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मैं रचने लगा एक नई कविता फिर से, तुम्हारे लिए

संजय स्वतंत्र की कविता

प्रतीकात्मक चित्र

मेरी स्मृतियों में तुम

मैं आज भी भटकता हूं
उस सुनसान महल में,
जहां खिलखिलाती थी
एक सुंदर राजकुमारी।
अब वहां विशाल प्रांगण में
बचे हैं तीन कुएं,
जिसकी एक मुंडेर पर
बैठ कर करता हूं
उसका इंतजार।
कई कालखंडों को पार कर
जब आई तुम,
उस एक कुएं का जल
रीत चुका था-
वह था मेरा बचपन।
मुझमें पहले जैसी
मासूमियत लाने के लिए
तुमने भर देना चाहा
उसे स्नेह-जल से
ताकि खिलखिला सकूं मैं
मासूम बच्चे की तरह।
दूसरे कुएं को देख
उदास हो गई थी तुम
क्योंकि-
सूखने लगा था
जल उसका भी,
जिसे सहेजने का
जतन कर रहा था मैं
अपनी जिजीविषा से-
वह थी मेरी गोधूलि बेला।
तब तुमने अपनी
गुलाबी हथेलियों में
समेट लिया-
मेरा ढलता हुआ सूरज।
तुमने निहारा जब
तीसरे कुएं को,
उतर आया मेरा शेष जीवन
तुम्हारे चेहरे पर,
सदियों ने कर दिए
तुम्हारे ललाट पर हस्ताक्षर।
तुम्हारी आंखों के नीचे
स्याह हो गए घेरे में
उतर आया मैं।
कुएं के पास ठूंठ हो गए
उस पेड़ के नीचे
दिख रही थी मुझे
खुद से जद्दोजहद करती
एक उदास राजकुमारी।
तुम जानती थी कि
ठूंठे पेड़ पर लटका है
मेरे जीवन का अंतिम प्रहर।
उसकी ओर बढ़ने से
मुझे रोक लिया तुमने
और कहा-
उसे मत देखो तुम,
मैंने इसे अपने पुण्य-जल
से सींच दिया है।
फिर तुमने पारिजात-पुष्प को
अपनी अंजुरी में भर कर
उछाल दिया तीसरे कुएं में
और मेरे अश्रु-बूंदों को
पी लिया अमृत समझ।
यह देख मुस्कुरा उठे
प्रांगण में स्थापित कुलदेवता,
गंधर्व लोक से
उतर आर्इं अप्सराएं
तुम्हारे कोमल चरणों को
चूमने के लिए।
तुम्हारे मजबूत कंधे पर
आ बैठी गुलाबी चिड़िया,
गाने लगी शाश्वत प्रेम का गीत।
यह स्वप्न है या यथार्थ
मालूम नहीं मुझे,
मगर तुम उतरने लगी
मीठी रस-धारा के साथ
मेरे बियावान मन में।
मैं रचने लगा
एक नई कविता
फिर से तुम्हारे लिए।
जब तंद्रा टूटी तो
याद नहीं रहीं पंक्तियां
याद रही तो सिर्फ तुम
याद रहे वो तीन कुएं
जिसकी एक मंडेर पर
अब भी बैठा हूं मैं
और-
प्रेम-रस से सराबोर
तुम्हारे चेहरे को
याद कर रहा हूं।

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