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नृत्योत्सव: परंपरा से जोड़ता नृत्य

जयंतिका की ओर से आयोजित नृत्य समारोह में शिष्या अंकिता नायक ने ओडिशी नृत्य पेश किया। अंकिता गुरु मधुमीता राउत की शिष्या हैं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में समारोह में अंकिता ने मंगलाचरण से नृत्य आरंभ किया। इसमें विश्वनाथ अष्टकम से ली गई ‘गंगातरंगम’ को पेश किया गया।

गुरु मायाधर राउत ने ओडिशी नृत्य को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्हें महान विभूति रुक्मिणी देवी अरुंडेल के सानिध्य में नृत्य सीखने का अवसर मिला। गुरु मायाधर राउत ने बतौर गोतिपुआ नर्तक अपने करिअर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने भरतनाट्यम के बहुत हस्तमुद्राओं, भंगिमाओं और अभिनय को ओडिशी नृत्य के अनुरूप ढाला। उनकी नृत्य रचनाओं में सौम्यता, ठहराव के साथ नजाकत से भरा भाव है, जिसकी झलक मंच प्रवेश समारोह में देखने को मिली।

जयंतिका की ओर से आयोजित नृत्य समारोह में शिष्या अंकिता नायक ने ओडिशी नृत्य पेश किया। अंकिता गुरु मधुमीता राउत की शिष्या हैं। गुरु मायाधर राउत की शिष्या और नृत्यांगना मधुमीता राउत ने अपने गुरु की नृत्य रचनाओं को बड़ी सुघड़ता से संरक्षित किया है। वह गुरु-शिष्य परंपरा के तहत अपनी शिष्याओं को इन नृत्य रचनाओं को पूरी संवेदनशीलता से सिखा रही हैं। इन शिष्याओं की कोशिशें तारीफ-ए-काबिल है कि उन्होंने अपनी नृत्य परंपरा को बखूबी आत्मसात किया। शास्त्रीय नृत्य सिर्फ नृत्य नहीं है बल्कि वह कलाकार को कला के साथ शास्त्र और शास्त्रीय परंपरा से भी जोड़ता है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में समारोह में अंकिता ने मंगलाचरण से नृत्य आरंभ किया। इसमें विश्वनाथ अष्टकम से ली गई ‘गंगातरंगम’ को पेश किया गया। रचना ‘गंगा तरंगम कमनीय जटाकलापम’ में गंगा के प्रवाह, वाराणसी के आध्यात्मिक महत्त्व और भगवान विश्वनाथ की महिमा को दर्शाया गया। अगली पेशकश गौड़ पल्लवी की थी। यह राग गौड़ में निबद्ध था। इसकी नृत्य परिकल्पना गुरु मायाधर ने सत्तर के दशक में की थी। ‘तारी झम तारी झेणा’ के बोलों में पिरोई गई थी। शिष्या अंकिता ने बहुत सूक्ष्मता और कोमलता से अंग, पद, हस्तकों का संचालन पेश किया। उनके पद संचालन में लयात्मकता के साथ-साथ मधुरता थी।

गुरु मायाधर राउत की अगली नृत्य रचना अभिसारिका नायिका थी, जिसे अंकिता ने पेश किया। जयदेव की अष्टपदी ‘रती सुख सारे यमुना तीरे’ पर यह नृत्य आधारित था। नायिका राधा और नायक कृष्ण के एक-एक भाव को चित्रित करना, नई नृत्यांगना के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। पर अंकिता ने पूरी परिपक्वता के साथ नायिका राधा और नायक कृष्ण के भावों को दर्शाया। स्थाई ‘रचयति शयनम’ में संचारी भाव का समावेश सुंदर था। वहीं शृंगार रस का समावेश सहज और सरल अंदाज में दिखा।

कवि कालीचरण पटनायक की रचना ‘जागो महेश्वर योगी दिगंबर’ पर आधारित नृत्य अंकिता की अंतिम प्रस्तुति थी। इसके संगीत की परिकल्पना बालकृष्ण दास ने की थी। शास्त्रीय नृत्य के तांडव पक्ष का प्रयोग इस नृत्य में किया गया था। इस नृत्य में शिव से जुड़े त्रिपुरासुर वध, सती दाह, वीरभद्र भस्म, समुद्र मंथन, गंगावतरण जैसे 18 आख्यानों को दर्शाया गया।

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