हिंदुस्तान के नक्शे पर मणिपुर की खास जगह है। प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से यह अद्वितीय है। यहां की लोककथाएं प्रकृति, प्रेम, वीरता और अध्यात्म से जुड़ी हुई हैं। ऐसी ही एक कथा है खंबा और थोइबी की। इस एक कथा में मणिपुर की अद्भुत संस्कृति का सार मिल जाता है। इस लोकथा का जन्मस्थल प्राचीन मोइरांग राज्य माना जाता है। जानकार दावा करते हैं कि इस कथा का उद्गम बारहवीं सदी के आसपास हुआ होगा।

खंबा एक गरीब लड़का था, जिसके माता-पिता नहीं थे। उसका पालन-पोषण उसकी बड़ी बहन खाम्नु ने किया। खंबा बहादुर और विनम्र था। एक उत्सव के दौरान खंबा की मुलाकात राजकुमारी थोइबी से होती है। पहली ही नजर में दोनों को एक-दूसरे से प्रेम हो जाता है। जब थोइबी के पिता को इसके बारे में पता चला तो वे बहुत नाराज हुए। राजघराने के अन्य लोग भी इस बेमेल रिश्ते के खिलाफ खड़े हो गए। उनके लिए सबसे बड़ी आपत्ति खंबा की गरीबी थी।

वहां का एक दरबारी कोंगयांबा भी थोइबी से विवाह करना चाहता था। वह खंबा को थोइबी की जिंदगी से निकालने की तरकीब लगाने लगा। मोइरांग में एक जंगली बैल ने आतंक फैला रखा था। राजा ने घोषणा की कि जो जंगली बैल पर काबू पाएगा उसे ही सच्चा वीर माना जाएगा।

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कोंगयांबा बैल को काबू करने के लिए आगे आया, लेकिन जल्दी ही डर कर पीछे लौट गया। तभी खंबा मैदान में उतरा और बड़ी बहादुरी से जंगली बैल पर काबू कर लिया। खंबा की वीरता के इस प्रसंग को मणिपुर के लोकगीतों में भी स्थान मिला। खंबा अपनी बहादुरी, विनम्रता व ईमानदारी से राजा और राजघराने के अन्य लोगों का दिल जीतने में जुटा रहा। लेकिन वह खुद को थोइबी के योग्य साबित करने में नाकाम ही रहा।

खंबा के साथ विडंबना यह हुई कि एक दिन थोइबी ने भी उसकी वीरता की परीक्षा लेने के बारे में सोच लिया। वह खंबा के सामने चुनौती प्रस्तुत करती है। गलतफहमी में थंबा की मृत्यु हो जाती है। थंबा की मृत्यु के बाद थोइबी को अपनी गलती का अहसास होता है। खंबा की मौत के शोक में थोइबी भी अपने प्राण त्याग देती है।

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खंबा और थोइबी की जोड़ी को मणिपुर के रोमियो-जूलियट कहा जाता है। ईर्ष्या, सामाजिक गैरबराबरी, साजिश, अपनी प्रेमिका द्वारा ही परीक्षा लिया जाना, इस दुखांत कहानी को कई रंग देते हैं। दुनिया की कई प्रेम कहानियों की तरह खंबा और थोइबी मरने के बाद अमर हो जाते हैं। ये दोनों किरदार मणिपुरी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं।

खंबा थोइबी नृत्य मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य की प्रसिद्ध शैली है। राज्य के स्कूलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसका मंचन किया जाता है। मणिपुर के मोरांग क्षेत्र में इस कथा से जुड़े पारंपरिक उत्सव उल्लास से मनाए जाते हैं। थंबा और खोइबी के गीत प्रेम की परीक्षा का सार बताते हैं।