्का-दुक्का मालवाहक ट्रक जरूर दिख रहे हैं। लगातार ड्यूटी के बाद पुलिसकर्मी भी थक गए हैं। अवरोधक के किनारे कुर्सी खींच कर बैठे दिख रहे हैं। मोबाइल ही उनका सहारा है परिवार से संपर्क का और कुछ मनोरंजन का भी।

बीच सड़क पर आवारा पशुओं को बेधड़क सामने से आते देख कर विमल जी ने गाड़ी की रफ्तार कम कर दी है। ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा। सोचिए जरा, ऐसा दौर भी तो नहीं देखा हम सब ने। मगर हौसला बाकी है इस संकट के अंधकार का मुकाबला करने के लिए। हम उम्मीदों की रोशनी से लड़ेंगे। कुछ देर पहले ही देश ने सामूहिक शक्ति का अहसास करा दिया है।

…हमारी गाड़ी आजादपुर स्टेशन के सामने से गुजर रही है। वही स्टेशन जहां से हर रोज मेरी यात्रा शुरू होती रही है। यहां सब कुछ यथावत है। सीढ़ियों से लेकर प्लेटफार्म तक रोशनी है। अगर कोई नहीं है तो मेट्रो का इंतजार करते यात्री। स्टेशन के बाहर थोड़ा आगे फलों के ठेले इधर उधर लुढ़के पड़े हैं। फल खरीदने वाले ग्राहक घरों में हैं। कुछ और आगे चाय की और हलवाई की दुकानों पर ताले जड़े हैं।

घर के नजदीक पहुंच गया हूं। गाड़ी से उतर रहा हूं। देख रहा हूं कि हर घर के आगे दीप झिलमिला रहे हैं। यकीन है कि इस लंबे अंधकार के बाद सुबह होगी। फिलहाल अकेली रात का दामन मैंने थाम लिया है। वह साथ चल रही है। इतनी अकेली तो यह पहले कभी नहीं लगी। वह अपने सूरज के इंतजार में गुनगना उठी है-

…सुलगते सीने से धुआं सा उठता है
लो अब चले आओ के दम घुटता है…

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