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नृत्य : कथक में पारलौकिक संसार का चित्रण

कथक में परंपरागत बंदिशों, ठुमरी, दादरा, कविता के इतर नई रचनाओं और नई कविताओं को भी कुछ कलाकार नृत्य में पिरो रहे हैं। यह नृत्य को नई संभावनाओं और नए दर्शकों से जोड़ता है।

कत्थक करती युवतियां

कथक में परंपरागत बंदिशों, ठुमरी, दादरा, कविता के इतर नई रचनाओं और नई कविताओं को भी कुछ कलाकार नृत्य में पिरो रहे हैं। यह नृत्य को नई संभावनाओं और नए दर्शकों से जोड़ता है। ऐसा कथक नृत्यांगना रचना यादव मानती हैं। पिछले दिनों एपी सेंटर में आयोजित हम कदम-2016 में उनकी शिष्याओं ने नृत्य पेश किया।

बकौल नृत्यांगना रचना यादव इंसान जिंदगी में कई अनुभवों से गुजरता है। इस दौरान वह अपनी डायरी के पन्नों में कई तरह के राज को दर्ज करता है। कभी रिश्तों की मिठास, कभी अकेलेपन की खामोशी, कभी खुद से संवाद और कभी अपने आस-पास की चीजों से संवाद कायम करता है। खुद रचना ने भी कल्पना, आभास और यथार्थ से रूबरू होती जिंदगी की कहानी को नृत्य में पिरोया है। जिंदगी की इन्हीं राहों के जरिए नृत्य रचना ‘स्वराह’ में नृत्यांगना ने अपनी यात्रा और उसके पड़ावों को प्रस्तुत किया। इसे काफी सराहना मिली। शायद, इसी उत्साह से प्रभावित होकर रचना ने नई नृत्य परिकल्पना नौ ग्रह की है। इसे उनकी शिष्याओं ने पेश किया।

इस नृत्य रचना के पीछे कोरियोग्राफर और नृत्यांगना रचना का मानना है कि जब हम आकाश की तरफ देखते हैं, तब हमें सूर्य, चांद और सितारे ही दिखते हैं। पर, नौ ग्रह जो हमारे जीवन और व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं, वह नजर नहीं आते। इसकी संगीत परिकल्पना समीउल्लाह खां ने की। संगत कलाकारों में शामिल थे-तबले पर किशोर गंगानी, पखावज पर महावीर गंगानी, सारंगी पर नफीस अहमद और पढंत पर रचना यादव। गायक महेंद्र सोनागर और सिराज ने गीतों, श्लोकों और ठुमरी को सुरों में पिरोया।

नृत्य परिकल्पना ‘नौ ग्रह’ का आरंभ संवाद से होता है। इसमें आकाश और अंतरिक्ष पिंडों की उपस्थिति और प्रभाव का जिक्र होता है। यहीं सूर्य और नौ ग्रह की वंदना श्लोक में शिष्याओं ने पेश किया। यह श्लोक ‘ओम सूर्याय नम:’ पर आधारित थी। हम खुले आसमान में झिलमिलाते तारों को ही देख पाते हैं। इसके लिए सरगम और रचना-‘जगमग दीप जले हों जैसे’ का चयन किया गया था। नृत्य के क्रम में तिहाई, टुकड़ों, चक्कर, चलन और उठान को नृत्य में मोहक अंदाज में पिरोया गया। परमेलू ‘त्राम-थेई-तत्-तत्-थेई’ और ‘त्राम-थेई-थेई-तिगदा-तिगदा-थेई’ का मोहक प्रयोग नृत्य में दिखा।

अगले अंश में वृहस्पति, शुक्र, बुद्ध, मंगल, शनि, राहू, केतु और चंद्रमा के स्वरूप और उसका इंसान के व्यक्तित्व व जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को दर्शाया गया। ज्ञान, करियर और शिक्षा को वृहस्पति ग्रह प्रभावित करता है। इसे दर्शाने के लिए वृहस्पति श्लोक ‘देवानामच ऋषिनाम’ और गुरु स्तुति ‘गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु’ को चुना गया था। शुक्र ग्रह सौभाग्यवान और सुख देता है। इसे ठुमरी ‘सुंदरी सेज सवार के’ के माध्यम से निरूपित किया गया। गणित में निपुणता बुद्ध ग्रह से आती है। इसे गिनती की तिहाइयों के जरिए जोड़, गुणा, भाग को दर्शाया गया। इस अंश में कथक की तकनीकी बारीकियों को खासतौर पर उभारा गया। युद्ध के देवता मंगल ग्रह को माना जाता है। कृष्ण और अर्जुन के संवाद को इसमें दर्शाया गया। महाभारत युद्ध से पूर्व कृष्ण अर्जुन को कर्म का संदेश देते हैं। यह अंश ताल पर आधारित थी। इसमें पैर के काम को प्रमुखता से उभारा गया था। नवग्रह के मंत्र पर यह अंश आधारित था। शनि ग्रह के प्रभाव को समकालीन नृत्य के जरिए निरूपित किया गया। राहू-केतू के प्रभाव को चक्करों के जरिए दो नृत्यांगनाओं ने दर्शाया। वहीं सूर्य को सूर्य मंत्र के जरिए मायरा खन्ना ने चित्रित किया। उन्होंने धमार ताल में चक्रदार तिहाइयों और टुकड़ों को पेश किया। गजल ‘यूं लग रहा है पिघल रहा है चांद’ में भावों को दर्शाया गया।

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