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शास्त्रीय सेतु हैं मिथक

वर्तमान साहित्यिक क्षितिज पर पौराणिक आख्यानों और मिथकीय चरित्रों की सशक्त उपस्थिति बहुतों को आश्चर्यचकित कर सकती है। तमाम समकालीन महत्त्वपूर्ण रचनाओं में रामायण, महाभारत जैसे बहुश्रुत, बहुपठित पुराकथाओं की दार्शनिक अनुगूंजें मौजूद हैं, तो कहीं बेहद कम प्रचारित मिथकीय कथाओं तक से बिंब और उपमाएं लेने में कोताही नहीं की गई है। मिथक सभ्यताओं […]

Author नई दिल्ली | Published on: January 26, 2020 1:47 AM
यूनानी शब्द मुथॉस, जिसका अर्थ है ‘मौखिक कथा’, से शब्द आया ‘मिथ’ जिसे हिंदी में मिथक कहा जाने लगा।

वर्तमान साहित्यिक क्षितिज पर पौराणिक आख्यानों और मिथकीय चरित्रों की सशक्त उपस्थिति बहुतों को आश्चर्यचकित कर सकती है। तमाम समकालीन महत्त्वपूर्ण रचनाओं में रामायण, महाभारत जैसे बहुश्रुत, बहुपठित पुराकथाओं की दार्शनिक अनुगूंजें मौजूद हैं, तो कहीं बेहद कम प्रचारित मिथकीय कथाओं तक से बिंब और उपमाएं लेने में कोताही नहीं की गई है।

मिथक सभ्यताओं के बीच शास्त्रीय सेतु भी हैं। मनु के जलप्रलय, इंद्र, गोवर्द्धन, हरिश्चंद्र आदि की कथाएं कई संस्कृतियों में अलग-अलग रूपों में उपस्थित हैं। साहित्य और संस्कृति के लिए मिथकों की उपादेयता निर्विवाद है, तो ये भाषा की पुनर्सर्जना के कालसिद्ध उपादान भी हैं। ये मिथक पुरातात्विक काल को वर्तमान से जोड़ने का उपकरण भी हैं। अंग्रेजी में डॉन ब्राउन से लेकर आश्विन सांघी तक यह काम बखूबी हो भी रहा है।

यूनानी शब्द मुथॉस, जिसका अर्थ है ‘मौखिक कथा’, से शब्द आया ‘मिथ’ जिसे हिंदी में मिथक कहा जाने लगा। भारतीय संदर्भ में मिथकों को केवल गल्प या कथाबंध मानना ठीक नहीं होगा। बल्कि यह आदिकाल से चले आ रहे श्रद्धा और विश्वास की एक आख्यानपरक अभिव्यक्ति है, जो ‘रियल’ भी है, ‘रियलिस्टिक’ भी, साथ ही प्रतीकवत भी।

वास्तव में साहित्य में कभी कोई ऐसा कालखंड नहीं रहा, जब पौराणिक आख्यानों या मिथकों की पूर्ण उपेक्षा रही हो। मिथकों से उधार लिए बिंबों से संसार के हर भाषा की कविताएं अनुप्राणित हुर्इं तो गद्य की भाव प्रवणता के नए क्षितिज भी इनके सहारे छुए गए।

‘पृथ्वीराज रासो’ एक वीरकाव्य है, पर रामकथा वहां भी अपने पूरे धज के साथ प्रतिष्ठा पाती है। ‘नेमिनाथ रास’ में जैन दर्शन की व्याप्ति के माध्यम श्रीकृष्ण बनते हैं। तांत्रिक ग्रंथों में उमा महेश्वर के सांयोगिकशृंगार के वर्णन हैं, तो रीतिकाल की शृंगारिक काव्यतत्त्व के आश्रय बनते हैं राधाकृष्ण।

हिंदी कविता का स्वर्णकाल ही भक्ति रस प्रधान है। उसके बाद भी हरिऔध की ‘वैदेही वनवास’, मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी, साकेत, दिवोदास, नहुष आदि, द्वारिकाप्रसाद का कृष्णायन, बलदेव मिश्र का रामराज्य, रामकुमार वर्मा का एकलव्य, दिनकर की उर्वशी और रश्मिरथी, जयशंकर प्रसाद की कामायनी, निराला की राम की शक्तिपूजा, नरेश मेहता का महाप्रस्थान, कुंवरनारायण की वाजश्रवा के बहाने और आत्मजयी, दुष्यंत कुमार की एक कंठ विषपायी आदि अनेकानेक काव्यों, खंडकाव्यों की एक अंतहीन सूची है, जहां चिरंतन सार्वभौमिक सत्य और शाश्वत विषमताओं की एक साथ अद्भुत अभिव्यक्ति हुई है। आधुनिक कवियों में राधाकृष्ण दास, जगमोहन सिंह और बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन के नाम भी इसी क्रम में लिए जा सकते हैं। हिंदी गद्य साहित्य में विशेषत: नाटकों और उपन्यासों पर पौराणिक आख्यानों का विशेष प्रभाव रहा है।

पौराणिक पुराकथाएं हमारे भारतीय होने की यात्रा के पाथेय जैसी रही हैं। ये कथाएं व्यक्तिगत ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’, ‘अथातो धर्म जिज्ञासा’ और ‘अथातो शक्ति जिज्ञासा’ की प्रेरणाएं बनीं, तो इसमें समष्टिमूलक चिंतन के सत्यम शिवम सुंदरम का सामूहिक उद्घोष भी सम्मिलित रहा। इन पुरावृत्त कहानियों को केवल नैतिक-संहिता समझना दोषपूर्ण होगा, इसमें साहित्यिक चेतना के महत्त्वपूर्ण सूत्र भी अंतर्निहित हैं। मिथक अमर हैं, कालातीत हैं। भारतीय परंपरा के प्राण में पुराणों का स्पंदन है, तो लोकजीवन भी इन आख्यानों के शर्करावेष्ठन से मधुरता ग्रहण करता रहा है।

यह जरूर है कि कई बार इन आख्यानों का अनुप्रास बेईमानी लगने लगता है। साहित्य में ‘मिथक तत्त्व’ भाषा की व्यापकता और लोक से जुड़ने की कवायद तक सुंदर है। पर जहां केवल तात्कालिक क्षणिक मिस्टीसिज्म या रहस्यात्मकता, लाक्षणिकता और विलक्षणता के लिए इस ब्रह्मास्त्र का प्रयोग होने लगता है, तो यह एक खराब तरह की एकरसता और ऊब की निर्मिति करता है। हां, इन मिथकों के विस्तृत परिदृश्य में जब लोककथाएं, निजंधरी कथा और आख्यानात्मक कथाओं का भी समावेश हो तो यह अलौकिक रस की सृष्टि करने में सक्षम हो जाता है।

अंग्रेजी साहित्य में मिथकीय चरित्रों के गुंफन और उनके व्यापक वाणिज्यिक क्षमता का अंदाजा इसी से लगाया जाए कि हिंदी का आम पाठक भी आज अशोक बैंकर, आनंद नीलकंठन, देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी, कृष्णा उदयशंकर और अश्विन सांघी से भलीभांति परिचित है। दादी नानी से बचपन में सुनी इन कथाओं से पूर्वपरिचित अंग्रेजीदां पाठक, जिसकी श्रद्धा भले कम हो जिज्ञासा आज भी अनंत है, वह इन कहानियों के आकर्षण के लपेटे में आ ही जाते हैं। परिपक्व पाठक उसी एक कहन के अनेक तरीकों को खुली बाहों और खुले मस्तिष्क के साथ स्वीकार करते हैं। इन अंग्रेजी ‘फिक्शनल’ किताबों का एक बड़ा बाजार पहले से ही तैयार भी है। बाजार को नयापन चाहिए। इस नएपन के लिए अब कम प्रसिद्ध मिथकीय चरित्र लेखकों के लक्ष्य हैं।

मिथकों के प्रयोग के औचित्य पर हिंदी में सर्वप्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मिथक मीमांसा प्रस्तुत की थी। उन्होंने लिखा कि ‘रूपगत सुंदरता को माधुर्य (मिठास ) और लावण्य (नमकीन) कहना बिलकुल झूठ है, क्योंकि रूप न तो मीठा होता है न नमकीन। लेकिन फिर भी कहना पड़ता है, क्योंकि अंतर्जगत के भावों को बहिर्जगत की भाषा में व्यक्त करने का यही एकमात्र उपाय है। सच पूछिए तो यही मिथक तत्त्व है। मिथक तत्त्व वास्तव में भाषा का पूरक है। सारी भाषा इसके बल पर खड़ी है। आदिमानव के चित्त में संचित अनेक अनुभूतियां मिथक के रूप में प्रकट होने के लिए व्याकुल रहती हैं। मिथक वस्तुत: उस सामूहिक मानव की भावनिर्मात्री शक्ति की अभिव्यक्ति है, जिसे कुछ मनोविज्ञानी आर्किताईपल इमेज (आद्यबिंब) कह कर संतोष कर लेते हैं।

सच तो यह है कि मिथक और संस्कारों को बिना समझे भारतीय जनमानस और भारतीय दर्शन को समझा ही नहीं जा सकता। सर्जनात्मक दृष्टि से देखें तो पुरा-कथा किसी भी रचनाकार के लिए ‘कथ्य’ या ‘उद्देश्य’ नहीं, बल्कि शिल्प यानी क्राफ्ट या अभिव्यक्ति का उपादान ही अधिक हो सकता है।
समकालीन लेखक, जिन्होंने मिथकीय बिंबों का अधिकाधिक प्रयोग किया है, उन पर एक आरोप है कि वे पौराणिक आख्यानों को एक नैतिक ‘सेफ्टी-वाल्व’ की तरह अधिक प्रयोग कर रहे हैं, जो कि उनकी कंजर्वेटिव मानसिकता को दिखा रहा है, लेकिन आरोप लगाने वाले लोग भी शंबूक, द्रौपदी, तारा, रावण आदि के प्रयोग करते देखे जाते हैं। प्रतीकों से नफरत करने वाले भी हैं, पर यह तय है कि कई बार इन मिथकों के आलोक में वाम, दक्षिण, मध्य और प्रगतिशील तथा पुरातनपंथी का भेद मिट-सा जाता है।

नीत्शे साहित्य में मिथकों के प्रयोग को एक औजार की तरह देखते हैं, जो लोगों को आपस में सांस्कृतिक सूत्रों से जोड़ने का एक माध्यम हो सकता है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, आरके नारायण और राजा राव की कृतियों से उठे आंदोलन नीत्शे के कथन की गवाही देते हैं। आनंदमठ जैसे उपन्यास राष्ट्रवादियों के लिए संदर्भ ग्रंथ के तौर पर प्रयोग हो रहे हैं। पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के उभार का एक समय चल रहा है, आश्चर्य नहीं कि हिंदू मिथक पूरे भारतीय साहित्यिक आकाश में छाए हुए हैं।

यह भी मजेदार है कि इन मिथकीय बिंबों में हर वाद से संबंधित लोगों के लिए आवश्यक ‘मसाला’ भी पर्याप्त मौजूद है। नारीवादी सीता, तारा, अहिल्या, कुंती, शकुंतला, द्रौपदी के साथ हुए अन्याय को लेकर मैदान में हैं, कहीं शंबूक वध का साहित्यिक प्रतिशोध लिया जा रहा है, कहीं वशिष्ठ-विश्वामित्र के माध्यम से वर्ण श्रेष्ठता का दुराग्रह। कोई शिव को आर्य-अनार्य की लड़ाई में खींच लाया है। कहीं कृष्ण पर कामुकता के आरोप हैं, तो कहीं राम-रावण युद्ध में आर्य द्रविड़ संघर्ष की संभावनाएं तलाशी जा रहीं हैं।

मिथकीय प्रयोग कोई साहित्यिक क्रांति नहीं है। हां, पौराणिक चरित्रों का मानवीकरण और वर्तमान की नैतिकता से तात्कालिक परिस्थितियों का आकलन एक नई दृष्टि जरूर दे जाएगा। आश्चर्य नहीं कि तब का महाखलनायक रावण भी आज बहुतों को नायक जैसा दिखाई देने लगा है।

मधुसूदन उपाध्याय

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