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जनसत्ता विशेष: साहित्य की चेतनामयी साधना

साधना जैन का मानना है कि किसी भी काम के लिए वक्त निकालने से ही निकलता है। लिखने-पढ़ने के लिए वक्त निकालने और जगह बनाने की कवायद के बीच यह सब शुरू हुआ। हमें उम्मीद नहीं थी कि हम इतनी जल्दी चेतनामयी स्त्रियों का समूह तैयार कर लेंगे। हमारा कोई बहुत बड़ा साहित्यिक एजंडा नहीं है। स्त्रियां जब चेतना के साथ जुड़ती हैं तो एक नया माहौल रच देती हैं। साहित्य को पढ़ना और उसे समझना भी एक बड़ा साहित्यिक कर्म है।

चर्चा की शुरुआत करती हैं साहित्यकार चित्रा मुद्गल।

दिल्ली के एक संभ्रांत इलाके में संभ्रांत स्त्रियों का जमावड़ा शुरू होता है। लगता है कोई किटी पार्टी होगी और थोड़ी हल्की गपशप। लेकिन थोड़ी देर बैठने के बाद ही एक सुखद अनुभव होता है। ‘चेतनामयी’ नाम की संस्था से जुड़ी इन महिलाओं के हाथ में हाल में प्रकाशित हुआ हिंदी का एक उपन्यास था और सभी महिलाएं उसके पन्ने पलट रही थीं। तभी वहां पर उपन्यास की लेखिका और प्रकाशक, अन्य साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार पहुंचते हैं। फिर शुरू होती है किताब पर गंभीर चर्चा।

चर्चा की शुरुआत करती हैं साहित्यकार चित्रा मुद्गल। वहां मौजूद महिलाएं बहस में अपना सार्थक हस्तक्षेप करती हैं। बहस का मकसद रचना प्रक्रिया को समझना और उसके वृहत्तर में जाना है। किताब के हर अहम अंश को रेखांकित किया गया और उसे रचनाकार के नजरिए से समझने की कोशिश की गई। सबको बोलने का पर्याप्त समय दिया गया और सबको सुनने की पर्याप्त सहनशक्ति भी दिखी। यहां स्त्रियों के जमावड़े का एक ही मकसद है चेतना के स्तर पर ज्ञान के नए अंश हासिल करना।

‘चेतनामयी’ की संस्थापक और मार्गदशर्क चित्रा मुद्गल जैसी शीर्ष रचनाकार हैं तो यहां उन रचनाकारों को भी निमंत्रित किया जाता है जिनका रचनाकर्म अभी शुरू ही हुआ है। युवा रचनाकार उस वक्त अद्वितीय अनुभव से गुजरती हैं जब उनकी किसी कविता को वरिष्ठ रचनाकार एक बार और पढ़ने की अपील करती हैं, उनकी लिखी पंक्तियों की कई बार प्रशंसा करती हैं और उनके साथ नए समय और नई पीढ़ी को जीती हैं।

इन दिनों लेखकों, प्रकाशकों से लेकर विद्वानों की सबसे बड़ी चिंता होती है किताबों के घटते पाठक। ‘चेतनामयी’ संस्था की विशेषता है कि यह अपने सदस्यों के लिए किताबें खरीदती है। एक कार्यक्रम के खत्म होने के बाद दूसरे कार्यक्रम की तैयारी के लिए सदस्यों को किताबें दे दी जाती हैं। ऐसा करते हुए संस्था के पास किताबों का बड़ा संग्रह तैयार हो चुका है।

‘चेतनामयी’ की धुरी हैं साधना जैन। उनकी कोशिशों से ही इस संस्था का दायरा बढ़ता गया और चेतना संपन्न स्त्रियां जुड़ती गर्इं। साधना जैन का मानना है कि रोटी, कपड़ा और मकान के झंझटों के बीच हम ज्ञान और चेतना की जरूरतों को कैसे अनदेखा कर सकते हैं। ‘चेतनामयी’ से जुड़ी स्त्रियों का कहना है कि हमारा मकसद किताबों के तत्त्व ज्ञान से जुड़ा है। अमीर तबके के घरों में किताबें भी आंतरिक सज्जा का हिस्सा हो जाती हैं। कहीं-कहीं तो किताबों की खरीदारी उनकी जिल्द और दीवारों के रंग-संयोजन देख कर की जाती है। कई घरों में आप जाएंगे तो किताबों की हालत बताएगी कि शीशे से बाहर कभी निकली ही नहीं हैं। जन्मदिन या किसी अन्य अवसर पर किताबों के तोहफे देने का चलन खत्म हो रहा है।

लेखक और पाठकों के मिलन स्थलों की पूरे वैश्विक साहित्य में अहमियत रही है। भारतीय साहित्य में देखें तो नवजागरण काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी इस भूमिका में सबसे अग्रणी दिखते हैं। लेखकों और कलाकारों को संसाधन और जगह मुहैया कराने के लिए वे खुद बड़े कर्ज में डूब गए थे। पूरा भारतेंदु काल इस बात का गवाह है कि संभ्रांत समाज में लिखने-पढ़ने को भी एक बड़ी विलासिता मान लिया जाता है और उससे मुखालफत एक बड़ी जंग बन जाती है।

आगरा से लेकर इलाहाबाद, बनारस और पटना उन केंद्रों के लिए जाने जाते थे जहां लेखक और पाठक इकट्ठे होते थे। लेखकों और साहित्यकार को जोड़ने के इस पारंपरिक संस्कार में आज सार्वजनिक जगहों की कमी आड़े आती है। कुछ समय पहले तक किसी शहर या कस्बे की सबसे मशहूर जगह कॉफी हाउस होते थे, जिनमें से ज्यादातर अब बंद हो चुके हैं। नब्बे के दशक के बाद के बने माहौल ने इंसान को जितना अकेला बनाया है अब उस अकेलेपन के खिलाफ आवाज उठने लगी है।

किसी देश-काल में उस वक्त क्या लिखा-पढ़ा जा रहा है, यह उसका आईना होता है। अगर हम अपने समय के लिखे पर बात न करें तो हम अपने समय को जीने से वंचित रह जाएंगे। ‘चेतनामयी’ के जरिए आधुनिक स्त्रियों ने अपनी निजता से निकल सामूहिकता की चेतना से संपन्न होने की जो मुहिम शुरू की है वह साहित्य की दुनिया में बेहद सकारात्मक संदेश दे रहा है।

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