पिछले कई दिनों से एक खास तरह की खबर लोगों को परेशान करती है। अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपति की मौत के कई दिनों बाद पड़ोसियों को जानकारी होती है, जब घर से बदबू आनी शुरू हो जाती है। ज्यादातर मामलों में ये संपन्न परिवारों की कहानी होती है, जिनकी संतानें विदेशों में रहती हैं और मां-बाप की सुध लेना भूल जाती हैं। इस प्रवृत्ति पर सरकार से लेकर अदालत तक में चिंता जताई जा चुकी है। अकेले रह रहे बुजुर्गों की देखभाल के लिए निर्देश भी जारी हो चुके हैं।

इस खौफनाक परिदृश्य का एक पहलू और भी है। बात गाजियाबाद के एक परिवार की है। उस परिवार के पहले बेटे ने अमेरिका में अपना ‘करियर’ बनाया और अपने परिवार के साथ वहीं बस गया। छोटे बेटे में प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी। लेकिन वह माता-पिता को लेकर भावुक था। उसने वहीं गाजियाबाद में ही एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली। छोटे बेटे को लगा कि उसके मां-बाप इस बात से खुश होंगे कि उसने अपने ‘करियर’ से ज्यादा उनकी सेवा करने की सोची। लेकिन उसके मां-बाप दिन भर उसे ताना देते रहते कि वह अपने बड़े भाई जैसा क्यों नहीं बन पाया। यहां तक कि छोटे बेटे की पत्नी के सामने उसे निकम्मा और काहिल कहने लगे।

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मां-बाप को समाज में शर्मिंदगी होती कि उनका बेटा एक साधारण सी नौकरी करते हुए उनके साथ रह रहा है। एक दिन उन्होंने छोटे बेटे से कह दिया कि वह अपनी पत्नी के साथ अलग किराये के मकान में रह ले। इससे सबको ज्यादा आजादी महसूस होगी।

अभिभावकों का बड़ा तबका ऐसा है, जो बच्चों के संदर्भ में सफलता के अलावा कुछ और कबूल नहीं करना चाहता है। न परीक्षा में कम नंबर और न ही साधारण सी जीवन निर्वाहक नौकरी। बच्चे में परिवार को लेकर संवेदनशीलता भी उन्हें नहीं भाती। यही छवि बनाई जाती है कि जो बच्चा पढ़ाई-लिखाई या अन्य प्रदर्शन में कमजोर होता है, वही साथ रहकर माता-पिता की सेवा करना चाहता है। इसे उसके मानवीय गुण नहीं बल्कि पलायन के रूप में देखा जाता है।

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कई घरों में मां-बाप अपने बच्चों के ‘करियर’ की तुलना करते रहते हैं। कम पैसे कमाने वाले को नीचा दिखाते रहते हैं। कम कमाने वाले बेटे की पत्नी अगर सास-ससुर की देखभाल अपना कर्तव्य मान कर करती है तो उसे मजबूरी के तौर पर देखा जाने लगता है कि इसके पास हमारी देखभाल करने के अलावा विकल्प क्या है।

विदेश में बैठे ज्यादातर लोगों की कहानी के पीछे उनके मां-बाप का संघर्ष होता है, उन्हें यहां तक पहुंचाने के लिए कितनी मेहनत की। इस मेहनत में वे यह जांचना भूल जाते हैं कि बच्चे में मानवीय मूल्य कितने बचे हैं। हमने उन्हें सिर्फ सफल होने की मशीन की तरह तो नहीं आंका है? और जो संतान कथित कम सफलता के साथ आपके साथ ही रहना चाहती है उसे आप किन नजरों से देखते हैं। जरूरी नहीं है कि बाजार के मानकों पर तय सफलता बच्चों में मानवीय मूल्य भी पैदा करे।