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“जो यह धूल जितनी हटाता रहेगा, वह उतना ही खुश रहेगा”

दयाशंकर मिश्र की हाल में प्रकाशित किताब "जीवन संवाद" का अंश: रेत के टीले तो बदलते रहते हैं, लेकिन रेगिस्‍तान कभी नहीं बदलता. इसी तरह माता-पिता, पति-पत्‍नी, दोस्‍तों का प्‍यार भी नहीं बदलता. हां, उस पर वक्‍त की धूल जमा हो जाती है, बस उसे हटाना है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

किसी भी रिश्‍ते में माफी को स्‍वीकार करना इतना भी मुश्किल नहीं है. जितना इन दिनों देखने को मिल रहा है. बस कुछ पल इस छोटी भावुक, प्रेरक कहानी को दे दीजिए..

बेटे की गलती से बिजनेसमैन पिता को काफी नुकसान हुआ. नाराज पिता ने बेटे को कुछ कड़वी बातें कह दीं. बेटा रूठकर शहर चला गया. कई साल बीत गए. उसे गलती का एहसास हुआ. लौटने का मन बना. लेकिन पिता की कठोरता का डर बाकी था.

उसने चिट्ठी लिखी, ‘मैं घर आ रहा हूं, अगर मुझे आपने माफ कर दिया हो तो स्टेशन के पास ही जो पीपल है, उस पर एक झंडा लगा दीजिएगा. अगर झंडा मिला तो मैं स्‍टेशन पर उतर जाऊंगा, नहीं तो सीधे निकल जाऊंगा’.

स्‍टेशन पास आने पर उसने खिड़की के पास बैठे यात्री को सारी बात बताते हुए कहा, ‘अगर पीपल पर झंडा न हो, तो मुझे बता देना. मैं नहीं उतरूंगा’.

स्‍टेशन पास आते ही उस यात्री की आंखें नम हो गईं, वह भावुक हो गया. घर लौटने वाले ने पूछा, क्‍या हुआ.

यात्री ने आंखों की नमी को रूमाल का सहारा देते हुए कहा, ‘पीपल दिखाई ही नहीं दे रहा, वहां इतने झंडे लगे हैं, तुम जल्‍दी से उतरने की तैयारी करो, गाड़ी यहां बहुत कम समय के लिए रुकती है’.

रेगिस्तानी इलाकों में अक्सर कहा जाता है, ‘रेत के टीले तो हवा से इधर-उधर बदलते रहते हैं, लेकिन रेगिस्‍तान कभी नहीं बदलता’. इसी तरह माता-पिता, पति-पत्‍नी, दोस्‍तों का प्‍यार भी नहीं बदलता. हां, उस पर वक्‍त की धूल जमा हो जाती है, बस उसे हटाना होता है.

जो यह धूल जितनी हटाता रहेगा, वह उतना ही खुश रहेगा. क्षमा, माफी जीवनशैली है. जबकि ऐसा नहीं कर पाना, उस बोझ, चिंता को उठाए घूमना ‘दूसरे’ की गलती के लिए खुद को सजा देने जैसा है. यह ऐसी बीमारी है, जो सबसे अधिक नुकसान माफ कर पाने वाले को ही पहुंचाती है.

एक ही शहर में रहते हुए, एक-दूसरे के इतने पास होते हुए. तुम कभी उससे मिले नहीं. कभी ऐसा नहीं लगा कि तुम्‍हें उससे बात करनी चाहिए, जबकि तुम कितने अच्‍छे दोस्‍त थे.

विदेश से बरसों बाद लौटे दोस्‍त ने कॉफी हाउस में दूसरे से पूछा. ‘मैने सोचा तो बहुत लेकिन मैं उसे माफ नहीं कर पाया. स्‍कूल के अंतिम दिन का यह झगड़ा, आज तक हमारे बीच है’. उसने अनमने मन से कहा.

जिन दोस्‍तों का किस्‍सा आप पढ़ रहे हैं, वह दोनों चालीस पार के हैं. जिस उम्र में इनका झगड़ा हुआ था, अब उनके बच्‍चे जल्‍द ही इस उम्र में पहुंच जाएंगे.

दोनों अब तक बरसों पुराने विवाद को लादे फिर रहे हैं. यह बाहर से न दिखने वाला वजन है, लेकिन इसने दिमाग में जगह घेर रखी है. दिमाग में घेरी जगह का उपयोग सही काम के लिए न हो तो यह तनाव पैदा करेगा ही. यह उन दोनों ने एक-दूसरे के साथ ही नहीं किया है, बल्कि यह उनकी आदत में आ गया है.

अपनी इस माफ न कर पाने की आदत के कारण उनके दूसरों के साथ रिश्‍ते में भी बहुत परेशानियां हैं. दोनों का निजी जीवन संशय, दुविधा से घिरा है. इनमें से एक का तलाक हो चुका है, दूसरे का जीवन भी कम से कम सामान्‍य तो नहीं ही कहा जा सकता.

हमारी पहचान ही ‘माफ न करने वाले समाज’ के रूप में रही है. हमने स्‍कूल में शिक्षकों को माफी की जगह बच्‍चों को पीटते पाया. घर में यही काम बड़ों को करते देखा. जहां-जहां जिसके पास अधिकार है, उसका सजा पर सौ प्रतिशत,

माफी पर शून्य ध्‍यान है. इस तरह हम एक सजा प्रिय समाज की रचना करते गए.

इधर बीते दस साल में स्‍कूल का माहौल कुछ बदला है. शिक्षकों की हिंसा कम हो रही है. तो उम्‍मीद करनी चाहिए कि शायद हम बीस-तीस साल बाद कुछ बेहतर समाज बन पाएं. माफ न करने की आदत एक मनोविकार भी है. जब यह हमारे अंदर घर कर जाता है, तो इसकी पहुंच में बच्‍चे, दोस्‍त, रिश्‍तेदार, ऑफि‍स के सहकर्मी सब आ जाते हैं.

इसलिए माफी को स्‍वीकार करने की आदत बनाइए. माफ करना शुरू कीजिए, क्‍योंकि यह किसी दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने को खुश रखने, तनाव मुक्‍त रखने की दिशा में उठाया गया, सबसे जरूरी कदम है.

किताब : जीवन संवाद । लेखक: दयाशंकर मिश्र। कीमत : 300 । प्रकाशक : संवाद प्रकाशन ।  कहां मिलेगी: अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर।

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