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द लास्ट कोच: तमाचा

मैं इस वक्त लास्ट कोच में सफर कर रहा हूं। यह कहानी है मेरी मित्र डॉ. उज्ज्वला की सहेली सुनंदा की, जो इस समय बेहद खामोशी से राष्ट्र निर्माण में योगदान कर रही हैं। वे सुबह से रात तक जिले का प्रशासन संभालती हैं। शाम को फुर्सत निकाल कर गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं। रोज कविताएं लिखती हैं।

प्रतीकात्मक फोटो (Source: Pixabay)

मैं इस वक्त लास्ट कोच में सफर कर रहा हूं। यह कहानी है मेरी मित्र डॉ. उज्ज्वला की सहेली सुनंदा की, जो इस समय बेहद खामोशी से राष्ट्र निर्माण में योगदान कर रही हैं। वे सुबह से रात तक जिले का प्रशासन संभालती हैं। शाम को फुर्सत निकाल कर गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं। रोज कविताएं लिखती हैं। ……. अभी-अभी उज्ज्वला का फोन आया है। वह कह रही है कि आप हमेशा मेट्रो में कहानियां तलाशते रहते हैं। कई दिनों से आप लिख भी नहीं रहे। लीजिए आज मैं आप को कहानी सुना रही हूं……।

…….समय कैसा भी हो, वह गुजर जाता है। ललन बाबू ने दोनों बेटियों को मां से बढ़ कर प्यार दिया। दोनों को इस कदर काबिल बना दिया कि वे अपनी शादी को छोड़ कर बाकी सभी फैसले खुद कर सकती हैं। भारतीय समाज में बेटी का ब्याह किसी भी पिता के लिए नैतिक और अनिवार्य दायित्व है। जो इसे निभा चुके, वे जानते हैं। बेटी के हाथ पीले करने के बाद अकसर लोग आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। अब ललन बाबू की बारी आई है। वे इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते। लेकिन इस जिम्मेदारी को निभाते हुए वे बिखर जाएंगे या बेटियां उन्हें संभाल लेंगीं।

पिताजी की जमींदारी चली गई थी। फिर भी जमीन-जायदाद की कोई कमी न थी। अब भी सैकड़ों बीघा जमीन के मालिक थे ललन बाबू। ज्यादातर को बटाई पर देकर वे निश्चिंत रहते। सुकून से कला-साहित्य की किताबों में डूबे रहते। लिखने-पढ़ने का रूझान बचपन से उन्हें था। यों गांव की प्राथमिक पाठशाला के वे हैडमास्टर भी थे। लड़कियों की शिक्षा के महत्त्व को बखूबी समझते थे। ललन बाबू चाहते थे कि उनकी एक बेटी डाक्टर, तो दूसरी बेटी आइएएस बन कर उनका और गांव का नाम रोशन करें। उन्होंने बेटियों के मन में शुरू से ही उज्ज्वल भविष्य बनाने के सपने भर दिए थे। घर में कभी शैतानियां करतीं बेटियां, फुदकती चिड़िया की तरह आसमान में उड़ान भरने लगी थीं।

……. छोटी बेटी चंदा डाक्टर जरूर बन गई, मगर उसे इस मुकाम तक पहुंचाने में ललन बाबू को कई बीघा जमीन बेचनी पड़ी। वहीं बड़ी बेटी सुनंदा ने पिता पर बोझ डालना मुनासिब नहीं समझा। स्कूल-कालेज की सामान्य पढ़ाई करते हुए वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारियों में जुटी रही। उसकी मेहनत रंग लाई। इस परीक्षा में शीर्ष पर रहे उम्मीदवारों में वह दसवें नंबर पर रही। देश के उत्तर पूर्वी हिस्से के सुदूर जिले में डीएम का प्रभार संभालने से पहले ही वह सबकी कलक्टर बिटिया बन गई थी।

रिश्तेदार पीछे पड़ गए थे ललन बाबू के। दोनों बेटियां जवान हो गई हैं। कहीं खुद न शादी कर लें? क्या इज्जत रह जाएगी। ऐसी कई बातें कही जातीं उनसे। यह भी कि इतनी जमीन-जायदाद रहते बाबू साहेब बिन मां की बेटियों के हाथ भी पीले न कर सके। मगर यह तो ललन बाबू जानते थे कि खेती की कितनी जमीन हाथ से निकल चुकी है। पटना और आरा के दो मकान भी निकल चुके थे छोटी बेटी को डाक्टरी पढ़ाने में। यों दिल्ली में सुनंदा की आइएएस की कोचिंग कराने में भी कम खर्च नहीं हुए। लोग घर की बात क्या जानें? फिर भी ललन बाबू बची-खुची जमीन बटाई पर देकर और हैडमास्टरी की तनख्वाह से इज्जत बचाए हुए थे। इस बीच रिश्ते पर रिश्ते आ रहे थे। चंदा के लिए आइएएस लड़के का रिश्ता आया तो सुनंदा के लिए दिल्ली से डाक्टर लड़के का।

ललन बाबू सोच में पड़ गए। सुनंदा का सुझाव था कि पहले चंदा की शादी हो जाए। वैसे भी उसे एक साल के लिए ट्रेनिंग के लिए जाना है। दोनों रिश्ते जान-पहचान के थे। आइएएस लड़के के पिता दूर के रिश्ते के थे। मगर उनकी नजर जायदाद पर थी। ललन बाबू ने कहलवा दिया था कि अगर वे चार-पांच करोड़ नकद की उम्मीद कर रहे हैं तो यह रिश्ता न हो पाएगा। अलबत्ता वे शादी हैसियत से बढ़ कर करंगे। आखिर खानदानी परिवार है उनका। ज्यादा से ज्यादा पचास लाख नकद और बेटी को भरपूर जेवरात देंगे। बारातियों का शानदार स्वागत करेंगे। चाहें तो अपने पूरे गांव को न्योता दे दीजिए। मगर लड़के के पिता पूरी संपत्ति लिख कर देने के लिए दबाव डाल रहे थे।

उधर, सुनंदा ट्रेनिंग के लिए देहरादून चली गई थी। कुछ महीने बाद ललन बाबू ने उसे बिना बताए छोटी का रिश्ता पक्का कर दिया। वे चंदा की शादी की तैयारी में जुट गए। यही नहीं उन्होंने जायदाद का आधा हिस्सा भावी दामाद के नाम लिख दिया था। काफी मनाने पर समधीजी मान गए थे। यह आधी जायदाद भी दो करोड़ से कम की न थी। इसके अलावा पचास लाख नकद देने का भी इंतजाम कर लिया था ललन बाबू ने। नतीजा बैंक की एफडी भी तोड़नी पड़ गई। शादी की तैयारियां करते हुए कुछ महीने निकल गए। इन सारे खर्चों को लेकर सुनंदा से कभी बात नहीं की। यही सोच कर कि वह परेशान होगी। आखिर बाद में पता चल ही जाएगा। फिर वह यहां सब संभाल लेगी।

ललन बाबू ने लड़के वालों से समय मांग लिया था। उम्मीद थी कि तब तक सुनंदा का प्रशिक्षण पूरा हो जाएगा। फिर अफसर बिटिया का सहारा रहेगा। वे जानते थे कि सुनंदा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ रहती है। सादगी से शादी करने का दबाव डालेगी। मगर इस समाज का क्या किया जाए जिसने विवाह जैसे पवित्र यज्ञ को सौदा बना दिया है। हम कहां तक बच पाएंगे? ललन बाबू यही सोचते रहते। उन्हें रात-रात भर नींद नहीं आती। मगर उम्मीदों का सूरज कभी डूबता कहां है। वह फिर उग जाता है।

जैसा कि आप जानते हैं। समय अच्छा हो या बुरा, वह बदलता ही है। आखिरकार ललन बाबू के लिए भी अच्छा समय आ गया। उस रात सुनंदा का फोन आया-बाबा……ट्रेनिंग पूरी हो गई हमारी। सरकार का आर्डर आ गया है। एक जिले का काम संभालना है। बस एक हफ्ते के लिए घर आने की मोहलत मिली है। ललन बाबू खुशी से हुलस उठे- डीएम बन गई हमार बिटिया। अरे तू जल्दी आ। इहां सब तुझे संभालना है। मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा। खर्च से कमर टूटी जा रही है। एक झोंक में वे कह गए। बाद में पछताए भी कि खर्च वाली बात छुपा क्यों न ली।

सुनंदा अवाक रह गई। चंदा की मेडिकल की पढ़ाई के बाद अब ऐसा क्या खर्च कर दिया कि बाबा की कमर टूट गई। वह समझ गई आइएएस लड़के के मोह में वे बहुत कुछ दांव पर लगा बैठे हैं। उसने एकेडमी में अपने साथ ट्रेनिंग ले रहे निखिल से बात की। उसे अपनी बहन के विवाह में शामिल होने का निमंत्रण दिया। और साथ चलने का आग्रह किया। निखिल ने उसके आग्रह को मान लिया। दोनों चंदा की शादी से चार दिन पहले ही गांव पहुंच गए।

………. खेत-खलिहानों से होते हुए वे दोनों पैदल चले। पीछे सारा गांव उमड़ पड़Þा देश के भावी कर्णधारों के देखने के लिए। अफसर बिटिया की जय। जुग-जुग जियो बिटिया। गांव की युवा लड़कियां पीछे-पीछे चल रही थीं। सब सुनंदा के पदचिह्नों पर चलना चाहती हैं। जवान औरतें हाथ में फूलों से भरी थालियां लिए खड़ी हैं। वे आसमान छूती गांव की बेटी को देख कर निहाल हो जाना चाहती हैं। उस पर फूलों की वर्षा करना चाहती हैं। वे उसकी आंखों में अपने अधूरे रह गए सपने को पूरा होते देख रही हैं। सुनंदा के चेहरे पर विजयी मुस्कान है। उसमें आधी दुनिया की मासूमियत और सच्चाई उतर आई है। निखिल को यह सब देखना अच्छा लग रहा है। बिन मां-बाप के इस अनाथ युवक को अहसास हो रहा कि ये महिलाएं ही उसकी मां-बहन हैं। ये गरीब-गुरबे ही भाई-बंधु हैं। अब इन्हीं के लोक कल्याण के लिए पदभार संभालना है।

……..सुनंदा और निखिल घर पहुंचे तो आंगन में कुर्सी पर बैठे बाबा को हिसाब-किताब करते पाया। उनके सामने कुछ लोग हाथ बांधे खड़े थे तो जमीन पर बैठे पुराने नौकर-चाकर उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे। कुछ देर बाद उनकी नजर बड़े दरवाजे पर गई तो बाबा हड़बड़ा कर उठ गए और जोर से आवाज लगाई, ‘अरे, देखअ हो…..डीएम बिटिया आ गइल।’ शादी-ब्याह की तैयारियों में जुटीं महिलाएं दौड़ पड़ीं। पूरा आंगन उल्लास से भर उठा। घर के कोने में बरसों पुराने ग्रांोफोन पर बज रही शहनाई की धुन से फूल झरने लगे।

सुनंदा लपक कर पिता की ओर बढ़ी और उनके चरण छुए तो उन्होंने उसे हृदय से लगा लिया। दिल से दुआ निकली, ‘…..जुग जुग जिय हमर बच्ची।’ निखिल ने भी बाबा के पांव छुए तो उन्होंने कहा, ‘इ कउन हुउएं बिटिया?’ ‘…..बाबा ये निखिल हैं। हमारे साथ ही ट्रेनिंग कर रहे थे। हमारे पड़ोस के जिले के डीएम बनने जा रहे हैं।’ सुनंदा ने बताया। ‘……..ओह, यह बात। मेहमान का स्वागत है। बहुत-बहुत आशीष बच्चों। दो-दो अफसर घर आए हैं। अब संभालो तुम लोग। हम चैन की सांस लें।’ यह कह कर ललन बाबू निश्चिंत हो गए।

सब तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। पलंग पर लेटे ललन बाबू सोच रहे हैं….. ‘लड़के वालों की सारी मांगें तो पूरी कर चुके। मगर एक खास कंपनी की महंगी कार खरीदने के लिए 22 लाख रुपए का इंतजाम कैसे करें? कहां से लाएं इतने रुपए। समधी जी की जिद है कि इसी गाड़ी में बैठ कर दुलहन विदा हो। अजीब जिद है। कौन समझाए।’ ……. रात में बाबा को करवटें बदलते देख कर कमरे के सामने से गुजर रही सुनंदा ठिठक गई। उसने पूछा, ‘बाबा नींद नहीं आ रही क्या।’ बेटी की आवाज सुन कर ललन बाबू उठ बैठे। उन्होंने पहली बार बेटी को सारी बात बताई।

सारी बात जान कर सुनंदा बिफर उठी। उसने दिलासा देते हुए कहा, ‘बाबा यह सब पहले बताना चाहिए था। कोई बात नहीं। आप चिंता मत कीजिए। सब हो जाएगा।’ ललन बाबू बोले, ‘कहां से हो जाएगा पगली। शादी में पानी की तरह पैसा बह चुका। तेरी तो नौकरी अब शुरू होगी। कहां से लाएगी इत्ते रुपए। देखो कितनी महंगी गाड़ी मांग रहे हैं ये लोग। भिखारी कहीं के।’ बाबा गुस्से में थे। सुनंदा उन्हें समझा-बुझा कर और बेफिक्र होकर सोने के लिए कह कर अपने कमरे में चली गई।

………आज चंदा को ब्याहने उसका दूल्हा आने वाला है। पूरे गांव को न्योता है। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में मेहमान आएंगे। आखिर जमींदार साहब की पोती की शादी है। घर के पीछे खाली मैदान में तीन दिन से हलवाइयों की टोली मिठाइयां तैयार कर रही है। बारातियों के स्वागत के लिए उन्हें नाना प्रकार के व्यंजन और पकवान तैयार करने के लिए कहा गया है। आइएएस दामाद और उसके परिवार के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। कई हजार बारातियों के आने की चर्चा है। घर के पास ही मैदान में छह बड़े-बड़े पंडाल लगाए गए हैं। बाहर से आने वाले मेहमानों को ठहराने के लिए खास व्यवस्था की गई है।

सुबह सुनंदा उठी तो उसने अपने बैंक खातों का हिसाब-किताब करने पर पाया कि उसके पास मुश्किल से पांच लाख रुपए ही हैं। ये रुपए बाबा ने पढ़ाई-लिखाई के दौरान बाहर रहने के दौरान समय-समय पर दिए थे, जो उसने बचा लिए थे। इससे कहां आएगी गाड़ी? वह छोटी बहन की शादी में बखेड़ा नहीं करना चाहती। नहीं तो लोग कहेंगे कि चंदा की शादी से वह ईर्ष्या कर रही है। नहीं तो, जी कर रहा है कि दूल्हे के बाप को जम कर सबक सिखाया जाए। क्या वह ऐसा कर पाएगी? सुनंदा को कुछ समझ नहीं आ रहा। जो होगा देखा जाएगा, यही सोच कर वह अपनी तैयारियों में जुट गई।

आखिर वह शुभ घड़ी आ गई। बारात चढ़ चुकी है। सज-धज के साथ साथ बाराती चले आ रहे हैं। दूल्हे के पिता और घर के बड़े-बुजुर्गों का ललन बाबू ने गुलाब की मालाओं से स्वागत किया। सुनंदा के मित्र निखिल ने भी उनका साथ देते हुए मेहमानों की अगवानी की। उधर, सुनंदा ने दूल्हे की मां और भाभियों के स्वागत में पलकें बिछा दीं। गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी में वह खुद भी किसी दुलहन से कम नहीं लग रही थी। …… कुछ ही देर में बाराती पंडालों में करीने से सजाए गए गरमा-गरम व्यंजनों के स्टाल पर टूट पड़े।

घंटों दावत चलती रही। ज्यादातर मेहमान अपने स्वागत और उम्दा पकवानों की तारीफ करते हुए अपने घर लौट गए। दूर से आए बाराती जनवासे में आराम करने चले गए। आंगन में फूलों से मंडप सजाया गया था। उसके चारों ओर सफेद गद्दे बिछा दिए गए थे। कहीं तिल रखने भर की जगह न थी। एक कोने में दुबली-पतली युवती ढोलक पर थाप देते हुए मंगलगीत गा रही थी। वहीं शहनाई वादकों ने समां बांध रखा था। बीच-बीच में वे कोई न कोई धुन छेड़ देते। पुष्पों से सुवासित वातावरण सभी को मुग्ध कर रहा था।

पंडित जी ने वैवाहिक रस्मों की तैयारियां पूरी करने के बाद वर-वधू को बुलाने का आग्रह किया। उनके आने पर रस्में शुरू हो गई। सकुचाई सी बैठी चंदा के पास ही सुनंदा के साथ बैठे ललन बाबू की आंखों से आंसू बह चले। ……आज छोटी बेटी पराई हो जाएगी। बहुत दूर चली जाएगी। बड़ी बेटी के कंधे पर हाथ धरते हुए उन्होंने खुद को संभाला। सुनंदा ने धीरे से कहा, ‘क्यों दिल दुखा रहे हैं। आप तो शिक्षक हैं। जानते हैं, बेटियां तो चिड़िया की तरह होती हैं। एक दिन उनको जाना ही है। लेकिन बाबा मैं कहीं नहीं जा रही आपको छोड़ कर। मैं जहां भी रहूंगी, आपको साथ रखूंगी। फिर पिता का हाथ कस कर पकड़ते हुए कहा’, चंदा को मुस्कुराते हुए विदा कीजिए। ……लेकिन क्या यह विधि को मंजूर होगा?

इस बीच पूजा खत्म हो गई। पंडित जी वर-वधू को सात वचन पढ़ कर सुनाने लगे। दूल्हे के कंधे पर रखी हल्दी लगी पीली धोती से चंदा के लंबे लाल दुपट्टे को मिला कर गांठ लगा दी गई। फेरे की तैयारी शुरू हो गई। तभी दूल्हे के पिता खड़े हो गए। जोर से बोले, ‘ठहरिए पंडित जी।’ फिर ललन बाबू की ओर देखते हुए बोले, ‘वह गाड़ी कहां है साहब? जिसे आप इस मौके पर देने वाले थे। कहीं दिखाई नहीं दे रही?’ लड़के के पिता का यों रूखा सवाल सुन कर ललन बाबू अचकचा गए। ऐसा लगा कि सबके सामने किसी ने उनकी पगड़ी उतार ली हो।

सुनंदा आवाक रह गई। विवाह मंडप में पिता दहेज में लग्जरी गाड़ी मांग रहा है और बेटा सिर झुकाए बैठा है! ये कैसा सरकारी अफसर है? इसे शर्म भी नहीं आ रही। लालची कहीं का। ……. उधर दूल्हे के पिता जिद किए बैठे हैं कि पहले गाड़ी का इंतजाम कीजिए, तभी फेरे शुरू होंगे। अगर संभव नहीं तो नकद ही यहां धर दीजिए। सुनंदा ने एक पल के लिए सोचा, बाबा की अलमारी में रखे बचे-खुचे दस लाख रुपए लाकर इस लालची आदमी के मुंह पर दे मारूं। फिर खयाल आया कि जब दूल्हा खामोश रह कर दहेज में मिलने वाली गाड़ी का समर्थन कर रहा है, तो मैं इन्हें रुपए देकर इस कुरीति को क्यों बढ़ावा दूं? कभी नहीं। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। यह हमारा दायित्व है कि इस कुप्रथा को रोकें। वैसे भी हमारे राज्य में इस पर रोक है।

सुनंदा सोचने लगी। अगर इन लोगों को गाड़ी के लिए आधी रकम दे भी दूं तो क्या पता मेरी बहन को बाद में इसी बात पर तलाक न दे दें। पिछले दिनों एक अखबार में छपी वह खबर उसे याद आई जिसमें बताया गया था कि एक शख्स ने अपनी पत्नी को इसीलिए तलाक दे दिया था क्योंकि उसे दहेज में कार नहीं दी गई थी।

…….. पंडित जी ने मौके की नजाकत भांप कर वैवाहिक रस्में रोक दीं। सुनंदा ने सोच लिया। वह न तो जिला प्रशासन को सूचित करेगी और न पुलिस को बुलाएगी। उसका चेहरा तमतमा उठा। उसने दूल्हे को उठने का इशारा किया। वह जैसे ही उठा, सुनंदा ने उसे जोर से तमाचा जड़ दिया। यह देख कर सभी मेहमान सन्न रह गए। यह तमाचा उस युवा समाज पर था जो मौन रह कर सामाजिक बुराइयों का समर्थन करता है। यह उस समाज पर भी तमाचा था जो एक पिता की बेबसी का फायदा उठाता है। यह उन अफसरों पर तमाचा था जो सिस्टम का हिस्सा बनने के बाद भी कुरीतियों को बढ़ावा देते हैं और सामाजिक परंपरा का हवाला देकर अपना मुंह रेत में शुतुरमुर्ग की तरह छिपा लेते हैं।

लिखने-पढ़ने में आदर्शवादी बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन यथार्थ में कोई पहल नहीं करता। सुनंदा ने एक पहल की। उसने एक झटके में वह गांठ खोल दी जिसके नीचे न केवल चंदा दबी पड़ी थी बल्कि पिता को भी संभावित कर्ज से मुक्ति दिला दी। उसने छोटी बहन के आंसुओं को पोंछते हुए जोर से कहा, ‘ले जाइए अपने बेटे को और जहां गाड़ी मिल जाए, वहीं शादी कर दीजिए। फिर दूल्हे की ओर देखते हुए कहा, तुम जैसे अफसर हमारे सिस्टम के लिए कलंक हैं। तुम लोगों को क्या सामाजिक न्याय दोगे? जब तुम खुद ही खामोश बैठे यहां एक अन्याय को बढ़ावा दे रहे हो। अभी शिकायत कर दूं तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी। फिर भी बख्श रही हूं। निकल जाओ यहां से।’

यह सब देख सुन कर दूल्हे के पिता तमतमाते हुए बोले, ‘हमारी इतनी बेइज्जती। चल बेटा। इससे अच्छी लड़की मिलेगी। यह शादी नहीं होगी। देखता हूं इस लड़की को अब कौन आइएएस मिलता है।’ ……. उनकी बात सुन कर ललन बाबू को चक्कर आने लगा। सुनंदा ने उन्हें तुरंत संभाला। उनका सिर सहलाते हुए दिलासा दिया तो बाबा रुंधे गले से बोले, ‘बेटी इस वक्त चंदा से कौन करेगा शादी। हम कितना खर्च कर बैठे हैं इस आयोजन पर। क्या होगा अब।’

……..तभी सुनंदा के कंधे पर हाथ रखते हुए निखिल ने कहा ‘…….. मैं करूंगा शादी।’ उसकी बात सुन कर सहसा यकीन नहीं हुआ। निखिल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘सच सुनंदा। मैं अभी करूंगा शादी। मगर मेरी एक शर्त है।’ ‘तुम्हारी भी शर्त है। अच्छा बताओ क्या शर्त है?’ सुनंदा ने पूछा। उसने कहा, कुछ नहीं। बस चंदा मुझे दुलहन की लिबास में चाहिए। वह न गहने लेकर जाएगी और न महंगे उपहार। और हां मुझे जमीन-जायदाद भी नहीं चाहिए। बोलो मंजूर? ……. मंजूर है, सुनंदा ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आंखें छलक उठीं। ललन बाबू उठ कर बैठ गए। लगा जैसे उनके परिवार की प्रतिष्ठा किसी देवता ने आकर बचा ली हो। वे मन ही मन बोले, जुग-जुग जिय निखिल बेटा। मेरी उमर तुम्हें लग जाए।

मंडप में बैठीं महिलाओं ने निखिल की बलैया लीं। सुनंदा के दिल ने यही कहा, दोस्त हमें इस संकट से उबार कर तुमने मित्रता का धर्म निभाया है। मैं आजीवन तुम्हारी ऋणी रहूंगी। तुमने एक आदर्श कायम कर दिया निखिल। तुम सही मायने में एक ईमानदार और अनुशासनप्रिय अधिकारी साबित होगे। एक सच्चे इंसान के रूप में जन कल्याण करोगे।

………विवाह की रस्में शुरू हो गर्इं। दूल्हे के साथ आई बारात लौट गई है। बोझिल वातावरण सहज हो गया है। शहनाई की धुन फिर से बजने लगी है। महिलाएं मंगल गीत गा रही हैं। निखिल को चंदा के बगल में बैठा दिया गया है। सुनंदा उन पर फूल बरसा रही है। आप भी इस नव युगल को अशीष दीजिए।

‘……..सुनिए कहां खो गए आप?’ डॉ. उज्ज्वला अपनी कहानी पूरी कर चुकी हैं। ‘कहां पहुंचे आप? राजीव चौक आ गया क्या।’ ‘……पता नहीं। कुछ भी नहीं पता, कहां हूं अभी।’ मैंने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा। उद्घाषणा हो रही है, अगला स्टेशन हुडा सिटी सेंटर है। ‘……अरे आप तो बहुत दूर निकल गए। वापस लौटिए राजीव चौक। मेरी वजह से आप लेट हो गए। लास्ट कोच में कहानियां तलाशते आप गुम हो गए, तो मैं कहां ढूंढती रहूंगी आप को। अब लौटिए भी। फिर मिलते हैं।’ मैं लौट रहा हूं।

-संजय स्वतंत्र की द लास्ट कोच शृंखला

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