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लघु कविताएं: ‘घूंघट के पार’ और ‘मौन संवाद’

सांत्वना श्रीकांत की दो लघु कविताएं

प्रतीकात्मक फोटो

घूंघट के पार

घूंघट ढक लेता है
औरतों का आसमान,
चांद जिसकी उपमेय
बनने की ख्वाहिश में थी,
वो छिप जाता है
उसकी आंखों के
नीचे की स्याह जमीन में।
वह अन्नपूर्णा बन कर
भरती है सबका पेट,
उसके अमाशय में
पड़ जाते हैं छाले
रोटियां सेंकते-सेंकते।
घूघट ढेंप लेता है
औरतों का आसमान
आखिर में उसी के नीचे
वह बना लेती है
अपने सपनों का घरौंदा
वक्त की रेत पर
वह चलती रहती है।
वह स्त्री है-
इस प्रक्रिया में
उलझी रहती है अनवरत।

मौन संवाद

मेरे मौन से की गई
तुम्हारी बातों का स्वाद
मेरी जुबां से नहीं उतरता।
मुझ बंजर पर उगे हो
तुम दूब जैसे
नौनिहाल मेरा प्रेम
प्रेषित होगा तुम तक
दसों दिशाओं से।
आंखें मूंद कर
तुम छूना मुझे
अंतस से अपना स्पर्श
रख देना मेरी हथेलियों पर,
जिसकी गरमाहट
समय पर पड़ी बर्फ को
पिघलाती रहे।

– सांत्वना श्रीकांत

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