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द लास्ट कोच: मैं फिर आऊंगी

मेट्रो इशारा कर रही है कि हम जल्द मिलेंगे। तुम जल्दी मत मचाओ। बस इंतजार करो। जिंदगी से उसी तरह मोहब्बत करो। जैसे पहले करते थे। जीवन से भागो मत। जिसे भागना है उसे भागने दो। मेट्रो मुझसे अकसर यूं ही बात करती है। जीवन, दर्शन और प्रेम की बातें। वह एक आधुनिक नायिका है। चांदी सा बदन है उसका। पीले, नीले और गुलाबी दुपट्टे में वह खूब फबती है। वह मचलती है, इठलाती है। मगर संयम में रहती है। वह अपने सारे रूप दिखाती है। मगर वह अपनी गरिमा में रहती है। वह उम्मीदों की और इंतजार की प्रेम कहानी है। उसके सीने में जाने कितने युगलों की प्रेम कहानियां हैं। पढ़िए कोरोना काल में मेट्रो से बिछड़ गए द लास्ट कोच के लेखक संजय स्वतंत्र की नई शृंखला।

metro, metro train cartoon, cartoonयह स्‍केच इरफान की कलम-कूची का कमाल है।

मार्च से हम जुलाई पार कर रहे हैं। सभी ने धीरज और संयम से ये दिन काटे हैं। घर में सुरक्षित रहते हुए खुद को बचाया तो दूसरों को भी। मगर अब आर्थिक दुश्वारियां सामने खड़ी हैं। कई परिवार इससे निपटने की क्षमता रखते हैं, मगर लाखों-करोड़ों परिवारों के लिए यह आसन्न संकट हैं। आप निरापद रहें, यह कौन नहीं चाहेगा। मगर घर बैठ कर घर कैसे चलेगा? इस सवाल का जवाब तो किसी के पास नहीं। आय का न कोई दूसरा साधन है न कोई मोटी बचत। लाखों मजदूर जो शहरों-महानगरों से घर लौट गए थे, उनके सामने दोहरा संकट है। अगर वे फिर लौटते हैं तो पहले जैसा काम या उतनी पगार मिलेगी कि नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं। उनके बच्चों का क्या होगा? लिहाजा सबकी नींद उड़ गई है। कैसे दिन कटेंगे? कब हम इस दौर से मुक्ति पाएंगे?

जो शहरों में रह गए हैं कि उनके सामने थोड़े में गुजारा करने की चुनौती है। मगर कब तक? यह एक बड़ा सवाल है। महंगाई की वजह से पहले भी अपनी ख्वाहिशों का गला घोंटते रहे थे, लेकिन अब तो छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी आम शहरियों को सोचना पड़ रहा है। आप पूछेंगे कैसे? तो किसी दिन बाजार जाकर देखिए। दुकानदारों से बात कीजिए। वे बताएंगे कि वे दुकान खोलने का बुनियादी खर्च भी नहीं निकाल रहे हैं। वजह साफ है कि ग्राहक उतनी संख्या में नहीं आ रहे। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि ये चीज हम बाद में खरीद लेंगे। अभी ऐसी कोई जल्दी नहीं है।

मगर यकीन मानिए इस जल्दी-जल्दी में सब कुछ कर लेने या हासिल कर लेने का नतीजा आज हम भोग रहे हैं। ये तो कोरोना बीच में आ गया, नहीं तो आप कहां घर में टिकने वाले थे। वरना जिसे देखिए वह जल्दी में था। शुरू में ये निगोड़ा वायरस भी जल्दी में नहीं था। मगर देखिए कि वह कितनी जल्दी में है। वह संक्रमण के मामलों में इस देश को जल्दी ही नंबर एक पायदान पर बैठाने के लिए हलकान हुआ जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे आप सबसे आगे निकलने के लिए दूसरों को धकियाते हुए आगे बढ़ जाते थे। किसी को कुछ समझते ही नहीं थे। याद कीजिए उन दिनों को जब आप तेज रफ्तार गाड़ियां चला कर मौत को बुलावा देते थे। आज मौत खुद दरवाजे पर खड़ी है। कल तक हम शेर बन रहे थे, आज चूहे से ज्यादा बदतर हालत में हैं। सब अपने अपने बिल में घुसे पड़े हैं।

यह इसी जल्दी का परिणाम है। आपने कभी ठंडे दिमाग से काम नहीं लिया कि जीवन में इतना बेतहाशा खर्च करने की क्या जरूरत है। मगर… नहीं जी, हम तो एसी जरूर खरीदेंगे। नहीं जी हम तो कार जरूर खरीदेेंगे। नहीं जी हमें तो चाहिए ही। तो लो जी। खरीद लो। अब लोग ठन ठन गोपाल हैं। अब हमारे पास इतने पैसे ही नहीं बचे कि कोई जरूरी चीज भी खरीद सकें। घर का राशन-दूध-सब्जी और और आपकी जरूरी दवाइयां आ जाएं यही बहुत है।

देश के वो तमाम मजदूर भी जल्दी में थे। जो घर-परिवार खेत खलिहान छोड़ कर जल्दी में दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से लेकर सूरत, भोपाल, अमदाबाद और पंजाब व हरियाणा तक तक चले गए थे। कुछ सपने पूरे हुए तो कई अधूरे रह गए। देखते ही देखते एक ऐसी महामारी आई कि उन्हें जल्दी में शहर छोड़ कर पैदल ही खाली हाथ लौटना पड़ा अपने गांव। क्या मिला उन्हें? पैरों में छाले और आंखू में आंसू। न शहर वालों ने मदद की और न अब गांवों में जीने का दूर तक सहारा है। जाहिर है वे देर-सवेर फिर लौटेंगे। कब तक पड़े रहेंगे घरों में।

दरअसल, हम सब जल्दी में हैं। हम सब चाहते हैं कि ये मुआ कोरोना जल्दी से भाग जाए। मगर कोरोना जल्दी में नहीं है। वह अपनी गिनती बढ़ाने की जल्दी में है। वह रोज सुबह और रात में बैठ कर गिनती करता है और हमें डराता है। हमारी रातों की नींद उड़ जाती है। हमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता इन दिनों। मोहल्ले में जो लोग चौधरी बनते थे, उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम है। मुंह पर गमछा लगाए मुंह चुराते दिख रहे हैं। उधर अमेरिका जैसे इंटरनेशल चौधरियों की हवा निकली हुई है। ये सब जल्दी में थे। अब उनसे कुछ कहते नहीं बन रहा।

लेकिन हम क्यों जल्दी में हैं? अब तो विराम लगाइए इस भागमभाग में। …कम से कम मुझे कोई जल्दी नहीं है। मैं पैदल निकल गया हूं दूर तक। एक लंबे पुल को पार करते हुए ठीक सामने परीक्षण के लिए चल रही मेट्रो को देख रहा हूं। आखिर वह भी कब तक बैठी रहेगी। वह एक सधी हुई चाल से चलती है। वह बेहद अनुशासित है। समय हो या रफ्तार। सोचता हूं कि लोग इससे जीवन की एक निश्चित लय में चलना क्यों नहीं सीखते। क्यों नहीं समय का अनुशासन सीखते। धीमी गति से जा रही मेट्रो के लास्ट कोच को ध्यान से देख रहा हूं। इस कोच में बैठ कर मैंने लोगों की जिंदगी को कागज पर उतारा है।

मेट्रो इशारा कर रही है कि हम जल्द मिलेंगे। तुम जल्दी मत मचाओ। बस इंतजार करो। जिंदगी से उसी तरह मोहब्बत करो। जैसे पहले करते थे। जीवन से •ाागो मत। जिसे भागना है उसे भागने दो। मेट्रो मुझसे अकसर यूं ही बात करती है। जीवन, दर्शन और प्रेम की बातें। वह एक आधुनिक नायिका है। चांदी सा बदन है उसका। पीले, नीले और गुलाबी दुपट्टे में वह खूब फबती है। वह मचलती है, इठलाती है। मगर संयम में रहती है। वह अपने सारे रूप दिखाती है। मगर वह अपनी गरिमा में रहती है। वह प्यार करती है मुझसे, आपसे… सबसे। वह अपनी जिम्मेदारी नि•ााते हुए निरंतर चलती रही है। वह उम्मीदों की और इंतजार की प्रेम कहानी है। उसके सीने में जाने कितने युगलों की प्रेम कहानियां हैं। जिन्हें मेरे कानों में फसफुसा कर सुनाती रही है।

मैं उससे कह रहा हूं-तुम मुझे भूूल गई होगी। उसने कहा-नहीं। जो दिल में रहते हैं उसे भूूलते नहीं हैं। उन्हें याद करने की भी जरूरत नहीं। क्योंकि वे यादों में ही तो बसे होते हैं। सुनो न, मैं देर तक जागती रहती हूं। यार्ड में पड़ी रहती हूं। नींद नहीं आती, लेकिन मेरे लिए न चांद निकलता है न सूरज। मगर मैं फिर लौट कर आऊंगी। जब तुम मिलोगे तो फिर गले लगाऊंगी। तुम जल्दी में मत रहना। भूूल मत जाना मुझे।

मेट्रो मेरी आंखों से ओझल हो रही है। मैं प्रिया के अनंत इंतजार में डूबे प्रेमी की तरह उसे जाते हुए देख रहा हूं। … ढलान पर कदम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। मगर मुझे जल्दी नहीं है। आपको जल्दी होगी। … इस बीच मोबाइल फोन की घंटी बज उठी है। पिछले चार महीने से कोरोना से दो-दो हाथ कर रहे जन स्वास्थ्य चिकित्सक डॉ. एके अरुण की यह कॉल है। वे पूछ रहे हैं- आप जल्दी में तो नहीं। मैंने कहा, नहीं। बस पैदल चल रहा हूं। जरा मेट्रो स्टेशन तक टहलते हुए जा रहा हूं। उन्होंने कहा, आप आज भी पैदल या रिक्शे में चलते हैं? … क्या करूं मैं जल्दी में नहीं हूं। मगर इस दुनिया को बहुत जल्दी है, मैंने कहा तो उनका जवाब था, जी, जिसे देखिए वह जल्दी में है। कोरोना इतनी जल्दी में था कि उसने पूरी दुनिया ही नाप ली। जनता को भी जल्दी है, तो सरकार भी जल्दी में है। सब जल्दी में है। विकास भी जल्दी में था तो परलोक पहुंच गया। मगर हम सब का विकास जल्दी में नहीं। कोरोना काल में वह बैठ गया है। उसे अब कोई जल्दी नहीं।

पैदल चलते हुए डॉक्टर साहब से बात कर रहा हूं। वे कह रहे हैं कि दवा कंपनियां भी जल्दी में हंै। वे दुनिया भर के बाजार को कब्जे में लेने की हड़बड़ी में हैं। उन्हें नोट कमाने की जल्दी है। मगर लोग जल्दी में न रहें तो अच्छा है। मैं कहता हूं कि तसल्ली से हाथ धोइए। किसी काम से निकलने से पहले हड़बड़ी मत दिखाइए। आराम से चेहरे पर मास्क या गमछा डालिए, फिर निकलिए। ऐसी भी क्या जल्दी है। डरिए मत। कम से कम छह दिन या दस दिन में संक्रमित लोग ठीक हो रहे हैं। कोई जल्दी नहीं है। हमारे पास वैकल्पिक दवाएं हैं। इसलिए सहज रहें। तनाव मुक्त रहें। …तभी डाक्टर साहब के क्लीनिक में कोरोना का कोई मरीज आ गया है। उन्होंने कहा, इस पर बाद में चर्चा होगी। फिर मिलते हैं।

मैं अभी मेट्रो स्टेशन के गेट के पास पहुंच गया हूं। प्रवेश द्वार के सभी दरवाजे बंद हैं। सीमेंट की छोटी सी दीवार पर वहीं एक निराश प्रेमी की तरह किनारे बैठ गया हूं। परीक्षण परिचालन के लिए चल रही मेट्रो चुपके से आकर पुल पर रुक गई है। चांदी जैसे बदन पर उसका पीला दुपट्टा लहरा रहा है। वह मुस्कुराते हुए कह रही है- तुम बहुत जिद्दी हो। इतनी दूर पैदल क्यों चले आए यहां। तुम्हें पता है न कि सभी दरवाजे बंद हैं तुमसे मिलने के। इतने बेसब्र क्यों हो रहे हो। मैं कहां जाऊंगी तुम्हें छोड़ कर। यह दौर भी निकल जाएगा। उदास मत होओ। मैं फिर आऊंगी…बहुत जल्दी आऊंगी। वह मुझे दिलासा दे रही है। लास्ट कोच से उसने अपना हाथ लहराते हुए अलविदा कहा है। मैंने उसे अपनी आंखों में भर लिया है। उसे जाते देख कर मेरे मन में यही भाव उमड़ रहे हैं-

रूकोगी न थकोगी
न मुड़ कर तुम
पीछे देखोगी अतीत,
फिर से नई दुनिया रचने
बढ़ोगी हमेशा आगे
लेकर उम्मीदों का दीप।

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